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ग्रामयुग : लोक देवता के दरवाजे पर लोगों की 'जातुरि', हुड़के की धुन पर रात भर होती है लोहाखाम देव की स्तुति

देवेन्द्र मेवाड़ी, वरिष्ठ लेखक एवं कथाकार Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 17 Feb 2025 01:41 PM IST
सार

पहाड़ में हमारे गांव के रक्षक तो लोक देवता हुए। सुख-दुख में हम उन्हीं की शरण में जाते। खुशियों को उनका आशीर्वाद मानते और दुख-तकलीफ में उन्हीं से विनती करते कि "हे देवो, दाहिने हो जाना। भूल-चूक माफ करना हमारी।" 

लोगों की ‘जातुरि’निशान (ध्वज) लेकर हुड़का, ढोल, नगाड़े, मशकबीन बजाते-गाते पूजा के लिए जाती है।
लोगों की ‘जातुरि’निशान (ध्वज) लेकर हुड़का, ढोल, नगाड़े, मशकबीन बजाते-गाते पूजा के लिए जाती है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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आइए, मेरे गांव के लोक देवता लोहाखाम के पर्व में चलते हैं। यह पूजा-पर्व ग्यारह-बारह साल में मनाया जाता है। गांव से दूर जंगल में एक पहाड़ी पर स्थित है लोहाखाम देवता का थान। इस पूजा-पर्व के आयोजन के लिए इलाके के सभी गांवों के लोगों को न्योता दिया जाता है। तब हमारे गांव कालाआगर का हर घर मेहमानों की मेजबानी करता है और हर घर में मेहमानों के लिए खाने और रहने की व्यवस्था रहती है। 

पूजा में भाग लेने के लिए लोगों की ‘जातुरि’ (यात्रा) आती हैं। वे निशान (ध्वज) लेकर हुड़का, ढोल, नगाड़े, मशकबीन बजाते-गाते आते हैं। पूजा आपस में जुड़े ढालूदार छतों वाले मकानों यानी बाखली में होती है। लोग सारी रात ‘श्योंरात’ में भाग लेने के लिए बाखली के लंबे-चौड़े आंगन में आ जाते हैं। वहां बांज के सूखे मोटे तने के टुकड़ों का अंगीठा धुधकाया जाता है, जिसके चारों ओर रात भर डंगरिए नाचते हैं। आंगन में लोग गोल घेरे में बांहें थाम कर पूरी रात लोकगीत गाते हैं।

चलिए, सामने भवान सिंह जी की चाख (बाहर का कमरा) में पूजा की शुरुआत हो गई है। सांझ के शुभ मुहूर्त में कमरे के पूर्वी कोने में अखंड ज्योति जला दी गई है। कैड़ागांव के जगरिया गणेश राम और ईश्वरी राम हुड़के और ढोल-दमामों के साथ तैयार हैं। गणेशराम हुड़के पर धीरे-धीरे थपकियां देने लगे हैं -

दुम्हल्या...तुतम! दुम्हल्या...तुतुम!

सूरज पश्चिम में ऊंचे पहाड़ के उस पार उतर चुका है। दूर हिमालय से, नीली पर्वतमालाओं से, अगास से, पताल से संध्या झुलि आई है। संझबाती जग गई है। दुलैंच (आसन) बिछ गए हैं। उन पर लोहाखाम लोक देवता के पुजारी और डंगरिए विराजमान हो गए हैं।

लोहाखाम के पुजारी हरीशचंद्र जी ने देवता का झगुला (चोला) पहन लिया है। लाल पटुवा (शाल) ओढ़ लिया है। सिर पर टांका (पगड़ी) बंधवा लिया  है। गुरु गोरखनाथ के डंगरिया सोबन सिंह को भी पटुवा ओढ़ा कर टांका बांध दिया गया है। बाकी डंगरिए भी धोती-पटुवा पहन रहे हैं। सभी पुरोहित श्वेत-सुकीले वस्त्रों में बिराजमान हो गए हैं। 

गणेशराम ने हुड़के की धुन पर देव स्तुति शुरु कर दी है। सामने पूजा सामग्री के बीच शंख, पंचमुखी शंख, घंटा-हथौड़ी, कसासुरी थाल, ताली और नगाड़े रखे हैं। पास ही चौंरीगाई की पूंछ और मोरछड़ रखी हुई है। 


अचानक ईश्वरी और गणेश ने हुड़का छोड़कर बड़े जोश के साथ ढोल बजाना शुरू कर दिया है- 

किड़...किड़...किड़...किड़! 
द दुंग दुंग दुंग! 
द दुंग दुंग दुंग!


