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नई वैश्विक मंडी से नए अवसर: यूरोप-अमेरिका से व्यापार के खुलेंगे द्वार, किसानों के लाभ के लिए करने होंगे सुधार

पंकज प्रकाश जोशी, वरिष्ठ कृषि पत्रकार Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 14 Feb 2026 08:16 PM IST
सार

यूरोपीय संघ के बाद अमेरिका के साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता भारतीय कृषि और किसानों के लिए नए अवसर खोल सकता है। लेकिन, इसके लाभ तभी मिलेंगे, जब आवश्यक सुधारों के संग किसानों की चुनौतियों को सही तरह से समझकर उन्हें संबोधित किया जाए।

जो किसान और उत्पादक यूरोप के मानकों पर खरे उतरेंगे, उन्हें बेहतर कीमत मिलने की संभावना है।
जो किसान और उत्पादक यूरोप के मानकों पर खरे उतरेंगे, उन्हें बेहतर कीमत मिलने की संभावना है। - फोटो : AI (सांकेतिक तस्वीर)
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ये सफर बहुत है कठिन मगर 
न उदास हो मेरे हमसफर... 


गीतकार जावेद अख्तर की ये पंक्तियां तरक्की की राह पर चलने वाले भारतीय किसानों पर भी लागू होती हैं। ये संदेश देती हैं कि भविष्य में वैश्विक उथल-पुथल के बीच खेती थोड़ी कठिन हो सकती है, पर असंभव बिलकुल नहीं। पहले यूरोपीय संघ के साथ मदर ऑफ ऑल डील्स और फिर अमेरिका के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते के कारण भारतीय किसानों और कृषि क्षेत्र को फायदा हो सकता है।

यूरोप या अमेरिका की किसी सुपरमार्केट में जब ‘मेड इन इंडिया’ लिखा मसाला, अंगूर या सूखा प्याज दिखाई देता है, तो वह केवल एक कृषि उत्पाद नहीं होता, उसके पीछे खेत, किसान, प्रयोगशाला, प्रमाणपत्र, कागजी प्रक्रिया और लंबी समुद्री या हवाई यात्रा की पूरी कहानी छिपी होती है। इन व्यापार समझौतों के बीच यह सवाल स्वाभाविक है कि इसका भारतीय खेती पर क्या असर पड़ेगा? क्या सचमुच यूरोप और अमेरिका का बाजार भारतीय किसानों के लिए खुल जाएगा या फिर शर्तों की दीवारें पहले जैसी ही बनी रहेंगी?

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यूरोप को कृषि निर्यात की स्थिति
भारत से यूरोप जाने वाले कृषि उत्पाद सीमित, मगर स्थिर हैं। ताजा फलों में भारतीय अंगूर यूरोप की मंडियों में अच्छी पहचान बना चुके हैं। खासकर, महाराष्ट्र के अंगूर कई वर्षों से यूरोपीय उपभोक्ताओं की पसंद रहे हैं। अनार, केला और भारतीय आम भी जाते हैं, लेकिन अधिकतर प्रोसेस्ड या फ्रोजन रूप में। ताजा आम और अनार पर यूरोप की सख्त स्वास्थ्य शर्तें आज भी बड़ी बाधा हैं। सब्जियों की बात करें तो घेरकिन और खीरा भारत का सबसे सफल निर्यात मॉडल है। यह पूरी तरह अनुबंध खेती पर आधारित है, जहां बीज से निर्यात तक हर चरण तय मानकों के अनुसार पूरा किया जाता है। इसके अलावा, सूखा प्याज, कुछ मात्रा में हरी मिर्च, भिंडी और फ्रोजन सब्जियां भी यूरोप पहुंचती हैं। मसाले, चाय और कॉफी भारत की पारंपरिक ताकत हैं। हल्दी, मिर्च, धनिया, जीरा जैसे मसाले यूरोप के खाद्य उद्योग में बड़े पैमाने पर उपयोग होते हैं। 

