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एग्रो-वोल्टाइक मॉडल : सौर संयंत्रों का ताप कम करने और खेती संग बिजली उत्पादन का वैज्ञानिक समाधान...

पी.एस.ओझा,  पूर्व राज्य समन्वयक,  यू.पी. राज्य जैव-ऊर्जा विकास बोर्ड Published by: Devesh Saraswat Updated Mon, 16 Feb 2026 12:20 PM IST
सार

ग्रामीण भारत में बड़े सौर संयंत्र 'सोलर फोटोवोल्टाइक हीट आइलैंड इफेक्ट' का कारण बनकर स्थानीय स्तर पर तापमान बढ़ा सकते हैं। इससे खेती, पशुपालन और जल चक्र पर असर पड़ सकता है। सौर पैनलों की छाया में हल्दी, लेमनग्रास, सर्पगंधा जैसी कुछ चुनिंदा फसलें उगाने से ग्रामीणों को अतिरिक्त आय मिलेगी और स्थानीय तापमान भी संतुलित रहेगा।
 

क्या है एग्रो-वोल्टाइक मॉडल?
क्या है एग्रो-वोल्टाइक मॉडल? - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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पृथ्वी पर ऊर्जा की लगातार बढ़ती मांग और जीवाश्म ईंधनों से होने वाले गंभीर पर्यावरणीय नुकसान ने सौर ऊर्जा को एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में स्थापित किया है। अपनी स्थिरता, प्रदूषण-मुक्त प्रकृति और बढ़ते निवेश के कारण सौर फोटोवोल्टाइक तकनीक को व्यापक स्वीकृति मिली है, लेकिन विज्ञान को केवल वरदान साबित करने के लिए इसके दूरगामी प्रभावों पर भी आरंभ से ही विचार जरूरी है। यदि गीगावॉट स्तर के सौर संयंत्रों की योजना में संतुलन नहीं रखा गया, तो इनके परोक्ष प्रभाव के रूप में उभरता 'सोलर फोटोवोल्टाइक हीट आइलैंड इफेक्ट' भविष्य में स्थानीय तापमान वृद्धि और पर्यावरणीय दुष्प्रभावों का कारण बन सकता है।

क्या होता है हीट आइलैंड इफेक्ट
हीट आइलैंड इफेक्ट आमतौर पर शहरी क्षेत्रों में देखा जाता है, जहां प्राकृतिक सतहों की तुलना में मानव निर्मित संरचनाएं अधिक गर्मी को अवशोषित कर वातावरण में वापस छोड़ती हैं, जिससे स्थानीय तापमान बढ़ जाता है। बड़े सौर फोटोवोल्टाइक संयंत्रों में लगे पैनल सूर्य के प्रकाश को बिजली में बदलते हैं, लेकिन लगभग 70 प्रतिशत ऊर्जा गर्मी के रूप में पैनलों और आसपास की सतहों को गर्म कर देती है। इस अतिरिक्त गर्मी के कारण सौर संयंत्रों के आसपास का क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक गर्म हो जाता है। इसी स्थानीय तापमान वृद्धि की स्थिति को सौर 'फोटोवोल्टाइक हीट आइलैंड इफेक्ट' कहा जाता है।

ऊर्जा अवशोषण और ताप उत्सर्जन 
सौर फोटोवोल्टाइक हीट आइलैंड इफेक्ट मुख्य रूप से सौर पैनलों द्वारा ऊर्जा के अवशोषण और ताप के रूप में उसके उत्सर्जन से उत्पन्न होता है। सौर पैनल सूर्य से आने वाले विकिरण के एक हिस्से को विद्युत ऊर्जा में बदलते हैं, कुछ हिस्से को परावर्तित करते हैं, जबकि शेष ऊर्जा गर्मी में परिवर्तित हो जाती है। जब यह गर्मी पैनलों, मिट्टी, संरचनाओं और आसपास की हवा में फैलती है, तो स्थानीय वातावरण का तापमान बढ़ने लगता है, जिससे हीट आइलैंड जैसी स्थिति बनती है।