ढोल के बोल क्या गूंजे कि गणेशराम के मुंह से भी देवताओं को न्योतने के तेज बोल फूट पड़े हैं-

‘तबेत बाबा! महरजान को राजा, पुजी पठौंनों
पांव परदा लैनों, सिर पड़ी ढोक दिनों
औन सुर्ज, पौन पानी
धरती धरम राज, गिरी कैलाश
तबेत बाबा! ’
द दुंग....दुंग...दुंग!


डंगरिया एक-एक कर झूमने लगे हैं। लोहाखाम के पुजारी मुट्ठी भर-भर कर अक्षत लेकर चारों ओर छिटक रहे हैं। पुजारी हाथ में चौंरी गाई की पूंछ झुलाते हुए लोगों को आशीर्वाद दे रहे हैं।

द दुंग....दुंग...दुंग! 

जगरिया गणेश पूरी रौ में गा रहे हैं-

“अगाश में क्व छैं ? इंदर राजा
पंयाल में क्व छैं? बैशी नाग
जैक सिर में चौंखुंडा धरती, नौखुंडा मनिमा
गैला पंयाल, ऊंचा हिवाल
चार दिशा छैं, चार भुवन छैं...”
द दुंग...दुंग...दुंग! 


कई डंगरिए थर्राने लगे हैं। भीड़ बढ़ रही है। डंगरिया नाचते-नाचते बाहर खोलीखांड़ (आंगन) में आ गए हैं। वहां अंगीठा धू-धू कर धुधक रहा है। आसन बिछ गए हैं। उन पर लोहाखाम पुजारी और गोरखनाथ जागा (मंदिर) के डंगरिए बिराजमान हो गए हैं। सामने जगरिया गणेश और ईश्वरिया बैठ गए हैं।

द दुंग... दुंग...दुंग! 
बीच-बीच में बाजा बदल रहा है-
दनकि...दनन...
दनकि...दनन !
दनकि...दनन... दनकि....दनन!


लोहाखाम पुजारी आशीर्वाद दे रहे हैं...भलो है जालो तुमरो...हे गुरु! सतगुरु आदेश! आदेश!

द दुंग...दुंग...दुंग...!

भीड़ बीच-बीच में जयकारा लगा रही है...लोहाखाम देवता की जै! भगवती माता की जै! अब तक सत्रह डंगरिए नाच चुके हैं।

‘पू ऊ ऊ ऊ ह’ 

शंख बज रहा है। कसासुरी थाल झन्न्ऽ झनझना रहा है। भ्वां करके पंचमुखी शंख बज उठा है। ताली की खिन-खिन के साथ ही घंटियां टुन-टुना रही हैं। बीच-बीच में घंटे की टन्न...टन्न आवाज।
रात का दूसरा पहर है। इधर अंगीठे के चारों ओर डंगरियों के नाचने की धुरमंडल मची है, तो उस पार आंगन से लोकगीतों की आवाजें आ रही हैं-

दानि शौकाऽ
दानि शौका, सबौं हन दयालि है जौ बालिपाऽ
लोपचुली-लोखाम सा बालिपा!


सुबह का उजाला हो रहा था। झमाझम वर्षा भी 
हो रही थी, जो अब जाकर कुछ कम हुई है। पुजारी कह रहे हैं- “चलो, चलते हैं। हल्की वर्षा तो चलती ही रहेगी।”

गणेश और ईश्वरी ने हाथ जोड़कर ढोल पर बाजा बदल दिया है -

किड़ किड़ किड़ किड़ किड़
द धंग, द धंग!
द दुंग दुंग दुंग
द दुंग दुंग दुंग!


गणेश जोर-शोर से बिनती कर रहा है-

तबेत बाबा!
क्षीर सागर छैं
जै में बिश्नु अवतार छैं
जैकी नाभी में अमरित छ
नाभी नली बटी, पैद बनिगीं सुर्ज कमल
सुर्ज कमल में सतजुगी ब्रह्मा छैं !


