कादर कूदर माघ नहाए
सूरमा उ बइसाख नहाए
यह भोजपुरी कहावत है। जो नहाने का महातम बता रही है। इससे यह भी जानिए कि किसी भी पर्व त्योहार का स्नान, ‘बरिस-बरिस के दिन’ का स्नान कितना जरूरी रहा है। और फिर सकरात (मकर संक्रांति) का स्नान तो घर से लेकर घाट तक कितना-कितना जरूरी होता रहा है। अब आप टीवी पर देख लेते हैं। पर, हम बच्चे तब रेडियो समाचार, अखबार से यह ‘स्नान’ जानते थे। और पड़ोसियों से सुनते, जानते थे कि आज फलाने, ढिमाके चाचा, दादी-दादा संगम पर सकरात नहाने गए हैं।
कठउ का आकर्षण
ऐसे में एक निपट देहात के तीन आँगन वाले, कलरव, जनरव और जनसंख्या विस्फोट वाले घर में सकरात के दो-तीन दिन पहले से ही ‘खिचड़ी’ की तइयारी होने लगती थी। आंगन से दुआर तक ‘तिल भेंवाइल की नाss,.. बोरा पर रगड़ाईल?.. सुखाओ.. उठाओ.. लाइ भुजाओ.. मिट्ठा सब बैलगाड़ी पर लाने की चिल्ला पों.. बैल नाधे जा रहे हैं.. तो ‘बैला मरखाह बा, पगहा तुरा के भाग गयिल..’ फिर किसी और का बैल जोत के धान कूटाने जाने का हल्ला। तब धनकुट्टी मिल की 'पुक पुक पुक' हमारे दुआर तक भी सुनाई देती थी। खलिहान उठने के बाद नयका धान के नौका चाउर से ही तो खिचड़ी बनेगी ना... ईया हलकान रहती कि ‘बेरा बीतले कछु करा का फायदा?’ बाबा परेशान होते की दुअरा पर माल-जाल, जाना-जोट्टी देखें कि ईया का चिल्लहट सुनें।
और हम बच्चे? हमें हर हल्ला-हंगामा में शामिल होना था। बच्चों के लिए यह सारा कुछ देखना, इनमें शामिल होना कौतुक था। यही खेल था हमारा। जो शुरू होता था खिचड़ी के दिन लाइ, तिलुआ बनाने के लिए एक कठउ गाड़ा से। इसमे भर गाड़ा (कठउ - जिसके पहिए काठ के होते थे) मिठ्ठा और उसके बगल में रखे बड़का झांझ (पीतल का बहुत बड़ा बटुला, जिसमें तीन साल का बच्चा पूरा आ जाए) में रखे गए राब का आकर्षण होता था। राब मिट्ठा बनाने की प्रक्रिया में बचा गुड़ का गाढ़ा घोल होता था।
उत्सवी मिजाज
सत्तर-अस्सी के दशक का बिहार.. सकरात में भारी शीत लहर होती थी। अखबार और रेडियो मे पाले से नष्ट हुई फसलों की खबर और शीत लहर से हुई मौतों की खबर होती थी। मगर खेती-किसानी वाले उसे परिवार की आजी, फुआ का उत्सवी मिजाज इन प्रकोपों से जरा नहीं डरता था।
घाम नहीं है। लेकिन, चिउरा के लिए धान और तिलुवा के लिए तिल बड़ी-बड़ी बाल्टी, झांझ में भेंवा रहा है। आंगन के एक ओर के बरामदे में छौ अछियां माटी के चूल्हा पर बालू गरम हो रहा है। सुकई बौ, मनभरनी, बान्हो फुआ और कलौतिया की माई झरनी, सुप्पा लेकर बैठ गई हैं। चंगेली में बोरा का उसिना चाउर महाबीर उझिल दिए हैं। चूल्हे के एक ओर चइली (सूखी कटी लकड़ियां) और पतहर रखा गया है। ईया बता रही हैं और भूजा भुजा रहा है। गरम बालू में चाउर को थोड़ा-सा भें कर डालो और चार-पांच सरकंडों से चलाओ भूजा फूटने लगे और पतहर के जलने की चट-चट और भूजा का पट-पट की जुगलबंदी होने लगे तो बस माटी का हंडिया झप्प से चूल्हे से उतार कर झरना में पलट लो। झरना आगे पीछे हिला के सारा बालू नीचे और भूजा सुप्पा में। सुप्पा से फटक के फिर बड़े-बड़े माटी के कूंड़ में। इस काम को करते हुए वे सब लोग गीत गाती रहती थीं। हम बच्चे भी जिद करते उनके साथ काम करने को तो बस हमें चूल्हे में पतहर झोंकने को बिठा दिया जाता। पूरा आंगन भूजा-भूजा महकता रहता शाम तक। काम करते हुए गीत गाना तो तब नियम जैसा था। सिर्फ भूजा भूजने के समय ही वे लोग देई-देता (देवी-देवता) का गीत गातीं। आपस में फिर वे लोग गारी गाने लगतीं बाद में और हँसती।
