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राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड क्या काम करता है, किसानों की आमदनी बढ़ाने और फसल विविधता जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों में इसकी क्या भूमिका है?
राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड कृषि मंत्रालय के अंतर्गत 1983 में स्थापित स्वायत्त संस्था है। इसका उद्देश्य व्यावसायिक बागवानी, नई तकनीकों और कृषि पद्धतियों के साथ शीत भंडारण, पॉलीहाउस व संरक्षित खेती जैसे बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देना है। बोर्ड बागवानी परियोजनाओं के लिए आर्थिक सहायता भी देता है।
किसान संस्थान की वेबसाइट पर पंजीकरण कर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं, जिसकी जांच और स्वीकृति निर्धारित प्रक्रिया के तहत होने के बाद आर्थिक सहायता मिल सकती है। सहायता पाने के लिए परियोजना लागत का एक हिस्सा बैंक ऋण से लेना अनिवार्य है। मोटे तौर पर कुल परियोजना लागत पर 35 प्रतिशत तक सब्सिडी मिल सकती है।
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बागवानी क्षेत्र की स्थिति, उपलब्धियां और कमजोरियां क्या हैं? इसकी कमियों को दूर करने के लिए क्या काम हो रहा है?
पिछले कुछ वर्षों में भारत के बागवानी क्षेत्र में तेजी से विकास हुआ है और उत्पादन में औसतन हर वर्ष 5 से 6 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है। पिछले वर्ष पहली बार बागवानी उत्पादन देश के खाद्यान्न उत्पादन से अधिक हुआ। यह क्षेत्र अभी विकास के शुरुआती दौर में है और अगले 10 से 15 वर्षों में इसके तेजी से बढ़ने की पूरी संभावना है।
किसानों की बढ़ती रुचि, सरकारी सहयोग और क्लस्टर आधारित बड़े पैमाने पर बागवानी विस्तार इसकी गति बढ़ा रहे हैं। इसके लिए राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड और केंद्रीय कृषि मंत्रालय का बागवानी विभाग प्रयासरत हैं। समेकित बागवानी विकास मिशन (एमआईडीएच) सरकार की प्रमुख छत्र योजना है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड भी आता है।
हालांकि, कुछ फलों और सब्जियों के लिए आयात पर निर्भरता चुनौती है। भारत में कीवी और ब्लूबेरी जैसे कई फलों का आयात होता है। ऐसी फसलों की घरेलू खेती को प्रोत्साहित करना मंत्रालय और राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की प्राथमिकता है। आने वाले समय में विभिन्न बागवानी फसलों में आत्मनिर्भरता हासिल करना महत्वपूर्ण लक्ष्य है।
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राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की किन योजनाओं से लाभ लेकर किसान आय बढ़ा सकते हैं?
राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड किसानों को मुख्य रूप से तीन तरह की योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता देता है। पहली, खुले खेत में बागवानी के लिए है, जिसमें आम, लीची जैसे फलों के बाग लगाने, भूमि की तैयारी, बीज व पॉलीहाउस जैसी गतिविधियों के लिए परियोजना लागत पर निर्धारित सब्सिडी मिलती है।
दूसरी, संरक्षित खेती के लिए है, जिसमें पॉलीहाउस, ग्रीनहाउस और शेडनेट हाउस जैसी संरचनाओं पर सब्सिडी दी जाती है। यह सब्सिडी बैंक ऋण से जुड़ी होती है, जो निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार परियोजना पूरी होने के बाद लाभार्थी को मिलती है।
किसान को परियोजना लागत के कुछ हिस्से पर बैंक ऋण लेना अनिवार्य होता है। परियोजना पूरी होने पर बोर्ड निरीक्षण करता है और निर्धारित दिशा-निर्देशों व विस्तृत परियोजना रिपोर्ट के अनुरूप काम पूरा होने पर सब्सिडी बैंक के माध्यम से किसान के खाते में दी जाती है।
तीसरी, शीत भंडारण योजना है, जिसके तहत न्यूनतम 5,000 मीट्रिक टन क्षमता वाली आधुनिक परियोजनाओं को सहायता मिलती है। इनकी क्षमता 10,000 या 20,000 मीट्रिक टन या उससे अधिक भी हो सकती है। बोर्ड की योजनाओं के तहत दिशा-निर्देशों के अनुसार सफलतापूर्वक परियोजना पूरी होने पर 35 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है।
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आपने सहकारिता मंत्रालय में भी काम किया है। कृषि में एफपीओ और सहकारी समितियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। सहकारिता मंत्रालय के अपने अनुभव को आप बागवानी क्षेत्र में कैसे लागू कर रहे हैं?