प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ - जैसे रेडी-टू-ईट भोजन, बिस्कुट, स्नैक्स और पास्ता - भी लगातार अपनी जगह बना रहे हैं। डेयरी उत्पादों की स्थिति बिल्कुल अलग है। दूध, घी या पनीर जैसे भारतीय डेयरी उत्पाद यूरोप में न के बराबर पहुंचते हैं। इसका कारण साफ है - यूरोप अपने डेयरी किसानों को सख्त सुरक्षा देता है। महाराष्ट्र के निर्यातक और बागवानी निर्यातक संघ के उपाध्यक्ष विकास सिंह बताते है की फिलहाल ब्रिटेन में लाल प्याज का निर्यात हो रहा है। वहीं, इटली, स्पेन जैसे देशो में सफेद प्याज निर्यात होती है। भारत-यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक समझौता अमल में आता है तो भविष्य में बड़े उत्पादकों के साथ ही छोटे किसानों को भी फायदा मिल सकता है। 

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गुणवत्ता को लेकर बेहद सख्त नियम 
यूरोप में प्याज निर्यात के लिए अच्छी कृषि प्रथाओं को सुनिश्चित करने वाले ‘ग्लोबल जीएपी’ जैसे सर्टिफिकेट की जरूरत होती है। यूरोप का बाजार कीमत से अधिक सुरक्षा और गुणवत्ता को महत्व देता है। वहां केवल अच्छा दिखने वाले फल या सब्जी भेजना काफी नहीं है, बल्कि यह साबित करना पड़ता है कि वह पूरी तरह सुरक्षित है। सबसे बड़ी शर्त कीटनाशक अवशेषों से जुड़ी है। यूरोप में तय अधिकतम अवशेष सीमा भारत की तुलना में अधिक सख्त है। कई रसायन जो भारत में वैध हैं, यूरोप में या तो प्रतिबंधित हैं या उनकी सीमा बेहद कम है।

खेत के स्तर पर अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन अनिवार्य है। अंगूर और सब्जियों के लिए ग्लोबल जीएपी जैसे प्रमाणपत्र लगभग अनिवार्य हो चुके हैं। इसका अर्थ है - खेत की पूरी जानकारी, कौन-सा छिड़काव कब हुआ, कौन-सा उर्वरक डाला गया, सब कुछ लिखित रूप में दर्ज होना चाहिए। यूरोप ‘खेत से थाली तक’ पूरी जानकारी चाहता है। यदि किसी खेप में समस्या पाई गई, तो वह सीधे उस खेत तक पहुंचना चाहता है, जहां फसल उगाई गई थी। प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के लिए एचएसीसीपी और खाद्य सुरक्षा मानक भी जरूरी हैं। भारत के किसानों के सामने इन पर खरा उतरना बड़ी चुनौती होगी।

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भारत-अमेरिका डील और किसान हितों का सवाल
भारत-अमेरिका के बीच भी लंबे दौर की बाचतीच के बाद मुक्त व्यापार समझौते पर सहमति बन गई है। अमेरिका भारतीय उत्पादों पर लागू 50 प्रतिशत टैरिफ घटाकर 18 फीसदी करेगा। इससे भारतीय कृषि उत्पादों को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता बढ़ेगी। टैरिफ में कटौती से अमेरिका को चावल, समुद्री उत्पादों, मसाला, चाय, फल और मेवा जैसे निर्यात में बढ़त की उम्मीद है। वहीं, अमेरिकी कृषि सचिव ने का दावा किया है कि दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते से अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारत का विशाल बाजार मिलेगा और ज्यादा कृषि उत्पादों का निर्यात भारत को होगा। हालांकि, भारत ने किसी भी व्यापार समझौते में कृषि एवं डेयरी किसानों के हित को सर्वोपरि रखने की बात दोहराई है। 

