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ग्रामयुग : एक चिलम हो तो मुंह से सिर्फ गाली निकलती है, तीन चिलम हो जाएं तो गूंजने लगता है देवी का मनान

देव प्रकाश चौधरी, गोड्डा (झारखंड) Published by: Umashankar Mishra Updated Sun, 15 Dec 2024 11:29 AM IST
सार

मोतिया पंचायत में ही आता है सौतारी। संथालों की छोटी-सी बस्ती। चुनाव के फैसले सौतारी की बैठक में भी होते हैं। वहां मिट्टी के चुक्कड़ों की तरह दिल भी टूटते हैं। कई बार शादी का प्रस्ताव भी पास होता है। और हां, जो कभी नहीं गाते, वे भी सौतारी में बैठकर झूम-झूमकर गाने लगते हैं। वहां से बाहर निकलते हुए मोतिया के बाबूलाल राम का गुनगुनाना याद आता है-

फुलवारी के भौंरा रे, फुलवारी के भौंरा,
ऐसो जनम बहुरी नहीं पय्येंह, फुलवारी के भौंरा...

यह कहानी झारखंड के गोड्डा जिले के मोतिया गांव की है।
यह कहानी झारखंड के गोड्डा जिले के मोतिया गांव की है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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सिरो सिंह घाट-घाट का पानी पी चुके हैं। बरसों पहले कोलकाता-दिल्ली कमा कर लौटे थे गांव। ठोस, द्रव्य और गैस, तीनों तरह के नशे से कोई परहेज न तब था और न आज है। आते ही गांव में कुछ चेले-चपाटे बन गए और वे जख बाबा के अरदास में मगन हो गए। सड़क किनारे कुछ पेड़-पौधों की सेवा की। राहगीरों के लिए पीने के पानी का इंतजाम किया। लोगों ने जख बाबा पर सिक्के चढ़ाने शुरू किए। बटोहियों ने कहा- "बड़ा भला आदमी है।" लेकिन उनके इस भलेपन को गांव के कुछ लोग चिलम से ही जोड़कर देखते हैं। सिर्फ एक चिलम हो तो मुंह से सिर्फ गाली निकलती है, दो चिलम में खुद का बखान और तीन चिलम हो जाए तो देवी का मनान-

दुर्गा माय के अंगना अड़हूल फूल गछिया हे,
फुलवा फुलावे लालम लाल मैया जगतारण हे।


कई बार अदंत मुंह से शब्द स्पष्ट बाहर नहीं आते। गले की थरथराहट से सुर नहीं संभलते और छंगुरिया की ढोलक जब बेताला होने लगती है तो वह मनान की जगह दूसरा रस खोजने लगते हैं-

एक समय में ऐसा देखा, वानर दूहे गाय,
खग से दुहे, मुख से पीए, खोआ बनारस जाए।


कभी-कभार देवी मंदिर के कीर्तन में भी गाते हुए उन्हें देखा जा सकता है, लेकिन वे अक्सर अकेले गाते हैं। परंपरागत गायन में दक्ष गांव के लोग पीठ पीछे सिरो सिंह को 'गवैया' नहीं मानते हैं- ''धान न बोले-बोले भूसा।'' सामने कोई नहीं कहता। कहकर कोई देखे! झगड़ने से पहले जनमत को अपने पक्ष में कर लेने की कला आती है सिरो सिंह को। उनके लिए हमेशा सामूहिक स्वर रिजर्व रहता है- ''इन्साफ बात बोलते हैं सिरो सिंह।'' और इन्साफ न हो तो सिरो सिंह का माथा चकराने लगता है।

वैसे गांव में माथा किसी का थिर नहीं। इन दिनों तो गांव के एक-एक आदमी का माथा चकरा रहा है। अडाणी पावर प्रोजक्ट के तहत जमीन के मुआवजे की रकम ने अच्छे-अच्छों का माथा घुमा दिया है। ऊपर से विधानसभा चुनाव। रिजल्ट के बाद बहुतों की गर्मी बढ़ गई। कई लोगों की कम भी हुई।

यह कहानी झारखंड के गोड्डा जिले के मोतिया गांव की है। गांव बड़ा है। बड़े-बड़े पदों पर लोग हैं। धन-धान्य है तो राजनीति भी है। बेहद पढ़े-लिखे गांवों में गिनती होती है। यहां रह रहे लोगों की दुनिया थोड़ी बड़ी होती जा रही है... अब उनके पास जोमेटो और स्वीगी का स्वाद है। स्मार्ट फोन और स्मार्ट टीवी है। फिर भी गांव का मूल मिजाज वही है। आज भी उनके पास अरहर के खेत हैं, ताक-झांक है, लाजवंती के पौधे हैं, वशीकरण का फॉर्मूला है, परमज्ञानी होने का दर्प है, किताब न उलटाने का सुख है और हर मामले पर बिना बाधा अपनी राय देने का संतोष है। कई ऐसे लड़के हैं, जो क्या काम करते हैं, उनके सिवाय कोई नहीं जानता। स्कूल-कॉलेज छूट गए, लोगों के वे स्वंयभू लीडर हैं। ऐसे स्वंयभू ली़डर को देखकर गांव में झंझट वाली जमीन के सर्वस्वीकार्य पंच बासुदेव भैया की हंसी कंठ में फंसकर बाहर निकलती है- ''जमाना बहुत खराब है।''

