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जब डॉक्टर नहीं, सिस्टम इलाज करता है : आदिवासी गांवों में टेलीमेडिसिन से बदली स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर

शिरीष खरे, स्वतंत्र पत्रकार और लेखक Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 17 Feb 2026 07:34 PM IST
सार

महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर बदल रही है। यहां स्थायी डॉक्टरों पर ग्रामीणों की निर्भरता कम हो रही है। लोगों को बिना लंबी दूरी तय किए टेलीमेडिसिन, आशा कार्यकर्ताओं और प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे के जरिये इलाज उनके गांवों में ही मिल रहा है। 

गढ़चिरौली जिले के दूरदराज आदिवासी इलाकों में अब इलाज किसी आपात स्थिति का इंतजार नहीं करता।
गढ़चिरौली जिले के दूरदराज आदिवासी इलाकों में अब इलाज किसी आपात स्थिति का इंतजार नहीं करता। - फोटो : AI
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विस्तार
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गढ़चिरौली जिले के एटापल्ली ब्लॉक में बसे आदिवासी गांव में रहने वाली सुकली बाई की कहानी किसी सफलता की गाथा जैसी नहीं लगती। यहां न तो किसी अत्याधुनिक अस्पताल का उद्घाटन हुआ, न किसी डॉक्टर ने असाधारण सेवा का दावा किया। फिर भी यह कहानी खास है, क्योंकि इसमें इलाज हुआ और वह भी बिना मरीज को गांव से बाहर ले जाए, बिना डॉक्टर की स्थायी मौजूदगी के। 

कुछ साल पहले तक चक्कर, कमजोरी और बढ़ते ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं आदिवासी इलाकों में चुपचाप सह ली जाती थीं। दूरी, खर्च और अनिश्चितता इलाज को टालने के बहाने बन जाते थे। इस बार ऐसा नहीं हुआ। आशा कार्यकर्ता ने घर जाकर जांच की, एएनएम ने प्राथमिक परीक्षण किए और स्वास्थ्य केंद्र से जिला अस्पताल के डॉक्टर से टेलीमेडिसिन के जरिये संपर्क किया गया। रिपोर्ट डॉक्टरों से साझा हुई, दवाएं तय हुईं और इलाज गांव में ही शुरू हो गया। यह किसी असाधारण हस्तक्षेप का परिणाम नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र की उस ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में बदलाव की तस्वीर है, जहां 16 आदिवासी जिले हैं, जिनमें 5 संवेदनशील हैं और 6 अत्यंत दुर्गम क्षेत्रों में हैं।

ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर बहस दशकों से डॉक्टरों की कमी और खाली अस्पतालों तक सीमित रही है। महाराष्ट्र ने इस सोच से हटकर यह स्वीकार किया कि हर गांव या आदिवासी क्षेत्र में स्थायी डॉक्टर उपलब्ध कराना फिलहाल संभव नहीं है, और इसी यथार्थ को नीति की आधारशिला बनाकर व्यक्ति-केंद्रित के बजाय व्यवस्था-केंद्रित ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की दिशा में पहल की है।

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हेल्थ फील्ड में नेटवर्किंग
इस बदली हुई सोच का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि इलाज को किसी एक उपस्थिति पर निर्भर नहीं रखा गया। महाराष्ट्र ने स्वास्थ्य सेवाओं को जिला अस्पतालों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें नीचे की ओर फैलाया। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, उपकेंद्र और फील्ड स्तर पर काम करने वाले स्वास्थ्य कर्मियों को केवल औपचारिक इकाइयों के रूप में नहीं, बल्कि सक्रिय इलाज व्यवस्था के रूप में देखा गया। राज्य में सैकड़ों किलोमीटर तक फैले ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में यह समझ विकसित की गई कि बीमारी की पहचान और शुरुआती हस्तक्षेप जितना स्थानीय स्तर पर होगा, उतना ही बड़े अस्पतालों पर दबाव कम पड़ेगा। इसका मतलब यह नहीं था कि जिला या मेडिकल कॉलेज अस्पतालों की भूमिका घटाई जाए, बल्कि यह कि उन्हें एक नेटवर्क के हिस्से के रूप में जोड़ा जाए।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और उपकेंद्रों की भूमिका 
इस मॉडल में केवल रेफरल तक सीमित नहीं रही। नियमित जांच, गर्भवती महिलाओं की निगरानी, बच्चों के पोषण का आकलन, टीकाकरण और गैर-संचारी रोगों की शुरुआती पहचान जैसे कामों को गंभीरता से लिया गया। इसका असर यह हुआ कि बीमारी उस स्तर पर पकड़ में आने लगी, जहां इलाज अपेक्षाकृत सरल और सस्ता होता है। इससे स्वास्थ्य सेवा किसी एक दिन या एक मुलाकात की घटना नहीं रह गई, बल्कि एक सतत प्रक्रिया में बदल गई। यह बदलाव खास तौर पर उन इलाकों में महत्वपूर्ण साबित हुआ, जहां अस्पताल तक पहुंचना ही एक बड़ी चुनौती रहा है।