बाहर बहुत हल्की वर्षा जारी है। लोहाखाम के पुजारी को कंधों पर बिठाकर मंदिर तक ले जाने के लिए सजी-धजी चौकी आ चुकी है। पुजारी चौकी में बैठ गए हैं और चार लोगों ने उन्हें चौकी सहित कंधों पर उठा लिया है और वे चारों नंगे पैर चल पड़े हैं जंगल में लोहाखाम मंदिर की ओर।

पू ऊ ऊ ऊ ह!
द, डिंग डिंग डिंग!


पीछे-पीछे डंगरिए और लोगों की लंबी कतार और उनका जयकारा- लोहाखाम देवता की जै!   

बांज-बुरोंज के जंगल के पार लोहाखाम मंदिर दिखने लगा है। डोला लोहाखाम मंदिर की धार में पहुंच गया है। वर्षा की हल्की फुहारों के बीच जयकारे के साथ चौकी लोहाखाम मंदिर के चबूतरे पर उतार दी गई है। पूजा अनुष्ठान शुरू हो गया है। हुड़का, मशकबीन की धुनों के साथ गाते-बजाते, नाचते लोग आते जा रहे हैं।

पूजा अनुष्ठान पूरा हो गया है। लोहाखाम देवता की ओर चादरों की ओट करके बकरों की बलि दी गई है। अब लोग मंदिर में खा-पीकर लौट रहे हैं। शाम से ही लोकगीत गाए जा रहे  हैं। घर के भीतर पूजा भी शुरु हो गई है। जगरिया गणेशराम और ईश्वरीराम के ढोल के बोल फिर से बज उठे हैं-

किन किन किन....द धंग! द धंग!

गणेशराम गरज उठा है- 

“भोर भाब्बा!” 
"तैंतीस करोड़ द्याप्तां कैं न्योंत पड़िगै
तब सतजुगी ब्रह्मा ले
यश्मीर यज्ञ सुजै
जैलि सुजै चार धाम, चार खाम! भोर भाब्बा!...


रात का समय है। डंगरिया नाचते-नाचते फिर बाहर ‘खोलीखांड’  में आ गए हैं। अंगीठे की धूनी के चारों ओर नाचने लगे हैं। लोगों की भारी भीड़ जमा है। 

द दुंग दुंग दुंग! द दुंग दुंग दुंग!

डंगरिए अक्षतों से दिशाएं साध रहे हैं। फलों और अक्षतों की भेंट देते हुए आशीर्वचन कह रहे हैं...

“इनऽ मोतिकाऽ दानाऽ, त्वै हन दयालि हैऽ जाला...”। 

वे चौंरीगाई की पूंछ से दुःख-तकलीफ, रोग- शोक झाड़ रहे हैं। तसले में से गेहूं लेकर चारों ओर छिटकते हुए ‘ताड़’ मारने लगे हैं। बाजे बज रहे हैं- 
पू ऊ ऊ ऊ ह! टन्न् टन्न्! झन्न्!
टिन-टिन, टुनटुन!
द दुंग दुंग दुंग! द दुंग दुंग दुंग!


गणेश और ईश्वरीराम के हाथ ढोल पर बिजली की गति से चल रहे है- 
द दुमलि दुमलि दुमलि दुंग! 
द दुमलि दुमलि दुमलि दुंग! 


डंगरिए शांत हो रहे हैं। बाजा थम रहा है। गुड़ और घी की ‘शिरनी’ बांटी जा रही है। प्रसाद के रूप में दूध और चावल का बना ‘खिर-खाजा’ बंट रहा है। 

सिरखुरी के भोज में हलुवा, पूरी, पुए, सब्जी और बलि के बकरों का पका मांस परोसा जा रहा है। शाकाहारी लोग शाकाहार कर रहे हैं। खाना खाने के बाद लोग लोकगीत गाने में जुट गए हैं।

तीन दिन से थके-थकाए लोग आषाढ़ के बादलों को देखकर बारिश का अनुमान लगा रहे हैं। हम भी आकाश की थाह लेकर लौट रहे हैं।
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