समझौते से कितनी आसान होंगी चुनौतियां
भारत और यूरोप के बीच व्यापार समझौते को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यही है कि क्या इससे ये सख्त शर्तें आसान हो जाएंगी? लेकिन, सच्चाई यह है कि ऐसा नहीं होगा। यूरोप ने साफ संकेत दिया है कि व्यापार समझौते के बावजूद खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। हां, जो बदलेगा वह आयात शुल्क का ढांचा है। कई भारतीय कृषि और प्रसंस्कृत उत्पादों पर यूरोप में लगने वाला शुल्क घट सकता है या समाप्त हो सकता है। इससे भारतीय उत्पाद यूरोपीय बाजार में कीमत के लिहाज से प्रतिस्पर्धी बनेंगे। रास्ता खुलेगा, लेकिन चलने के लिए वही जूते चाहिए, जो पहले से मांगे जा रहे हैं।

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भारतीय खेती पर क्या होगा असर 
व्यापार समझौते का सबसे सकारात्मक असर यह हो सकता है कि भारतीय खेती में गुणवत्ता को लेकर गंभीरता बढ़ेगी। जो किसान और उत्पादक यूरोप के मानकों पर खरे उतरेंगे, उन्हें बेहतर कीमत मिलने की संभावना है। इससे निर्यात आधारित फसलों - जैसे अंगूर, मसाले, प्रसंस्कृत सब्जियों - को बढ़ावा मिल सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पैकहाउस, कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग इकाइयों से रोजगार भी बढ़ेगा। दूसरी ओर, छोटे किसानों के लिए प्रमाणन और परीक्षण की लागत बड़ी चुनौती बनी रहेगी। 

भारत को करनी होंगी ये तैयारियां 
भारत को यूरोप के बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए तैयारियों को केवल कागजों तक सीमित न रखकर धरातल पर उतारना होगा। सबसे पहले किसानों में हानिकारक रासायनिक अवशेष-मुक्त खेती की समझ पैदा करनी होगी। कम रसायन, सही समय पर छिड़काव और वैकल्पिक कीट नियंत्रण - यह सब प्रशिक्षण का हिस्सा होना चाहिए।

अंगूर की तरह ही अन्य फसलों के लिए भी समूह आधारित प्रमाणन मॉडल अपनाना होगा, ताकि लागत कम हो सके। किसान उत्पादक संगठनों के माध्यम से प्रमाणन, परीक्षण और निर्यात की प्रक्रिया आसान बनाई जा सकती है। सरकार को प्रमाणन शुल्क, प्रयोगशाला जांच और कोल्डचेन पर सब्सिडी देनी होगी। इसके बिना छोटे किसान इस दौड़ में पीछे रह जाएंगे। केंद्र और राज्य सरकारों को हर तरह के प्रयास करने होंगे, किसानों को ट्रेनिंग से लेकर संसाधन और सामग्री तक मजबूत करना होगा।

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निर्यात की लागत भी एक सच्चाई है - पैकिंग, परिवहन, हवाई या समुद्री भाड़ा, निरीक्षण और कागजी कामों में काफी खर्च होता है। व्यापार समझौते से शुल्क कम होंगे, लेकिन बाकी लागतें तभी संतुलित होंगी, जब व्यवस्था सुचारु हो।

मंजिल तक पहुंचना कठिन, पर असंभव नहीं  
यूरोप के बाजार तक पैठ बनाना आसान नहीं है, लेकिन यह असंभव भी नहीं है। यह समझौता भारतीय किसानों के लिए चमत्कार से अधिक एक अवसर है। जो किसान गुणवत्ता को अपनाएंगे, जो मानकों को समझेंगे और जो बाजार की भाषा को सीखेंगे - वही यूरोप के घरों की मेज तक अपने उत्पाद पहुंचाने में सफल हो सकेंगे। तभी यह व्यापार किसानों की जिंदगी बदलने का साधन बन सकता है।

(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के फरवरी 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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