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कठपुतली पढ़ाती है गणित-विज्ञान : सीतापुर के ‘कहानी वाले सर जी’ ने बदल दिया ग्रामीण बच्चों की पढ़ाई का अनुभव
रामजी मिश्र, कृषि एवं ग्रामीण विकास पत्रकार, सीतापुर
Published by: Mohammad Aamil
Updated Mon, 17 Aug 2026 06:36 PM IST
सार
पढ़ाई जब किताब से नहीं; बल्कि कहानी, गीतों और कठपुतली के संवाद से हो, तो गणित और विज्ञान जैसे विषय भी आसान लगने लगते हैं। ऐसे में स्कूल बच्चों के लिए बोझ नहीं; उत्सुकता का ठिकाना बन जाता है। सीतापुर के महोली देहात में कठपुतली सवाल करती है, कहानी जवाब देती है, और बच्चे खेल-खेल में सीखते हैं।
कठपुतली पढ़ाती है गणित-विज्ञान, गांव में पढ़ाई का नया व्याकरण
- फोटो : सोशल मीडिया
सुबह करीब आठ बजे जैसे-जैसे सीतापुर के महोली देहात प्राथमिक विद्यालय के खुलने का समय नजदीक आता है, बच्चे उत्साह से स्कूल पहुंचने की जिद करने लगते हैं। उनकी इस खुशी की वजह हैं शिक्षक अटन कुमार शुक्ला, जिन्हें बच्चे प्यार से ‘कहानी वाले सर जी’ कहते हैं। हाथ में कठपुतली लेकर आने वाले अटन कुमार शुक्ला गणित, विज्ञान, नैतिक शिक्षा और सामाजिक व्यवहार जैसे विषयों को कहानी, संवाद और अभिनय के माध्यम से रोचक ढंग से पढ़ाते हैं।
पुतुल बताती है- क्या अच्छा, क्या बुरा
अटन कुमार के लिए कठपुतली केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि बच्चों तक संदेश पहुंचाने का प्रभावी तरीका है। वह बताते हैं, कहानी, संवाद और अभिनय के जरिए कठिन विषय भी बच्चों को आसानी से समझाए जा सकते हैं। कठपुतली बोलती है तो कभी बच्चे हंसते हैं और कभी अचानक गंभीर हो जाते हैं। उदाहरण देकर वह आगे बताते हैं, 'धूम्रपान जैसे विषय पर पहले स्वस्थ और बाद में कमजोर दिखने वाली कठपुतली के माध्यम से उसके दुष्प्रभाव बच्चों को बिना लंबे व्याख्यान के सहज रूप से समझ में आ जाते हैं।
बचपन के पुतुल शो से शुरू हुआ सफर
करीब 49 वर्षीय अटन कुमार बताते हैं, बचपन में कठपुतली का एक शो देखने के बाद उन्होंने इस कला के जरिए कुछ नया करने का संकल्प लिया था। करीब 17 वर्ष पहले वह बेसिक शिक्षा विभाग में प्राथमिक शिक्षक नियुक्त हुए। वर्ष 2018 में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान की एक कार्यशाला में उन्होंने कठपुतली बनाना सीखा और इसे बच्चों की पढ़ाई को रोचक बनाने में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। 2 जुलाई 2026 को विभाग में उनके 17 वर्ष पूरे हो चुके हैं और उनका यह प्रयोग अब स्कूल की शिक्षण पद्धति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
पुतुल पूछती है सवाल, बच्चे देते हैं जवाब
- फोटो : गांव जंक्शन
कक्षा में अचानक गूंज उठते हैं गीत
अटन कुमार केवल कठपुतली से ही कक्षा को जीवंत नहीं बनाते, बल्कि जब उन्हें लगता है कि बच्चे कुछ नया चाहते हैं, तो वे अचानक गीत शुरू कर देते हैं। कभी अलग-अलग वाद्य यंत्रों का सहारा लेते हैं, तो कभी कविताएं सुनाते हैं, जिससे कुछ ही देर में कक्षा का माहौल बदल जाता है। बच्चे भी साथ गुनगुनाने लगते हैं। पढ़ाई उनके लिए केवल किताब और ब्लैकबोर्ड की बात नहीं रह जाती, बल्कि उसमें गीत, कहानी और अभिनय भी शामिल हो जाते हैं।
