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अरावली का भूगोल गांवों का भविष्य : खनन और वनों की कटाई ने बिगाड़ा प्राकृतिक संतुलन, कैसे बचेगा देववन
प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा, पर्यावरण वैज्ञानिक, शिक्षाविद् और शोधकर्ता
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sat, 14 Feb 2026 08:16 PM IST
सार
अरावली पर्वतमाला ग्रामीण भारत की जीवनरेखा रही है, जो पेयजल, खेती और पशुपालन को सहारा देती आई है। अवैध खनन और वनों की कटाई ने इस प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है, जिससे गांवों में पानी का संकट, आय में कमी और पलायन की समस्या तेजी से बढ़ रही है। विस्तार से पढ़ें...
वर्ष 1970 के दशक के बाद से अरावली क्षेत्र में प्राकृतिक वनस्पति में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
- फोटो : बसंत बिजारणिया
अरावली पर्वतमाला की गोद में बसे राजस्थान के अलवर जिले के छोटे-से गांव भीमपुरा में 62 वर्षीय चरवाहा रामनिवास गुर्जर आज भी हर सुबह अपने मवेशियों को लेकर पहाड़ी ढलानों की ओर निकलता है। वह बताता है, जब मैं बच्चा था, तब इन पहाड़ियों पर घना जंगल था। बरसात का पानी यहीं रुकता था, कुएं कभी नहीं सूखते थे और गाय-भैंसों के लिए साल भर चारा मिलता था। आज जंगल कम हो गए हैं, पत्थर दिखते हैं और पानी के लिए हमें दूर जाना पड़ता है।
गांवों में पानी का संकट, आय में कमी और पलायन की समस्या तेजी से बढ़ रही है। पशुपालन भी प्रभावित।
- फोटो : बसंत बिजारणिया
रामनिवास की यह कहानी अकेली नहीं है। अरावली पर्वतमाला से जुड़े हजारों गांवों की जिंदगी इसी बदलाव की गवाही दे रही है। अरावली दुनिया की प्राचीनतम पर्वतमालाओं में से एक है। यह दिल्ली से लेकर गुजरात तक फैली हुई है और उत्तर-पश्चिम भारत के अर्ध-शुष्क क्षेत्र में जीवन का आधार रही है। सदियों से अरावली ने वर्षा जल को रोककर भूजल रिचार्ज किया, नदियों और झीलों को जीवन दिया और खेती-पशुपालन के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाईं। ग्रामीण समाज में अरावली को देववन माना गया, ऐसे पवित्र वन, जहां से ईंधन, चारा, औषधीय पौधे और खाद्य सामग्री मिलती थी। स्थानीय संस्कृति, लोकगीतों और परंपराओं में अरावली की मौजूदगी साफ दिखती है। खेतों की मेड़ से लेकर मंदिरों तक पहाड़ और जंगल ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं।
खेती, पशुपालन, खाद्य सुरक्षा से गहरा रिश्ता
अरावली क्षेत्र की खेती मुख्यतः वर्षा आधारित रही है। पहाड़ियों से निकलने वाले छोटे-छोटे नाले और नाड़ी और तालाब खेतों के लिए पानी जमा करते थे। बाजरा, ज्वार, सरसों जैसी फसलें इसी प्राकृतिक संतुलन पर निर्भर थीं। पशुपालन में भी अरावली की भूमिका अहम रही। घास के मैदान, झाड़ियां और वनस्पतियां पशुओं के लिए प्राकृतिक चारे का स्रोत रही हैं। इससे दूध, घी और अन्य दुग्ध उत्पादों के जरिए ग्रामीण परिवारों की खाद्य सुरक्षा और आय सुनिश्चित होती थी।
खेती, पशुपालन, खाद्य सुरक्षा से अरावली का गहरा रिश्ता है।
- फोटो : बसंत बिजारणिया
खनन से छलनी होता रहा देववन
पिछले कुछ दशकों में अरावली की यह जीवनरेखा अभूतपूर्व दबाव में आ गई है। अवैध और अति-खनन, सड़क व शहरी विस्तार, औद्योगीकरण और अनियंत्रित बस्तियों ने अरावली के प्राकृतिक भूगोल को गहराई से बदल दिया है। जहां कभी घने वन, झाड़ियां और सतत चट्टानी संरचनाएं थीं, वहां आज खुली खदानें, गहरे गड्ढे और पत्थरों के विशाल ढेर दिखाई देते हैं। यह परिवर्तन केवल दृश्य-परिदृश्य तक सीमित नहीं है, बल्कि अरावली की पारिस्थितिक आत्मा को प्रभावित कर रहा है।
