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Sali Puja Of Lukluki One Day When The Whole Village Becomes A Devotee Of Maa Kali
गांव की आस्था का उत्सव : लुकलुकी की साली पूजा, एक दिन, जब पूरा गांव बन जाता है मां काली का भक्त
प्रीतिमा वत्स, चित्रकार और लेखिका
Published by: Umashankar Mishra
Updated Fri, 16 May 2025 03:57 PM IST
सार
झारखंड के गोड्डा जिले के लुकलुकी गांव में हर साल चैत माह में मनाई जाने वाली "साली पूजा" एक पुरानी लोक परंपरा है। योगिनी माता और काली माता की आराधना, फुलैस का गिरना, गांवबनन्ही की परिक्रमा, झांप-मडरी और सामूहिक प्रसाद जैसी अनूठी रस्में इसे विशिष्ट बनाती हैं।
देवी की वंदना और लोक परंपराओं का पर्व है झारखंड की साली पूजा।
- फोटो : गांव जंक्शन
साली पूजा झारखंड के गोड्डा जिले के एक छोटे-से गांव लुकलुकी में हर साल होने वाला एक लोक अनुष्ठान है। लुकलुकी में ही मेरा बचपन बीता। चालीस बरस पहले लुकलुकी में जिस अंदाज में साली पूजा होती थी, आज भी करीब-करीब वही रंग बरकरार है। चैत के महीने में होने वाली यह पूजा पूरे गांव में एक उत्सव का माहौल लेकर आती है।
सुबह से ही सब लोग जल्दी-जल्दी अपने घर का काम निपटाकर और नहा-धोकर बाल-बच्चों सहित मंदिर की तरफ बढ़े चले जा रहे हैं।
बूढ़े पीपल के नीचे योगिनी मां के स्थान पर पूजा-अर्चना शुरू हो चुकी है। ढोलक और घंटे की आवाज धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। गांव का बूढ़ा पुजारी फुलैस लगाकर दोनों हाथ पसारे मां के सामने खड़ा है। गांव की महिलाएं करुण स्वर में देवी का मनान गा रही हैं। इसके पीछे पूरा गांव बिल्कुल समर्पण की मुद्रा में हाथ जोड़े फुलैस के गिरने की प्रतीक्षा में खड़े हैं।
करुण हो रहा है गायन का स्वर
प्रतीक्षा की घड़ी ज्यों-ज्यों लंबी हो रही है; सबकी व्याकुलता बढ़ती जा रही है। महिलाओं के गायन का स्वर और करुण हो रहा है। बूढ़ा पुजारी तो मानो अब रो ही देगा! पिछले करीब आधे घंटे से सभी योगिनी मां के दरबार में हाथ जोड़े खड़े हैं। यहां से ही साली पूजा की शुरूआत होती है।
जैसे ही फुलैस गिरा; पुजारी सहित सभी लोगों के चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ पड़ी। सभी माता के जयकारे लगाने लगे। ऐसा लगा मां का आशीर्वाद मिल गया। महिलाओं ने गाना बंद किया और सबने एक साथ सीस नवाकर देवी मां का आशीर्वाद लिया। बूढ़ा पुजारी अपनी कटार लेकर माता काली मां के मंदिर की तरफ चल पड़ा, उसके पीछे फुलधरिया (पुजारी का मुख्य सहयोगी), जो पूजा की पूरी जिम्मेदारी देखता है।
काली मां के मंदिर में माता की एक पिण्डी है, जिसके सामने दीवार पर उनका शृंगार किया हुआ है और लाल रंग का आंचल ढंका रहता है। ढेर सारे झांप और माला चढ़ी होती हैं। साल में एक बार यह आंचल बदला जाता है। पुजारी ने पहले पुराने वस्त्र हटाकर सिंदूर और घी से शृंगार किया; फिर नए वस्त्र बदले। फिर, नई झांप और माला पहनाई गई। इस साल तो ढेर सारे झांप हैं चढ़ाने के लिए। घर में कोई शुभ कार्य होने या कोई मन्नत पूरी होने पर लोग यहां झांप चढ़ाते हैं।
पान के पत्ते पर धरा जाता है फुलैस
झांप चढ़ाने के बाद काली मां की पिण्डी के आगे पान के पत्ते पर फुलैस धरा जाता है। बूढ़ा पुजारी पुनः मां के आगे हाथ पसार कर खड़ा हो जाता है। गांव की महिलाएं अब काली मां का मनान गीत गाने लगती हैं। मंदिर के बाहर गांव के लोग फुलैस के गिरने की अर्थात माता के आशीर्वाद की प्रतीक्षा में होते हैं। कभी-कभी पुजारी के ऊपर माता भी आ जाती हैं और वह जोर-जोर से झूमने लगता है। धूप और गुग्गल की खुशबू से पूरा मंदिर सुगंधित और धुएं से भर जाता है। पुजारी को ज्यों ही भाव आता है, धूप और गुग्गल की मात्रा और बढ़ा दी जाती है। सभी माता के आदेश की प्रतीक्षा करने लगते हैं।
उस वक्त पुजारी के मुख से निकली हुई वाणी को लोग सीधे मां का आदेश मानते हैं और उसे पूरा करने की पूरी कोशिश करते हैं।
जब काली मां की पिण्डी पर रखा हुआ फुलैस गिर जाता है, तब पान और बतासे बांटे जाते हैं। पुजारी का फुलधरिया, जो सामान्यतः उसके परिवार
की ही कोई महिला होती है, घी और सिंदूर से भरा हुआ माता के शृंगार वाला कांसे का कटोरा
लेकर आती है और सभी महिलाओं और बच्चों
को टीका लगाती है।
गांव में घूमने की प्रक्रिया 'गांवबनन्ही'