पुतुल पूछती है सवाल, बच्चे देते हैं जवाब
कठपुतली के जरिए पढ़ाते समय पुतुल बच्चों से सवाल पूछने लगती है। फिर, बच्चों और पुतुल के बीच संवाद शुरू हो जाता है। गणित में जोड़-घटाव जैसे विषयों को भी छोटी-छोटी कहानियों और बातचीत से समझाया जाता है। इससे बच्चों को हिसाब-किताब बोझिल नहीं लगता। सवाल का जवाब वे केवल याद नहीं करते, बल्कि कहानी के साथ समझने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि गणित और विज्ञान जैसे विषयों में भी कठपुतली का संवाद बच्चों को खासा पसंद आ रहा है।
बच्चों को लुभाती हैं 25 तरह की आवाजें
‘कठपुतली वाले गुरु जी’ की एक और खासियत है। अटन कुमार 25 तरह की आवाजें निकाल लेते हैं। इनमें पशु-पक्षियों, बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और टेलीविजन पर आने वाले कई कार्टून पात्रों की आवाजें शामिल हैं। कक्षा में ये आवाजें कठपुतलियों को और जीवंत बना देती हैं। बच्चों को ऐसा लगता है जैसे उनके सामने सचमुच कई अलग-अलग किरदार बातचीत कर रहे हों।
कठपुतली तैयार होने में लगते हैं सात दिन
अटन कुमार की पत्नी आकांक्षा शुक्ला कठपुतली निर्माण और प्रस्तुति की तैयारी में उनकी प्रमुख सहयोगी हैं। कठपुतली बनाने के लिए अखबार के छोटे-छोटे टुकड़ों को तीन दिन तक पानी में भिगोकर उनकी लुगदी तैयार की जाती है, जिसे सिलबट्टे पर बारीक पीसकर उसमें मेथी मिलाई जाती है। इसके बाद, स्टैंड और चेहरे का सांचा बनाकर उस पर लुगदी लगाई जाती है, धूप में सुखाया जाता है, फिर रंगाई-पुताई कर चटकीले कपड़े पहनाए जाते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में एक कठपुतली तैयार होने में लगभग सात दिन लगते हैं। स्कूल से लौटने के बाद अटन कुमार अगले दिन के पाठ के संवाद, गाने, कविताओं और प्रस्तुति की तैयारी करते हैं। इस पूरे कार्य में आकांक्षा शुक्ला उनका पूरा सहयोग करती हैं। कठपुतली बनाने, सजाने और उसे नया कलेवर देने के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियां भी वह समान रूप से निभाती हैं।
बीआरसी में भी दिखाई जाती है पुतुल कला
- फोटो : गांव जंक्शन
अभिभावकों का भरोसा भी बढ़ा
महोली देहात प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक अटन कुमार शुक्ला का कठपुतली आधारित शिक्षण केवल एक नवाचार नहीं, बल्कि बच्चों और अभिभावकों की सोच में बदलाव का माध्यम बन गया है। 35 वर्षीय मानू राज बताते हैं कि उनके दो बच्चे पहले निजी स्कूल जाने से कतराते थे, लेकिन अब गांव के इसी स्कूल में खुशी-खुशी जाते हैं। एक बार बुखार होने के बावजूद उनका बच्चा स्कूल जाने की जिद करता रहा। उनके अनुसार, कठपुतली के जरिए पढ़ाई बच्चों को खेल जैसी लगने लगी है, जिससे सीखने के प्रति उनका उत्साह काफी बढ़ गया है।
कौतूहल से भरे स्कूल जाते हैं बच्चे