चिउरा से गमकता वो आंगन
अगले दिन दृश्य बदलता। आज चिउरा कुटाना है। आंगन के इस बरामदे में एक ओर ढ़ेंकी है (आज भी है) इस बरामदे में एक ओर पानी से छानकर रखा हुआ धान अभी बहुत गीला है। ईया ने आंगन में ईंटों के चूल्हा पर बड़का तवा रखवा के दो मर्दाना लोगों को धान उलाने (हल्का गर्म करने) को कह दिया है। इधर ढ़ेंकी का दांता बदला जा रहा है। चिउरा वाला दांता लगाकर उलाया धान कूटा जा रहा है। झरना, सुप्पा लिए कलौतिया की माई, मनभरनी, बान्हो फुआ तैनात हैं। ढ़ेंकी से चिउरा झरना में फिर सुप्पा से फटक कर चंगेली में रखा जा रहा है। पूरा आंगन, बहरौटी के चौखट तक मह-मह गमक रहा है। छोटका चाचा घर में घुसते ही दुआरी से ही चिल्लाते आते हैं- “मर्चा के चिउरा कुटाता का ss माई आज भात न खाएम..”
तमाशबीन और भोजपुरी में लरिआते हम चचेरे, फुफेरे सतरा (सत्रह) बच्चे चाचा की टेर पर उनके पीछे अपनी अदृश्य दुम हिलाते चल पड़ते चिउरा के लिए। लेकिन, ईया तो ईया हैं। एक दाना भी खिचड़ी के पहले छूने नहीं देती। 'देई-देता, पितर-पुरनिया के चढ़इले बिना तहनी के दे दीं?? राकस (राक्षस) कहीं के.. भाग ईंहां से।' मगर हम लोग छोटे-छोटे कुकुर शावकों की तरह बिना किसी रोहा-रोवट के वहीं एक ओर बैठ जाते मन ही मन किंकियाते हुए। दिन भर ढ़ेंकी से चिउरा कुटाता रहता।
खिचड़ी का दिन
खिचड़ी अब कल ही है। नवका धान का चावल फटका के कोठार घर में रखा गया है। बाजार से भी आज कुछ तरकारी आ गई है कल के दान के लिए। बोरा में से नून काढ़ के पत्ता में लपेटने के लिए खारिका भी रखा गया है। कोंहार काका माटी का छोटा, बड़ा पतुकी, कोसा, परइ लेकर आ गए हैं। इसी में कल चावल, नून, आलो, भंटा आदी, छिमी, कोन लाई, तिलुवा और पैसा रखकर छूना है दान के लिए। फिर पंडित, भिखार, साधु, डोम जो आए उसको देना है।
घाम नहीं है। बोर चट्टी पर करिया तिल रगड़ने-रगड़ते कल बेचू बौ का हाथ करिया हो गया है। अब उसका भूसा भटक रही है थोड़ा उलिया कर। चूल्हा पर बड़का कड़ाही चढ़ गया है। बल्ली चाचा मिट्ठा गला रहे हैं। गरम मिट्ठा आदि और तिल गमक रहा है। लाइ, तिलुवा बंधा रहा है। पहले हाथ से फिर डागरा में डाल के डगराते हुए खूब सुंदर गोल-गोल लाइ बना रही हैं अम्मा, चाची, बल्ली चाचा और फुआ। आज हम बच्चों को बहुत ज्यादा भूख लग रही है, मगर ईया के पितर-पुरनिया जब तक सकरात का परनामी नही ले लेंगे, नेवानी नहीं कर लेंगे, दही चिउरा, नौका चाउर के खिचड़ी और तरकारी, पापड़ का, हमें कुच्छो नहीं मिलेगा। हम लोग रोज वाला दाल-भात तरकारी, दही खा रहे हैं पीढ़ा पर बैठ कर।
आज खिचड़ी है! सूरुज भगवान घट्टा में नहीं हैं। खूब कुहासा है। हाड़ कंपा देने वाला जाड़ा है। पर, आज सयान त सयान, लयिकन पर भी कोई दया मया नहीं है। सबके ऊपर प्यार लुटाने वाली बड़की फुआ आज एकदम गजबे रूप में है। डांढ़ में अंचरा खोंसे एक-एक बच्चे को खींच के आँगन में खड़ा कर दी हैं।