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इस पूरी व्यवस्था में आशा कार्यकर्ता और एएनएम की भूमिका निर्णायक बनकर उभरी है। महाराष्ट्र ने इन्हें केवल योजनाओं की सूचना देने या टीकाकरण तक सीमित नहीं रखा। वे अब स्वास्थ्य तंत्र की ऐसी मजबूत कड़ी हैं, जो मरीज, परिवार और व्यवस्था को जोड़ती हैं। आदिवासी इलाकों में, जहां बीमारी के साथ सामाजिक और आर्थिक जोखिम भी जुड़े होते हैं, ये कार्यकर्ता घर-घर जाकर स्थितियों की पहचान करती हैं। कुपोषण, एनीमिया, गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताएं या पुरानी बीमारियां - इन सभी मामलों में शुरुआती हस्तक्षेप इन्हीं के जरिये होता है। इससे इलाज आपात स्थिति का इंतजार नहीं करता, बल्कि पहले से सक्रिय हो जाता है।

टेलीमेडिसिन रणनीति से तुरंत इलाज 
महाराष्ट्र के ग्रामीण स्वास्थ्य मॉडल में टेलीमेडिसिन का जुड़ना इसी सोच का विस्तार है। इसे तकनीकी चमत्कार की तरह नहीं, बल्कि प्रशासनिक जरूरत के रूप में अपनाया गया। राज्य ने यह मान लिया कि विशेषज्ञ डॉक्टरों की स्थायी मौजूदगी हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर संभव नहीं है। ऐसे में विशेषज्ञता को डिजिटल माध्यम से गांव तक पहुंचाया जाए। टेलीमेडिसिन के जरिए पीएचसी और उपकेंद्रों को जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों से जोड़ा गया। मरीज की जांच स्थानीय स्तर पर होती है, रिपोर्ट डॉक्टरों से साझा की जाती है और विशेषज्ञ डॉक्टर चिकित्सीय सलाह देते हैं। इससे इलाज की प्रक्रिया गांव में ही शुरू हो जाती है और केवल गंभीर मामलों में रेफरल की जरूरत पड़ती है।
महाराष्ट्र में टेलीमेडिसिन सेवाएं वर्ष 2007 से शुरू हुईं और अब व्यापक रूप से लागू हैं।

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आज यह सेवा 24 जिला अस्पतालों, 37 उप-जिला अस्पतालों और 13 ग्रामीण अस्पतालों तक उपलब्ध है, जो इंटरनेट और तकनीकी उपकरणों के जरिए मेडिकल कॉलेजों से जुड़े हैं। राज्य स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 से 2025 की पांच वर्षों की अवधि के दौरान कुल करीब 91,87,682 मरीजों को विशेषज्ञ सलाह हेतु टेली-कंसल्टेशन सुविधा के लिए रेफर किया गया।