खराब जमाने की बात सुनकर प्रमोद पाठक अपनी हंसी नहीं रोक पाता- ''जमाना जिसको देखना हो, वह शाम मे सौतारी जाए।'' गांव में हर जीवित प्राणियों (गाय, बैल, भैंस, कुत्ता, बिल्ली, बकरी और इन्सान) के डॉक्टर पाठक बताते हैं- ''सौतारी में जिंदगी का जश्न 40 रुपये लबनी बिकता है। जिसके पास पैसा है, वह 100 रुपये खर्च कर महुआ लेता है।''

मोतिया पंचायत में ही आता है सौतारी। संथालों की छोटी-सी बस्ती। चुनाव के फैसले सौतारी की बैठक में भी होते हैं। वहां मिट्टी के चुक्कड़ों की तरह दिल भी टूटते हैं। कई बार शादी का प्रस्ताव भी पास होता है। वहां से निकलने के बाद बहुतों के दिल ऐसे होते हैं, जो मानते नहीं। फिर वे वहां से कहां जाते हैं, यह रहस्य और शोध का विषय है, जिस पर डॉक्टर पाठक कुछ नहीं कहते। और हां, जो कभी नहीं गाते, वे भी सौतारी में बैठकर झूम-झूमकर गाने लगते हैं। वहां से बाहर निकलते हुए मोतिया के बाबूलाल राम का गुनगुनाना याद आता है-

फुलवारी के भौंरा रे, फुलवारी के भौंरा,
ऐसो जनम बहुरी नहीं पय्येंह, फुलवारी के भौंरा।


यह होली गीत है। होली का जिक्र होते ही कारू महरा की आंखें चमक उठती हैं- ''खूब गाया है और खूब धौल भी खाया है दिनेश मरीक से।'' दिनेश मरीक को भी गुरु मानते हैं कारू महरा। वैसे लोक में किसी का कोई एक गुरु नहीं होता। गाते-बजाते सीखते हैं सब। कारू महरा ने भी ऐसे ही सीखा है- ''देवी पर भरोसा न हो तो आप देवी मनान नहीं गा सकते। ताल वाला बेताला हो जाएगा और सुर वाला बेसुरा। और हां, ऐसे नहीं सीख सकते आप। बहुत मेहनत के बाद देवी भक्ति करने का सौभाग्य मिला है। गुड़ गंजन सहे तो मिसरी नाम धराए।''

''गांव में जिस भक्ति से कारू महारा गाते हैं, दूसरा कोई नहीं'', देवी दुर्गा के परम भक्त झुनकी झा कहते हैं, उनके टोले में भी देवी का मंडप है। रात में वहां गायन होता है।
सच है कि मेरे गांव में परंपरागत गायन को बचाए रखने वालों में से एक हैं कारू महरा। जिस गांव में मौलिक, अप्रसारित और अप्रकाशित गालियों का विशाल भंडार सैकड़ों लोगों के कंठ के नीचे सुरक्षित हो, उसी गांव में लोक गायन की यह परंपरा उत्साह के साथ जीवित है।

कारू महरा हमें भी रात में आने का न्योता देते हैं। मैं उनके टोले के मंडप पर रात के नौ बजे पहुंचता हूं। गायन शुरू है। कारू महरा गा रहे हैं-

पान बिनु याहो भगता हो,
औ मुखवा मलिनवा हो।


यह देवी का आवाहन है। गाते हुए देवी को बुलाया जाता है। गाते हुए विदाई भी दी जाती है। यह लोक का संगीत है, लोक की आस्था है, लोक का उत्साह भी। अभी भगता की असवारी नहीं हुई है। भगतिया लोग गा रहे हैं-

पांच बहिन देवी के मैया 
पांचों हे कुमारी 
पांचों अगम अपार...


संजय महरा झूम रहा है, जिस पर असवारी होनी है। डोमा ढोल पर है। उमेश गा रहा है। बाकी लोग झाल पर हैं। श्रोता मंडली में महिलाओं की संख्या कम नहीं। अचानक महिला मंडली में खुसुर-पुसुर शुरू हो गई। गौर करने पर लगा कि पहले पनघट पर महिलाओं के बीच जो कानाफूसी होती थी, पनघट के नहीं रहने के बाद वह अब कीर्तन मंडली के दर्शकों के बीच शिफ्ट हो गए हैं। खुसुर-पुसुर बढ़ जाती है। कारू महरा को गुस्सा आता है। लेकिन मंडली में गुस्सा नहीं होना चाहिए। सिर्फ कड़ी निगाह से महिला मंडली को देखते हैं। गायन जारी है। भगता की असवारी नहीं हुई है। भगतिया लोग अब ओरहना गा रहे हैं। ओरहना यानी उलाहना। प्यार से देवी को उलाहना दिया जाता है कि अगर भक्तों की आप नहीं सुनेंगी तो फिर कौन पूजा करेगा और क्यों करेगा।

आग जल रही है। अगरबत्ती की सुगंध फैल रही है। लोग झूम रहे हैं। मेरा मन भी वहां से झूमता हुआ बाहर आया। कारू महरा का हो या सिरो सिंह का हो मनान, सैकड़ों लोगों को इसी परंपरा से तो मिलती रही है आने वाले कल के लिए उष्मा। कौन कैसा गाता है, इसकी फिक्र लोक समाज को नहीं होती। गाने को लेकर उत्साह और श्रद्धा देखते हैं लोग। लेकिन लोक की एक चेतावनी भी होती है, आप धार्मिक विश्वास की वैज्ञानिक व्याख्या कतई न करें। इन लोगों के पास विश्वास की जो पूंजी है, वह पूंजी बची रहे तो बेहतर!
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