करीब नौ वर्ष की रिया कक्षा चार में पढ़ती हैं। उसके पिता दीवारों की रंगाई-पुताई का काम करते हैं। रिया बताती हैं, ‘स्कूल आने का मतलब है कि आज कुछ नया सीखने को मिलेगा। कहानी वाले सर जी हर दिन मजेदार तरीके से पढ़ाते हैं।' वहीं, कक्षा पांच की छात्रा निशा देवी बताती हैं, ‘मेरा छोटा भाई, जो अभी आंगनबाड़ी जाता है, मेरे साथ स्कूल चलने की जिद करता है, क्योंकि उसे कहानी सुनना पसंद है।'
बीआरसी में भी दिखाई जाती है पुतुल कला
प्रयोगधर्मी शिक्षक अटन कुमार के इस प्रयोग की चर्चा अब स्कूल की चारदीवारी से बाहर भी पहुंच रही है। जब ब्लॉक संसाधन केंद्र (बीआरसी) में कोई कार्यक्रम होता है, तो अटन वहां भी लगभग 10 से 20 मिनट का कठपुतली प्रस्तुतीकरण देते हैं। महोली क्षेत्र के शिक्षक इसे देखते हैं और समझते हैं कि कठपुतली के जरिए शिक्षा को किस तरह रोचक बनाया जा सकता है।
स्कूल के सामने चुनौतियां भी कम नहीं
महोली देहात का प्राथमिक विद्यालय जलालपुर गांव में है, जहां अधिकांश परिवार रंगाई-पुताई, खेती और दिहाड़ी मजदूरी से जुड़े हैं। पारिवारिक कारणों से कई बच्चे नियमित स्कूल नहीं आ पाते, इसलिए औसत उपस्थिति करीब 75 प्रतिशत रहती है। सहायक अध्यापिका सविता सक्सेना अपने एक साल के बच्चे को गोद में लेकर गांव में जागरूकता अभियान चलाती हैं और बच्चों को घर से स्कूल लाती हैं।
सहायक अध्यापिका निधि गोस्वामी बताती हैं कि उनके घर पहुंचते ही बच्चे खुशी-खुशी स्कूल चलने को तैयार हो जाते हैं। सविता बताती हैं, कठपुतली के जरिए पढ़ाई से बच्चों का शिक्षा के प्रति लगाव बढ़ा है, वहीं अभिभावकों को जागरूक करने और छात्र संख्या व उपस्थिति बढ़ाने के लिए भी लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
यहां छिपी है इस प्रयोग की असली ताकत
नवोन्मेषी शिक्षण पद्धति से जुड़ा महोली देहात का यह प्रयोग बताता है कि शिक्षा का माध्यम केवल किताबें नहीं हैं, बल्कि कहानी, गीत और कठपुतली जैसे रचनात्मक माध्यमों से बच्चे कहीं अधिक रुचि लेकर सीखते हैं। अटन कुमार शुक्ला का यह प्रयोग दिखाता है कि जब शिक्षक बच्चों की जिज्ञासा के अनुरूप पढ़ाने का तरीका अपनाते हैं, तो शिक्षण के स्तर में सुधार होता है और स्कूल की तस्वीर भी बदल जाती है। यहां कठपुतली बच्चों से संवाद करती है, उन्हें सोचने के लिए प्रेरित करती है और स्कूल आने के प्रति उनका आकर्षण बढ़ा देती है।
बच्चों में जिज्ञासा स्वाभाविक होती है
विज्ञान गतिविधि केंद्र भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, पुणे के वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी अशोक रुपनेर ने बताया, वर्ष 1996 से 2004 तक महाराष्ट्र के ग्रामीण स्कूलों में मैंने 3,000 से अधिक विज्ञान कार्यशालाएं संचालित कीं और वर्ष 2004 से 2014 तक पद्मश्री से सम्मानित खिलौना गुरु अरविंद गुप्ता के साथ खिलौनों के माध्यम से शिक्षा पर काम किया। मैंने अनुभव किया कि बच्चों में जिज्ञासा स्वाभाविक होती है। कठपुतली व खिलौने उन्हें कुछ नया सीखने के लिए प्रेरित करते हैं। रंग-बिरंगी कठपुतलियां सामाजिक विषयों को भी सरलता से समझा सकती हैं।
(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के अगस्त 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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