ग्रमीण जीवन और इसकी लोक परंपराओं में कई ऐसी बातें बेहद गहराई तक रची-बसी हैं, जो बिना किसी दिखावे के निभाई जाती हैं। ये लोक परंपराएं जिंदगी से जुड़ी गतिविधियों के साथ दूध में चीनी की तरह घुली-मिली हुई हैं। इनके लिए किसी आयोजन की जरूरत नहीं पड़ती, ये तो बस ऐसे ही चलती रहती हैं। निमाड़ अंचल में रक्षाबंधन से पहले निभाई जाने वाली एक खास परंपरा वीरपोस लोकजीवन की इसी सहजता और सुंदरता को जीवंत कर देती है।
रक्षाबंधन पर बहन को आमंत्रण
सावन के महीने में रक्षाबंधन का त्योहार आता है, जब बहनें-बेटियां मायके आती हैं और साल भर का नेह बांट जाती हैं। पूरे निमाड़ में रक्षाबंधन के पूर्व आने वाले रविवार को वीरपोस पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भाई अपनी बहन को शगुन के रूप में गेहूं, चावल, कपड़ा, नारियल, मिठाई व अन्य उपहार देकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। साथ ही, अपनी गृहस्थी में रची-बसी बहनों को रक्षाबंधन पर मायके आने के लिए निमंत्रण भी दिया जाता है। वीरपोस पर्व को बहन को रक्षाबंधन का आमंत्रण देने का दिन माना जाता है।
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भाई-बहन का प्यार और सम्मान
भाई-बहन के रिश्ते में किसी तरह की औपचारिकता की कोई जगह नहीं होती, लेकिन ब्याही हुई बहन के साथ उसके परिवार का मान-सम्मान भी जुड़ जाता है। इसलिए, आमंत्रण देना एक सम्मानजनक परंपरा बन जाती है। ब्याह के बाद अपने ससुराल की गृहस्थी संभालने में व्यस्त बहन क्या बिना बुलाए या बिना सम्मान के पीहर आ जाएगी? नहीं, उसे उसके परिवार के मान-सम्मान का ध्यान रखते हुए बुलाना पड़ता है।
भारतीय परिवार की परंपरा में हर रिश्ते का सम्मान होता है। अगर भाई अपनी बहन को मर्यादा और सम्मान के साथ बुलाने जाता है तो बहन और उसका परिवार भी भाई के आने पर उसका पूरा मान-सम्मान रखता है। जब भाई आने वाला होता है तो बहन भी उसका स्वागत करने की पहले से ही तैयारी करने में जुट जाती है। वो भाई के लिए वस्त्र और भोजन की व्यवस्था अपने सामर्थ्य के अनुसार करती है और इस काम में उसका ससुराल पक्ष भी पूरा साथ देता है।
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मंगल भाव और पारंपरिक रीतियां
परिवार की हर परंपरा मंगल की कामना से जुड़ी होती है और जहां सबके मंगल की भावना होती है, वहां रोली, अक्षत, नारियल, वस्त्र, आभूषण और दीप प्रज्ज्वलन साथ हो लेते हैं। आमंत्रण देने आए भाई को उसकी बहन बड़े ही स्नेह से भोजन कराती है, फिर टीका करके भेंट भी देती है। भाई अपने सूप में गेहूं, नारियल, गुड़, पैसा, कोई वस्त्र और कुछ राशि रखकर बहन, जीजा और बच्चों को रक्षाबंधन पर घर आने का आग्रह करता है।
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लोक-कथा में छिपा अनूठा संदेश
लोकजीवन से जुड़े उत्सवों के साथ लोक-कथाएं भी जुड़ जाती है। वीरपोस उत्सव से भी एक कहानी जुड़ी है, जो काफी मशहूर है। एक गरीब भाई अपनी मां के कहने पर बहन को न्योता देने जाता है और कहता है, ‘मेरे पास बहन को देने के लिए कुछ नहीं है।’ मां कहती है, ‘नदी की रेत, एक पत्थर और थोड़ी धूल अपने गमछे में बांध ले।’ वो ऐसा ही करता है और बहन के घर की ओर निकल पड़ता है। रास्ते में नदी, शेर, सांप जैसे खतरे आते हैं, लेकिन वो कहता है, ‘मैं बहन को बुलाने जा रहा हूं, तुम अपना काम बाद में कर लेना।’ उसके नेह यानी प्यार को देखकर सब उसे जाने देते हैं।
बहन के घर पहुंचकर वो संकोच से गमछा एक ओर रख देता है। लेकिन, यह क्या उस गमछे में गेहूं, चावल, गुड़, वस्त्र और सिक्के मिलते हैं। उधर, बहन अपने भाई का तिलक करती है और रास्ते के लिए पूजन सामग्री व मिठाई देती है। लौटते वक्त भाई नदी को चुनरी ओढ़ाकर, सांप को दूध पिलाकर और शेर को मिठाई देकर प्रसन्न करता है। इस तरह, भाई-बहन, दोनों का जीवन सुखी रहता है।