अल्बेडो में बदलाव और सौर संयंत्रों की संरचना
अल्बेडो किसी सतह की उस क्षमता को कहते है, जिससे वह सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करती है। इसका व्यापक उपयोग जलवायु विज्ञान, सौर ऊर्जा तथा पर्यावरण अध्ययन में किया जाता है। अल्बेडो जितना कम होता है, सतह उतनी ही अधिक ऊष्मा को अवशोषित कर गरम होती है। सौर पैनलों का रंग सामान्यतः गहरा या काला होता है, जिससे वे सूर्य के विकिरण का बड़ा हिस्सा सोख लेते हैं और कम मात्रा में परावर्तित करते हैं, परिणामस्वरूप आसपास का तापमान बढ़ा रहता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी सतह का अल्बेडो 0.30 है, तो वह सूर्य के प्रकाश का केवल 30 प्रतिशत परावर्तित करती है और शेष 70 प्रतिशत ऊर्जा अवशोषित कर लेती है। इसके साथ ही, बड़े पैमाने पर स्थापित सौर फोटोवोल्टाइक संयंत्रों के लिए वनस्पति वाली जगह के बजाय खुली या कंक्रीट-युक्त भूमि का उपयोग, हवा के मुक्त प्रवाह में कमी और वर्षा जल के अवशोषण में बाधा जैसी परिस्थितियां बनती हैं, जो मिलकर 'हीट आइलैंड इफेक्ट' जैसी स्थिति को अधिक मजबूत कर देती हैं।

तापमान और वायु गुणवत्ता पर असर 
हीट आइलैंड इफेक्ट के कारण बड़े सौर बिजली संयंत्रों के आसपास का क्षेत्र प्राकृतिक वन या खुली भूमि की तुलना में अधिक गर्म हो सकता है, क्योंकि यहां ताप ऊर्जा का अवशोषण और संचय अधिक होता है। इसका असर स्थानीय स्तर पर तापमान बढ़ने, रात के समय गर्मी के लंबे समय तक बने रहने और वातावरण के अधिक शुष्क व उष्ण महसूस होने के रूप में दिखता है। बढ़ा हुआ तापमान कृषि, बागवानी, पशुपालन और ग्रामीण मानव जीवन को भी प्रभावित करता है। साथ ही, ऐसे क्षेत्रों में वायुमंडलीय ऊष्मा का अधिक संचय स्थानीय हवाओं की दिशा और गति को बदल सकता है, जिससे वायु प्रवाह बाधित होता है। तापमान में यह असंतुलन वायु चक्रों को प्रभावित करता है और ग्रीनहाउस गैसों के जमाव, धूल कणों की वृद्धि तथा असहज पर्यावरणीय परिस्थितियों को जन्म दे सकता है।

कृषि, पारिस्थितिकी और जल चक्र पर असर
स्थानीय तापमान में निरंतर वृद्धि का सीधा प्रभाव कृषि और पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ता है। अधिक गर्मी के कारण भूमि में मौजूद नमी तेजी से वाष्पित होती है, जिससे मिट्टी सूखती है और फसलों की वृद्धि व उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है, खासकर वे फसलें जो अधिक तापमान सहन नहीं कर पातीं। तापमान में असामान्य बदलाव जैव विविधता के लिए भी चुनौती बनते हैं, क्योंकि कई पौधों और जीवों के लिए ये परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं रहतीं। इसके साथ ही, बढ़ता तापमान स्थानीय जल चक्र को भी प्रभावित करता है, जिससे वर्षा के पैटर्न में बदलाव, भूजल पुनर्भरण में कमी और सूखे की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इन प्रभावों की झलक अब ग्रामीण जीवन और जनमानस की रोजमर्रा की दिनचर्या में भी साफ दिखाई देने लगी है।

जलवायु परिवर्तन और हीट आइलैंड इफेक्ट 
जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती का प्रमुख कारण मानव-जनित ग्रीनहाउस गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन का उत्सर्जन है। सौर ऊर्जा का उद्देश्य जीवाश्म ईंधनों की तुलना में कम उत्सर्जन वाली स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराना है। हालांकि, यदि बड़े सौर फोटोवोल्टेइक (PV) संयंत्रों के कारण स्थानीय स्तर पर तापमान में वृद्धि होती है, तो इसका असर क्षेत्रीय जलवायु चक्र और स्थानीय मौसमीय स्थितियों पर पड़ सकता है। यही कारण है कि सौर ऊर्जा के लाभों के साथ-साथ उसके परोक्ष प्रभावों को समझना भी आवश्यक हो जाता है।