चार दशक में सिकुड़ा 5,772 किमी वन क्षेत्र
दीर्घकालिक रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना प्रणाली आधारित इस लेखक का अध्ययन (1975–2019), जो पृथ्वी विज्ञान सूचना में प्रकाशित हुआ है, इस बदलाव को ठोस वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ उजागर करता है। इस अध्ययन के अनुसार, 1975 से 2019 के बीच अरावली क्षेत्र में लगभग 5,772 वर्ग किमी वन क्षेत्र में शुद्ध कमी दर्ज की गई, जबकि बस्तियों का विस्तार 6,650 वर्ग किमी से अधिक हुआ। इसी अवधि में खनन क्षेत्र और बंजर भूमि में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।
विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ कि वन क्षेत्र का बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर बस्तियों, खनन और कृषि भूमि में परिवर्तित हो गया है। शोध के परिणाम बताते हैं कि खनन और शहरी विस्तार ने अरावली की जल-धारण क्षमता को कमजोर किया है। उपग्रह-आधारित विश्लेषण से पता चलता है कि जहां वनस्पति आवरण घटा है, वहां सतही अपवाह बढ़ा है और भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया बाधित हुई है।
इसके परिणामस्वरूप कई पारंपरिक जलस्रोत जैसे जोहड़, नाड़ी और छोटे नाले या तो सूख चुके हैं या सिर्फ मौसमी होकर रह गए हैं। यह स्थिति सीधे तौर पर ग्रामीण खेती, पशुपालन और पेयजल सुरक्षा को प्रभावित कर रही है। अध्ययन में भविष्य के परिदृश्य (2029-2059) का आकलन भी किया गया है, जो और अधिक चिंताजनक है। यदि वर्तमान प्रवृत्तियां जारी रहीं, तो आने वाले दशकों में अरावली का बड़ा वन क्षेत्र बस्तियों और अन्य मानव-प्रधान उपयोगों में बदल सकता है। इसका अर्थ है ग्रामीण आजीविका पर बढ़ता दबाव, खाद्य और जल सुरक्षा का संकट, तथा जैव विविधता का गंभीर ह्रास। अरावली में हो रहा यह परिवर्तन केवल भूमि उपयोग में बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समग्र पारिस्थितिक विघटन है। देववन से खनन क्षेत्र तक का यह सफर नहीं रुका, तो अरावली से जुड़े गांवों का भविष्य और अधिक असुरक्षित हो जाएगा।
खनन से बिगड़ी अरावली की सेहत
- फोटो : बसंत बिजारणिया
पानी का संकट और गांवों से पलायन
खनन और वनों की कटाई का सबसे गहरा और प्रत्यक्ष प्रभाव पानी की उपलब्धता पर पड़ा है। अरावली की पहाड़ियां प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करती थींI वर्षा का पानी धीरे-धीरे मिट्टी और चट्टानों में समाकर भूजल को रिचार्ज करता था। लेकिन, जब पहाड़ियों की सतह खनन से उघड़ जाती है और वनस्पति हट जाती है, तो यह प्राकृतिक व्यवस्था टूट जाती है। आज बारिश का अधिकांश पानी कुछ ही घंटों में बहकर नालों के रास्ते निकल जाता है, जिससे न तो जमीन में नमी टिक पाती है और न ही भूजल स्तर भर पाता है।
अलवर, जयपुर और उदयपुर के अरावली क्षेत्र के गांवों में यह संकट बेहद वास्तविक और रोजमर्रा की चिंता बन चुका है। ग्रामीण बताते हैं कि जहां पहले 20-30 फीट की गहराई पर कुएं और रहट साल भर पानी देते थे, वहीं अब 150-200 फीट तक बोरिंग कराने के बाद भी पानी अनिश्चित रहता है। कई जगह तो गर्मियों में हैंडपंप पूरी तरह सूख जाते हैं और टैंकर पर निर्भरता बढ़ जाती है। इससे छोटे और सीमांत किसानों की लागत बढ़ रही है, जबकि उनकी आय लगातार घट रही है।
वर्ष 1970 के दशक के बाद से अरावली क्षेत्र में प्राकृतिक वनस्पति में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
अरावली के कई उप-क्षेत्रों में भूजल स्तर प्रति वर्ष 1-2 मीटर तक नीचे जा रहा है।
खनन-प्रभावित इलाकों में मिट्टी का क्षरण सामान्य क्षेत्रों की तुलना में कई गुना अधिक है।