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कहने को तो यह सादी-सी कहानी लगती है, लेकिन इसका निहितार्थ देखिए, भाई देने के भाव से चला है तो प्रेम व स्नेह से अभिसिंचित मन से नदी की धूल और पत्थर भी मूल्यवान अन्न-धन में बदल जाते हैं। कहानी यही तो कह रही है कि देने का मन तो बनाओ, जो तुम्हारे पास अर्थहीन है, वह भी कई गुना संपत्ति में बदल जाएगा। फिर, लौटती राह में बहन के नेह से बांधी कुछ वस्तुओं से रास्ते की बाधा और क्रूरता भी हार जाती है। यही तो संदेश है कि भाई के प्रेम के बदले बहन की मंगलकामना ने भाई के रास्ते की हर बाधा को हर लिया।
लोक यही तो सिखाता है, एक-दूजे के लिए मंगल भाव से भरे होने का पाठ, भाई स्नेह से भरकर गया और बहन का मान-सम्मान रख लिया, बहन ने भाई की कुशलता और सम्पन्नता की कामना की, जो पूरी हो गई। आखिर, रक्षाबंधन भी तो एक-दूसरे के संबंध की रक्षा का पर्व है। सूप, गेहूं, चावल, गुड़, वस्त्र और नकद राशि सुख, सौभाग्य और समृद्धि के प्रतीक ही तो हैं।
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हर बहन को स्नेह भरे निमंत्रण की प्रतीक्षा
बहन को भाई को प्यार से बुलाने के लिए न बड़ा धन चाहिए और न बड़ा आयोजन और न ही हर बार बुलावे पर कोई आ पाता है। लेकिन, बुलावे का और निमंत्रण का मूल भाव तो स्नेह है, जिसे बनाकर रखा जा सकता है। संबंधों में रूखेपन ने सुख-सौभाग्य की कामना की नमी को भी एक औपचारिकता बना दिया है। संबंध अब संपन्नता के आधार पर देखे जाने लगे है, भेंट में दिए जाने वाले गुड़ की मिठास, गेहूं की उत्पादकता, रोली का रंग, अक्षत की अक्षत कामना और दीप की उजास किसी संपन्नता की मांग नहीं करती, वह तो बस स्नेह की कामना करती है, अपनत्व की अपेक्षा रखती है। बंदिनी फिल्म का वह गीत, ‘अबके बरस भेज भैया को बाबुल’ में हर बहन इसी स्नेह निमंत्रण की प्रतिक्षा करती है।
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अन्न का सौभाग्य, रोली का रंग
निमंत्रण देने को भी उत्सव में बदल देने वाली संस्कृति है भारतीय संस्कृति। याद कीजिए विवाह या अन्य मांगलिक अवसरों पर दिए जाने वाले निमंत्रण की। वह भी एक बड़ा कार्य होता था, घर की सबसे अधिक व्यवहार कुशल, मृदुभाषी, प्रसन्नचित महिला को यह दायित्व सौंपा जाता था कि वह बुलावा दे आए, मंगल गीत गाने का, कथा-व्रत का, तीज त्योहार का, विवाह या भोज का, ताकि अतिथि बुलावा देने के तरीके में ही आत्मीयता से ओतप्रोत हो जाए और चला आए आपके मंगल प्रसंग का साक्षी बनने।
निमंत्रण देना भी एक कला है, भरे मन से, आग्रह अनुग्रह से, स्नेह से भरे दो मीठे बोल बोलकर जब कोई पुकारे, ‘जब कहे कि बहन चली आना, तेरे बिना आंगन, आंगन नहीं लगता, कुछ दिन आएगी तो हमारी सूखी बगिया हरिया जाएगी, बालवृंद अपनी बुआ से मिलकर प्रसन्न होंगे, माता-पिता का मन लगेगा, तो ले बहन गुड़ की मिठास, अन्न का सौभाग्य, रोली का रंग और धन की सम्पन्नता तेरे घर बनी रहे और उसी सुख-सम्पन्नता का आशीर्वाद अपने भाई को देने तू आ जाना।’ इस तरह कोई बुलाए तो बहन कहीं भी हो, दौड़कर कैसे न पहुंचे अपने भाई के घर और कैसे न लुटा दे आशीर्वादों का कोष।
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बदले में बहन भी टीका लगाकर कहती है, ‘तू बुलाने आया तो क्यों नहीं आऊंगी, जरूर आऊंगी।’ मां-पिता का घर, तेरी ड्योढ़ी, भाभी का राज-काज, शृंगार, बच्चों का कोलाहल, अपने पीहर की गलियां, सखी-सहेलियों से मिलने, देखने क्यों नहीं आऊंगी? आऊंगी भर-भर लुटाऊंगी प्यार, आंचल भर ले आऊंगी, मन भर ले जाऊंगी, हां केवल लेने नहीं आऊंगी, तेरे आशीर्वाद से अब तेरी बहन भी संपन्न है तो भाई, भतीजे और भाभी के लिए क्या लाऊं बताता जा, उसकी पसंद सुझाता जा, जा भाई, खुश रह प्रसन्न रह और ऐसे ही हर वीरपोस पर न्योता देने आते रहना, मेरी आंखें रास्ता देखती रहेंगी तेरा।’
धीरे-धीरे खत्म होती जा रही परंपरा
समय के साथ ये परंपरा धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। रिश्तों में औपचारिकता, ठंडापन और जिंदगी की भागदौड़ ने कई परंपराओं को हमसे छीन लिया है। अब दूर रहने वाले भाई-बहन सालों तक नहीं मिल पाते, तो उनके यहां रक्षाबंधन भी नहीं मनाया जाता और वीरपोस फिर भला कैसे मनाया जाए? अब तो सारे रिश्ते फोन पर निभाए जाते हैं और भागती दुनिया में फोन करने की फुर्सत भी नहीं बची, हालांकि ग्रामीण इलाकों में ये रीतियां अभी भी चल रही हैं।