विज्ञापन
Home› Lokrang› Holi Special Old Man Looks Like Brother In Law In Phagun

Holi Special: आम की मंजरी की गंध हवा में घुली है, फागुन में मन भी बौराने लगा है-बिना कनक खाए, बिना भांग छाने..

उमेश चतुर्वेदी, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 28 Feb 2026 12:44 PM IST
सार

आम की गांछ मंजरी से भरने लगी है। मंजरियों की मादक गंध हवा में घुलने लगी है। सरसों, तिसी, अरहर, मटर के फूलों की सुगंध हवा में पहले से ही भरी हुई है; तिस पर मंजरियों की गंध ने एक नया माहौल रच दिया है। आम पर ही बौर नहीं लग रहे हैं...मन भी बौराने लगा है...बिना कनक खाए..बिना भांग छाने..बिना मदिरा छलकाए। भोजपुरिया मन इसी माहौल में गा उठता है...फागुन में बुढ़वो देवर लागे।

फागुन में आम पर ही बौर नहीं लग रहे हैं...मन भी बौराने लगा है...बिना कनक खाए..बिना भांग छाने।
फागुन में आम पर ही बौर नहीं लग रहे हैं...मन भी बौराने लगा है...बिना कनक खाए..बिना भांग छाने। - फोटो : दुर्गादत्त पांडेय
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

फगुआ अभी दूर है...बसंत पंचमी की सांझ गहरा रही है...माघ की हवा की तासीर से ठंड कम होने लगी है...पच्छिम जाने वाली डगर के नजदीक वाला बड़का बाबूजी का खेत खाली हो गया है। आलू की फसल खोद ली गई है। लेकिन चनरिका (चंद्रिका) बाबा की एक ही चिंता है...जल्दी से सम्मत की शुरुआत कर दी जाय। वह मोहल्ले के कुछ नवछेटियों (नौजवानों) को फरमान सुना देते हैं - जल्दी से गोइंठा..झाड़, लकड़ी ले जाकर किरिन डूबने से पहले ही खाली पड़े खेत में रख दो। लगे हाथों सुझाव भी दे डालते हैं, लकड़ी-गोइंठा के ढेर के बीच खंभानुमा एक लड़की जरूर खड़ा कर देना। यह खंभा ही पहचान है सम्मत का... सम्मत यानी होलिका का। बसंत पंचमी को रखा गया तो फिर उधर से गुजरते वक्त कोई-कोई गोइंठा, चिपरी या लकड़ी वहां सजाता जाएगा। सम्मत भोजपुरी का शब्द है..जो संवत् का अपभ्रंश है। होलिका ठीक फागुन मास की पूर्णिमा की रात जलाई जाती है। वह संवत् का आखिरी दिन होता है; यानी हम उस दिन पुराने संवत् को होलिका के बहाने जला देते हैं। संवत् यानी भोजपुरिया सम्मत। 
 
आ चुका है फागुन 
पेड़ों की फुनगियां चिकने गुलाबी रंग लिए हरे पत्तों से सज रही हैं। महुआ के पेड़ों पर फूल आ चुका है। आमों के पेड़ बौर से लद चुके हैं। उन पर मधुमक्खियों के झुंड भिनभिना रहे हैं। ब्याह के बाद पहली बार ससुराल आई नवकी (नई) भऊजाइयों ने मोहल्लों के देवरों का चलना दूभर कर दिया है। अब हर गली खतरनाक हो गई है। रात और भिनसार का लिहाज नहीं... पता नहीं कब और कहां से छपाक की आवाज आ जाए। जब तक देवर जी समझें...उनकी पूरी देह सराबोर...गुलाबी, हरे या पीले रंग से। बड़के घर की भऊजाइयां तो सिर्फ रंग से ही सराबोर करने की जुगत भिड़ा रही हैं, लेकिन खेतिहर मोहल्ले की भउजाइयां तो आतताई बन गई हैं। गोबर-माटी, किसी से भी देवर का अचानक स्वागत कर सकती हैं। इसीलिए, अब काम के लिए भी उन मोहल्लों में जाने से फागुन भर जवान लोग बच रहे हैं। जरूरत पड़ी तो घर के बूढ़े-बुजुर्ग को भेज दिया..बड़ों का लिहाज अभी बाकी है। हालांकि, फगुआ यानी होली के दिन उनका भी लिहाज नहीं रहेगा। 

लकड़ी, गोइंठा, हरेठा, तिलंवठ पर चोरों की नजर 
फागुन के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी की रात को सम्मत को गांव-जवार में सबसे बड़ा बनाने की होड़ में मोहल्ले को नौजवान जुट गए हैं। चोरियों का बाजार गर्म है। यह चोरी भी ऐसी है कि चोर को सब जानते हैं, लेकिन उसे पकड़ने में किसी की दिलचस्पी नहीं है। बस चौकसी है कि चोर उनकी कोई कीमती चीज न उठा ले जाएं। चोरों के कई ग्रुप हैं, वे तमाम दरवाजों के आगे से लकड़ी, गोइंठा, हरेठा (अरहर की सूखी लकड़ी), ढाठा (मकई के सूखे पौधे), तिलंवठ (सरसों के सूखे पौधों की झाड़) उठाकर सम्मत पर लाकर रख रहे हैं। बड़ी आपाधापी है। गिलटहवा बाबा, जिन्हें खाट समेत उठाकर सम्मत के पास रख दिया गया था, की नींद खुल जाती है। नींद खुलते ही बाबा देखते हैं कि वे अपनी पलानि (फूस की झोपड़ी) में नहीं हैं, बल्कि खेत में हैं; सम्मत के पास...फिर उनकी गालियां छूट पड़ती हैं। ऐसी गालियां...कि पूछो मत...सुनने वाले और वहां उन्हें लाने वाले सभी भाग खड़े होते हैं। गालियां सुन बाबा के घर के लोग आते हैं...उन्हें घर ले जाते हैं...और साथ में खाट भी। 