तीन आँगन वाले, जनसंख्या विस्फोट वाले उस घर के इस माटी वाले आँगन में एक तरफ चापाकल है, थोड़ा चौड़ा ‘सिरमिन्ट’ किया हुआ। एक ओर ईंटों वाले चूल्हे पर बड़का पीतल वाला हमारी अम्मा का दहेजी और ईया का गुमान झांझ चढ़ा हुआ है, जिसमें से लगातार रस्सी वाली बाल्टी से गर्म पानी निकाला जा रहा है और ठंडा पानी डाला जा रहा है। पता नहीं बड़का लोग नहाया कि नहीं, पर बच्चों पर आज आफत है। जिन दुलरुवा-मलरुआ बच्चा लोग को दस दिन से तेल लगाकर और बस हाथ मुँह धुला के, कपड़ा बदल के राजा-बाबू बनाया हुआ था; आज वे सभी धोए जाएंगे।
हम बहनें तो सीधी थीं। अपने से नहा लेती थीं। समझना तो भाई लोग को था। बड़की फुआ एक-एक के हाथ- पैर मलती, सिर धोकर गरम पानी से नहलाती जा रही है। उसे सफाई पसंद है बहुत। जो बच्चा माई रेss अम्माँ रेss कह के चिल्ला रहा है उसे वह उसके लायक थूर पटक के धो रही है। ऐसी धुलाई में संजू, मंटू और छोटका, मोटका जोशिया भी है। भले वह ‘बाप लेs मुंआ दहलछ फुआss चिल्ला रहा है, मगर फुआ ने रगड़-रगड़ के उसका हाथ देह लाल कर दिया है। संजू अपने टूटे दाँतों से बेइश्टी (बेइज्जती) कहने पर दो लप्पड़ खाए हैं। अभी और बाकी बच्चे बुआ का यह रूप देख खुद ही नहाने लगे हैं। घंटा भर से ऊपर चलता यह स्नान पर्व।
लाई, तिलुवा का इंतजार
बरिस-बरिस के दिन बिना नहाए भला कोई काम होता है? लाई, तिलुवा के लिए लपलपाती जीभ को अभी और सब्र करना है। जैसे ही रसोई की ओर मुंह करते हैं; बल्ली चाचा जनेव से अपनी पीठ खुजाते बगल की कोठरी में ले जाते हैं, जहां लोटा के जल को अंजुरी में लेकर, आंख बंद कर सब देई-देता, पितर-पुरनिया को प्रणाम करना होता। फिर, अंजुरी का जल अपनी वाली पतुकी के चारों ओर गिरा के, पतुकी में रखा तरकारी नून, आदी और लाई तिलुवा को छूकर प्रणाम किया जाता। और तब कहीं जाकर इस विकट और घोर तपस्या का वरदान - लाई तिलुवा हाथ पर मिलता, जिसे खाने में घर के सभी बड़ों को प्रणाम करना हर बच्चा भूलता ही भूलता।
सकरात का दही-चिउरा मिट्ठा, खिचड़ी-तरकारी दोपहर का भोजन होता। हम पिढ़ई, बिठई पर बैठकर केले के पत्ते पर खिचड़ी खाते। दुआर पर जब गांव आता खिचड़ी खाने तो हम सब बच्चों को पीतल की चार कटोरी, (जो एक बड़ी डंडी से चारो ओर से जुड़ी होती थी) से तरकारी परोसना अच्छा लगता। पीतल की बाल्टियां बहुत भारी होती थीं, जो हमसे नहीं उठतीं। फिर भी हम दो-दो भाई बहन एक बाल्टी को टेका कर ले जाते और गांव वालों को केले के पत्ते पर खिचड़ी परोसते। ऐसा करते हुए हम खुद के जिम्मेदार और कर्मठ होने के गुमान से भर जाते।
अब खिचड़ी में बहुत वेरायटी (तिल, गुड़, मूंगफली) शामिल हो गई है। इस अवसर की बहुत-सी खास मिठाइयां भी हमने खा ली हैं, कई प्रांतो की। मगर यकीन कीजिए हमारा, हमें हर साल गांव की अपनी केले के पत्तों वाली खिचड़ी बहुत याद आती है। लाई, तिलुवा और चिउरा भूजा का वो रेलम पेल, मीठी झिड़कियां, मर्चा के चिउरा की तरह ही गमक रही हैं।
अब ग्रह-नक्षत्र की चाल, स्नान-दान आदि का वैज्ञानिक महत्व आप जानिए समझिए। हम तो इतना ही समझते हैं कि - वे दिन कितने सुंदर थे!
सबके जीवन में त्योहारों का यह उत्सव और उमंग बनी रहे। शुभकामना।