यह व्यवस्था विशेष रूप से महाराष्ट्र के आदिवासी जिलों में वरदान साबित हुई है। मेलघाट, पालघर गढ़चिरौली, नंदुरबार और नासिक की आदिवासी पट्टी लंबे समय से स्वास्थ्य सेवाओं की कठिन परीक्षा लेती रही है। यहां न केवल मानव संसाधन की चुनौती है, बल्कि सड़क, परिवहन और संचार जैसी बुनियादी सीमाएं भी बाधा बनती हैं। इन इलाकों में स्वास्थ्य सेवा को व्यक्ति आधारित मॉडल पर टिकाए रखना लगभग असंभव है। महाराष्ट्र ने यहां व्यवस्था आधारित मॉडल को अपनाया, जहां एक कड़ी के कमजोर पड़ने पर भी पूरी प्रणाली ठप नहीं होती। इलाज मरीज को लंबी दूरी तय कराने के बजाय नेटवर्क के जरिए आगे बढ़ता है।

इस पूरे मॉडल का एक महत्वपूर्ण पहलू प्रशासनिक सोच में आया बदलाव है। पहले किसी स्वास्थ्य केंद्र पर डॉक्टर की अनुपस्थिति को व्यवस्था की विफलता माना जाता था। अब इसे एक ऐसी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है, जिसके साथ काम किया जा सकता है। इसका असर नीतिगत फैसलों में साफ दिखता है। स्वास्थ्य सेवाओं की योजना बनाते समय अब यह सवाल पूछा जाता है कि उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग कैसे किया जाए। यह दृष्टि स्वास्थ्य व्यवस्था को यथार्थवादी बनाती है, जहां आदर्श परिस्थितियों के इंतजार के बजाय मौजूदा हालात में समाधान खोजे जाते हैं।

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जवाबदेही का ढांचा
विकेंद्रीकरण के साथ एक जोखिम यह भी होता है कि जवाबदेही बिखर जाती है। महाराष्ट्र ने इस खतरे को ध्यान में रखते हुए निगरानी और रिपोर्टिंग की व्यवस्था को मजबूत किया है। डिजिटल रिकॉर्ड, नियमित समीक्षा बैठकों और ब्लॉक तथा जिला स्तर पर निगरानी के जरिए यह सुनिश्चित किया गया है कि व्यवस्था सक्रिय बनी रहे। यहां डिजिटल टूल्स का उपयोग केवल आंकड़े जुटाने के लिए नहीं, बल्कि निर्णय लेने के लिए किया जा रहा है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर नजर रखना अपेक्षाकृत आसान हुआ है। फिर भी यह मॉडल चुनौतियों से मुक्त नहीं है।

नेटवर्क की उपलब्धता, डिजिटल साक्षरता, उपकरणों की कमी और स्वास्थ्य कर्मियों पर बढ़ता कार्यभार कई इलाकों में समस्या बना हुआ है। गंभीर मामलों में मरीज को जिला या मेडिकल कॉलेज तक पहुंचाना जरूरी होता है, जो हर बार आसान नहीं होता। इसके बावजूद, इलाज की निरंतरता पहले की तुलना में बेहतर हुई है और यही इस मॉडल की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

महाराष्ट्र का अनुभव यह नहीं कहता कि डॉक्टरों की जरूरत नहीं है, बल्कि ये बताता है कि स्वास्थ्य सेवाओं को केवल डॉक्टरों की उपलब्धता पर छोड़ देना व्यावहारिक नहीं है। कोई भी मजबूत व्यवस्था डॉक्टरों की अनुपस्थिति को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती, लेकिन उसके असर को काफी हद तक कम कर सकती है। देश के लगभग सभी राज्यों में ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियां कमोबेश समान हैं। ऐसे में महाराष्ट्र का यह मॉडल केवल एक राज्य की कहानी नहीं रह जाता, बल्कि एक राष्ट्रीय संदर्भ प्रस्तुत करता है।

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अंततः यह अनुभव इस ओर भी संकेत करता है कि स्वास्थ्य सेवा का भविष्य केवल बड़े अस्पतालों और विशेषज्ञ केंद्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि मजबूत स्थानीय नेटवर्क में छिपा है। जब इलाज व्यक्ति से निकलकर व्यवस्था पर टिकता है, तब वह रुकता नहीं है। ग्रामीण महाराष्ट्र में यही बदलाव दिखाई दे रहा है - जहां डॉक्टर हमेशा मौजूद न हों, फिर भी सिस्टम इलाज करता रहता है।

(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के फरवरी 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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