क्या सौर ऊर्जा जलवायु परिवर्तन बढ़ाती है?
सौर ऊर्जा स्वयं जलवायु परिवर्तन को नहीं बढ़ाती। सौर फोटोवोल्टेइक प्रणालियां स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा का स्रोत हैं, जो सीधे तौर पर कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करती हैं। लेकिन, सौर संयंत्रों से जुड़ा स्थानीय 'हीट आइलैंड इफेक्ट' क्षेत्रीय तापमान और हवा के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है, जिससे कुछ इलाकों में चरम तापमान की स्थिति बनने की संभावना बढ़ जाती है। यह प्रभाव वैश्विक नहीं, बल्कि स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर अधिक होता है। सौर ऊर्जा वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए बेहद जरूरी है और सौर फोटोवोल्टेइक संयंत्रों से क्षेत्रीय तापमान में इतनी वृद्धि नहीं होती कि वह वैश्विक जलवायु परिवर्तन को तेज कर दे। सही भूमि उपयोग, हरित पट्टियां, तकनीकी सुधार और बेहतर संचालन से स्थानीय हीट आइलैंड प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

इस प्रभाव का अध्ययन क्यों है जरूरी
सौर ऊर्जा भले ही उत्सर्जन घटाने में प्रभावी हो, लेकिन उसके स्थानीय पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन करना इसलिए जरूरी है ताकि ऊर्जा उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बना रहे। ग्रामीण समुदायों, कृषि और पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ने वाले संभावित असर को समझे बिना दीर्घकालिक और टिकाऊ विकास संभव नहीं है। नीति-निर्माता, इंजीनियर और पर्यावरण वैज्ञानिक यह जानना चाहते हैं कि सौर फोटोवोल्टेइक परियोजनाएं स्थानीय तापमान और जलवायु को किस हद तक प्रभावित करती हैं और किन नीतियों में सुधार की आवश्यकता है।

समाधान और नियंत्रण के रास्ते भी हैं 
हीट आइलैंड इफेक्ट को कम करने के लिए भूमि उपयोग और सतह प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। सौर परियोजनाओं में हरित पट्टियों का विकास, पैनलों के नीचे स्थायी वनस्पति और मिट्टी का संरक्षण गर्मी के अवशोषण को कम कर सकता है। तकनीकी स्तर पर अधिक परावर्तक पैनल सामग्री विकसित की जा रही है, जिससे कम ऊष्मा उत्पन्न होती है। इसके साथ ही एग्रो-वोल्टेइक जैसी तकनीकें, जिनमें कृषि और सौर ऊर्जा का एक साथ उपयोग होता है, भूमि के बेहतर इस्तेमाल के साथ तापीय प्रभाव को भी घटाती हैं। पैनलों की व्यवस्था ऐसी हो कि हवा का आवागमन बना रहे और वर्षा जल का संचयन हो सके। 

ग्रामीण भारत के संदर्भ में अहम सुझाव
सौर फोटोवोल्टेइक तकनीक स्वच्छ ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण साधन है, जो जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करती है। हालांकि, बड़े सौर संयंत्रों से उत्पन्न हीट आइलैंड इफेक्ट को संतुलित योजना, पर्यावरणीय अध्ययन और नीति समर्थन के माध्यम से अवसर में बदला जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां खेती-बाड़ी या पेड़-पौधों का अभाव होता है, सौर ऊर्जा संयंत्र हरित ऊर्जा का महत्वपूर्ण विकल्प बन सकते हैं। यदि पैनलों की ऊंचाई ऐसी रखी जाए कि उनके नीचे से आसानी से आना-जाना हो सके, तो छाया में हल्दी, सर्पगंधा, लेमनग्रास और पामारोजा जैसी औषधीय व बागवानी फसलें उगाई जा सकती हैं। पैनलों की सफाई में उपयोग होने वाला पानी ही इन फसलों की सिंचाई में काम आ सकता है। इससे अतिरिक्त आय, स्थानीय रोजगार और हरित आवरण बढ़ेगा, जो पैनलों द्वारा अवशोषित ऊष्मा को 'हीट सिंक' की तरह रोककर वातावरण को ठंडा रखने में मदद करेगा। भविष्य में नई सौर परियोजनाओं की स्वीकृति देते समय इन पहलुओं को नीतिगत रूप से शामिल करना टिकाऊ विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
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