जोहड़ एवं नाड़ी जैसी पारंपरिक जल संरचनाओं का बड़ा हिस्सा सूख चुका है या अतिक्रमण की चपेट में है।
ऐसे बच सकता है जीवनदायी देववन
अवैध खनन पर रोक, पर्यावरणीय नियमों का कड़ाई से पालन।
पारिस्थितिक पुनर्स्थापन व देसी प्रजातियों का बड़े पैमाने पर वनीकरण।
पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनर्निर्माण और वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना जरूरी।
ग्राम सभाओं और ग्रामीणों की संरक्षण प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करना।
उपग्रह डेटा और वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर दीर्घकालिक योजनाओं का क्रियान्वयन।
बदली खेती, बढ़ा संकट
पानी की कमी ने खेती के स्वरूप को भी बदल दिया है। पहले जहां वर्षा आधारित बाजरा, ज्वार और दलहन की खेती सामान्य थी, अब खेत बंजर छोड़ने पड़ रहे हैं। पशुपालन पर भी सीधा असर पड़ा है I चारागाह सूखने से मवेशियों के लिए चारा और पानी दोनों की कमी हो गई है। परिणामस्वरूप अनेक परिवार अपने पशु बेचने को मजबूर हुए हैं, जो कभी उनकी आजीविका और खाद्य सुरक्षा का आधार थे।
इस जल संकट का सामाजिक प्रभाव और भी गंभीर है। गांवों में युवाओं के सामने रोजगार के अवसर सिमट रहे हैं। इसलिए, वे मजबूरी में जयपुर, अलवर, गुरुग्राम या दिल्ली जैसे शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। गांवों में पीछे रह जाते हैं बुज़ुर्ग, महिलाएं और बच्चे। इससे पारंपरिक सामुदायिक सहयोग, कृषि आधारित त्योहार और सामाजिक ताना-बाना धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है। महिलाओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। उन्हें पानी लाने के लिए रोज कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है, जिसका असर उनके स्वास्थ्य और बच्चों की शिक्षा पर पड़ता है।
अरावली में पानी का संकट केवल प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण जीवन, संस्कृति और भविष्य के टूटते आधार की कहानी है। यदि खनन और वनों की कटाई पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया और पारंपरिक जल संरक्षण को पुनर्जीवित नहीं किया गया, तो गांवों से शहरों की आेर मजबूर पलायन की यह यात्रा और तेज हो जाएगी।
संस्कृति और आजीविका पर असर
अरावली से जुड़ी लोकसंस्कृति भी खतरे में है। वन-उपज पर आधारित हस्तशिल्प, पारंपरिक औषधीय ज्ञान और सामुदायिक त्योहार धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। जब जंगल और पहाड़ नहीं रहेंगे, तो उनसे जुड़ी पहचान भी कैसे बचेगी? ग्रामीण महिलाओं पर इसका असर और गहरा है। पानी और ईंधन की तलाश में उन्हें ज्यादा दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे शिक्षा और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
रामनिवास गुर्जर की चिंता पूरे अरावली क्षेत्र की चिंता है। देववन से खनन तक का यह सफर अगर यूं ही चलता रहा, तो सिर्फ पहाड़ नहीं टूटेंगे, गांवों की आजीविका, संस्कृति और भविष्य भी बिखर जाएगा। अरावली को बचाना मतलब ग्रामीण जीवन को बचाना है। आज जरूरत है कि हम विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अरावली को सिर्फ इतिहास की किताबों में नहीं, अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में महसूस कर सकें।
(लेखक केंद्रीय विश्वविद्यालय राजस्थान, अजमेर में पर्यावरण विज्ञान विभाग में प्रोफेसर हैं। उनका यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के फरवरी 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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