जब पूजा संपन्न हो जाती है, तो पुजारी अपने हाथ में धूपदानी और कटार लेकर गांव की परिक्रमा करने के लिए निकलते हैं। पीछे-पीछे फुलधरिया ढेर सारा गुग्गल धूप और पूजा की अन्य सामग्री लेकर आती है। थोड़ी-थोड़ी देर बाद गुग्गल धूपदानी में डालती रहती है। परिक्रमा के दौरान पूरे गांव के लोग यथासंभव उनके पीछे-पीछे चलते हैं। ढोलक और घंटे भी साथ में बजते रहते हैं।
काली मां के मंदिर से निकलकर यह काफिला शीतला माता के मंदिर में जाता है। पूजा और फुलैस कराते हैं। शृंगार के साथ आंचल चढ़ाते हैं। यहां पर झांप के साथ-साथ मडरी भी चढाई जाती है। मां का आशीर्वाद लेते हैं, तभी आगे बढ़ते हैं। पूरे गांव में घूमने की इस प्रक्रिया को 'गांवबनन्ही' कहते हैं। इस दौरान पूरे गांव के बाहरी मुहाने पर जहां-जहां भी लोक देवी-देवताओं का निवास माना जाता है, वहां पर रुककर एक संक्षिप्त पूजा अर्चना की जाती है और उनका आशीष लिया जाता है।
'गांवबनन्ही' के समय पुजारी को मंदिरों के अलावा कहीं रुकने की अनुमती नहीं होती।
पूरा गांव घूमने के दौरान नाले, तालाब, खेत सब आते हैं और पुजारी नंगे पांव हाथ में धूपदानी और कटार लेकर बिना रुके चलते जाते हैं। तीन पहर बीतने पर जब वह वापस काली मां के मंदिर में आते हैं, तो उनकी ताजगी में जरा भी कमी देखने को नहीं मिलती।
यह लोक की आस्था है या देवी मां का आशीष पता नहीं, पर जब हम सबके पैर छालों से भरे होते थे, कई लोग गिरते पड़ते पहुंचते थे, वहीं पुजारी के कदम न तो कहीं डगमगाते दिखते थे, न ही छाले उनके पांव में होते थे।
मंदिर पर वापस आते ही ठंडे पानी से पुजारी का पैर पखारा जाता है। पैर धोकर वह मंदिर में प्रवेश करते हैं। धूपदानी और कटार किनारे रखकर मां के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। पूरे गांव की समृद्धि और सुख-शांति की कामना करते हैं। फिर, लोगों को प्रसाद बांटा जाता है।
अहाते में बंटता है प्रसाद
उस दिन शाम को प्रसाद के रूप में आस्वाद भोजन बनता है। भोजन में ढेर सारी मौसमी सब्जियों को डालकर देसी घी में खिचड़ी पकाई जाती है। माता के भोग के बाद पूरे गांव के लोग इस प्रसाद को मंदिर के अहाते में जमीन पर बैठकर खाते हैं। कुछ लोग घर भी ले जाते हैं। बगैर नमक के बनने बाला यह प्रसाद अद्भुत होता है।
साली पूजा का क्यों है इतना महत्व?
लोक देवी-देवताओं के जितने भी स्थान होते हैं, सब जगह विधि-विधान से पूजा हो जाती है, मरम्मत हो जाती है। सबसे पहला फायदा तो यही होता है कि गांव की सब जातियों के लोग एक साथ जमा होते हैं। गांव मे लोक देवी-देवताओं का एक भय व्याप्त है, जो पूरे गांव को एक साथ जोड़े रखता है।
क्या है झांप और मडरी
झांप सनठी और कागज से बनने वाला एक मंजूषानुमा आकार होता है, जिसे कच्चे रंग से रंगकर सजाया जाता है। इनमें गुलाबी, हरा और पीले रंग का उपयोग किया जाता है। मडरी कागज और गत्ते के बने हुए गोल-गोल रिंग के आकार के होते हैं और कच्चे रंगों से ही सजे होते हैं। इसे माली और पटेवा जाति के लोग बनाते हैं।
कैसे होता है फुलैस
पान के पत्ते पर धुले हुए कच्चे चावल को गुंबदनुमा बनाकर रखा जाता है और उसके ऊपर एक सुपाड़ी रखी जाती है। जब यह चावल का गुंबदनुमा आकार गिरता है, तो उसे मां का आशीष माना जाता है।
क्यों करते हैं 'गांवबनन्ही'
लोक मान्यता के अनुसार, 'गांवबनन्ही' करने से बुरी आत्माओं और आपदाओं से गांव की रक्षा होती है। साथ ही, एक जरूरी काम यह हो जाता है कि गांव के बड़े- बुजुर्गों की नजर में गांव की समस्या आ जाती है और उसका निवारण आसान हो जाता है। जैसे कहीं कूड़े का ढेर पड़ा है, कहीं नाला टूटा है, कोई चापाकल खराब है, तो उसे नोट कर लिया जाता है।
इस तरह, भागदौड़ भरी जिंदगी के दौर में भी एक दिन पूरा गांव साथ मिलकर बिताता है। उस वक्त यहां अमीर या गरीब कोई नहीं होता, सब बस मां के भक्त और उनकी संतान होते हैं। सभी जाति के लोगों की सहभागिता से यह साली पूजा संपन्न होती है। जो पूजा के दिन पवित्र ढोलक बजाते हैं, वह डोम जाति के होते हैं। गांव के इन मंदिरों के पुजारी खेतौरी जाति के हैं। मंदिर की साफ-सफाई का काम करने वाले ज्यादातर तेली जाति के लोग हैं। आस्वाद भोजन का निर्माण भी सभी लोग मिलकर ही करते हैं।
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