होलिका दहन से शुरू होता है उत्सव 
फागुन की आखिरी रात में आसमान में चंदा सोने की थाली जैसा दिख रहा है। उसकी चमक बढ़ रही है। पूजा की थाली सजाकर कोई ले आया है। दिन में घर-घर से उबटन की मैल और लकड़ियां लाकर लोग सम्मत में डाल चुके हैं। होलिका जलाने के मुहूर्त के हिसाब से चनरिका बाबा आ गए हैं। होलिका जलाने के लिए जजमान की खोज होती है। जजमान बनने को कोई तैयार नहीं है। उसे कल पूजा करनी पड़ेगी और ब्राह्मण भोज भी कराना पड़ेगा। इस बीच बाबूजी जजमान बनने को तैयार हो जाते हैं। चनरिका बाबा मंत्र पढ़ते हैं। अक्षत, सिंदूर, जल आदि से पूजा के बाद होली जला दी गई है। देखते ही देखते होलिका जल उठती है। लोग लुकाड़ लेकर भांज रहे हैं। चनरिका बाबा इस बीच वहीं से एक मुट्ठी धूल उठाते हैं। उसे कुछ ऊंचाई से धीरे-धीरे गिराते हैं। उस समय बह रही हवा की दिशा में धूल उड़ने लगती है। चनरिका बाबा धूल की दिशा देख घोषणा करते हैं कि इस बार गरमी कैसी रहेगी...कि इस बार बारिश कैसी होगी...कि इस बार फसल कैसी होगी! गेहूं की गोटगर (दानेदार) बालियां लेकर होलिका में भूना जा रहा है...सब घरों को लौट गए हैं। 

होली के दिन ऐसे रंगीन होता है फगुआ 
सुबह से ही धूम है...मइया के निर्देशन में बड़की माई और माई मिलकर घर के इष्ट देवताओं की पूजा कर रही हैं। पूरी पवित्रता के साथ गाय के घी में घर की चक्की में पिसे आटे से गुड़ वाला पुआ बनाया गया है। प्रसाद का इंतजार हो रहा है। पूजा खत्म होते ही पुए का प्रसाद खाकर जवान और लड़के घरों से निकल पड़े हैं। किसी के हाथ में बांस की बनी पिचकारी है तो किसी के हाथ में पीतल या प्लास्टिक की...वैसे अब बांस वाली पिचकारी कम हो गई है...रंगों की बाल्टियां भरकर रख दी गई हैं। भांग मिलाकर बनाए गए पुए की भी तैयारी है। ये पुए वे तो खाएंगे ही, जो भांग के शौकीन हैं, लेकिन उन्हें भी खिलाया जाएगा...चुपचाप...जो नशा नहीं करते...भांग का नशा अजीब होता है...जब चढ़ता है तो आदमी हंसने लगा तो हंसता ही रहता है...बोलने लगा को बोलते ही रहता है...रोया तो रोता ही रहता है। गांव का फगुआ ऐसी हरकतों से कुछ ज्यादा ही रंगीन हो जाता है। सुबह के वक्त भउजाइयां घरों में खाना बनाने में व्यस्त रहती हैं, लेकिन एक बार खाना तैयार हुआ नहीं कि रंगों के हथियार से वे भी तैयार हो जाती हैं। दोपहर होते-होते गांव का हर रास्ता...हर गली रंगीन हो चुकी है। लोग थकने लगे हैं...नहाने के लिए पोखरे की ओर चल पड़े हैं। चेहरे पर लगे रंग को छुड़ाने के लिए क्या मर्द, क्या औरत, आटा और बेसन मल-मलकर सब परेशान हैं, लेकिन फागुन का रंग बेहद पक्का है...साथ नहीं छोड़ रहा। 

दोपहर को खा-पीकर आराम का वक्त है...
दिन के तीन बज चुके हैं। गाय-गोरूओं को नाद पर खाने के लिए चढ़ा दिया गया है। इस बार आलू की फसल ठीक हुई है, दाम भी बढ़िया मिला है। इसीलिए, घर-घर नए कपड़ों की बहार है। हाथों में अबीर और गुलाल की पोटलियां तैयार हो गई हैं...बच्चे घर-घर जाकर बुजुर्गों के पांवों पर एक चिटुकी अबीर डाल आशीर्वाद बटोर रहे हैं। गांव की लड़कियों का झुंड महिलाओं से अबीर खेलने निकला है। उधर बाबूजी और चाचा मिलकर होरी गा रहे हैं। ढोलक और झाल पर ताल दिए जा रहे हैं, फाग के राग गूंज रहे हैं...

सुरसरि नांव तोहार 
आहो लाल सुरसरि नांव तोहार
अबकी, आहे अबकी पार उतार गंगा मइया
सुरसरि नांव तोहार...

अवध में होरी खेले रघुबीरा, 
अवध में होरी खेले रघुबीरा
केकरा हाथे कनक पिचकारी, 
केकरा हाथे अबीर...
शाम होने तक गुलाल के नशे से आंखें बोझिल हो गई हैं। जिसको जहां ठौर मिलता है...खाट, तख्त पर पड़ जाते हैं...मधुर स्मृतियों के साथ...अगले साल के फाग के रंग के इंतजार में...जब फिर गिलटहावा बाबा की गालियां होंगी, बूढ़े भी देवर लगेंगे...भाभियों की रसभरी मुस्कान होंगी...तब तक रिश्तों की रेल फिर मर्यादा की पटरियों पर बनी रहेगी। 
विज्ञापन
विज्ञापन