चार वर्षों से अधिक समय तक मैंने सहकारिता मंत्रालय में काम किया है। सहकारिता महत्वपूर्ण क्षेत्र है, क्योंकि देश में बड़ी संख्या में सहकारी समितियां हैं और उनसे बड़ी आबादी जुड़ी है। वहां काम करने का अनुभव जमीनी स्तर पर कार्य करने और लोगों से सीधे जुड़ने का रहा।
राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की शीत भंडारण से लेकर पॉलीहाउस जैसी संरक्षित खेती तक सभी प्रमुख योजनाओं का लाभ किसान, एफपीओ और सहकारी समितियां ले सकती हैं।
हालांकि, अब तक इनकी ओर से अपेक्षाकृत कम आवेदन आए हैं, इसलिए बोर्ड अधिक से अधिक सहकारी समितियों को जोड़ने का प्रयास लगातार कर रहा है।
क्लस्टर विकास कार्यक्रम के तहत विभिन्न बागवानी फसलों के बड़े क्षेत्रों में क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं। नासिक का अंगूर क्लस्टर देश-दुनिया में पहचान रखता है और यहां से अंगूर का निर्यात भी बड़े पैमाने पर होता है।
देश भर में ऐसे 50 से अधिक क्लस्टर विकसित करने की योजना है, जिनमें से करीब 15-20 बन चुके हैं और बाकी पर काम चल रहा है।
इन कार्यक्रमों में एफपीओ और सहकारी समितियां भी भाग ले सकती हैं। अमूल, इफको और कृभको जैसी बड़ी सहकारी संस्थाओं को भी इस कार्यक्रम से जोड़ने के लिए पहल की गई है।
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आपने राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की जिम्मेदारी संभाली, तो क्या ऐसे फैसले किए जिनसे किसानों की आय में सुधार हो सकता है?
राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के इतिहास में पूर्णकालिक प्रबंध निदेशक बहुत कम रहे हैं। पहले आमतौर पर कृषि विभाग के संयुक्त सचिव को अतिरिक्त प्रभार दिया जाता था। फिलहाल मेरे पास केवल बोर्ड के प्रबंध निदेशक का दायित्व है, जिससे मैं इसके कामकाज पर पूरा ध्यान दे पा रहा हूं।
हमारा प्रमुख प्रयास किसानों को मिलने वाली सहायता की प्रक्रिया को पारदर्शी, सरल और तेज बनाना है। सहायता मिलने में लगने वाले समय को कम करने और किसानों के कार्यालय आने की जरूरत घटाकर प्रक्रिया को ऑनलाइन बनाने पर काम हो रहा है।
बोर्ड ने निःशुल्क हेल्पलाइन भी शुरू की है, जहां किसान बागवानी और खेती की गतिविधियों से जुड़ी आवश्यक जानकारी ले सकते हैं।
साथ ही, अनुमोदन प्रक्रिया के चरणों - निरीक्षण, दस्तावेज जमा करने और सब्सिडी जारी करने के लिए समय-सीमा तय की गई है। कुछ गतिविधियों के लिए सात दिन और कुछ के लिए 15 दिन की समय-सीमा है।
अधिकारियों को इसका सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और गति बढ़े और किसानों को समय पर लाभ मिल सके।
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किसानों की शिकायत रहती है कि सैद्धांतिक स्वीकृति में समय लगने से ऋण अटक जाता है। इसके लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
सैद्धांतिक स्वीकृति यानी जीओसी की प्रक्रिया सामान्यतः लगातार चलती है और इसमें अधिक समय नहीं लगता, लेकिन पिछले डेढ़-दो महीने में राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के दिशा-निर्देशों में बदलाव के कारण यह प्रक्रिया रुकी थी।
21 अगस्त को संशोधित दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए हैं, जिनमें कुछ श्रेणियों को योजनाओं के लिए अपात्र करने और एक परिवार में केवल एक व्यक्ति को सब्सिडी देने का प्रावधान है।
इसका उद्देश्य योजनाओं के दुरुपयोग को रोकना और अधिक से अधिक किसानों तक लाभ पहुंचाना है, ताकि प्रारंभिक सहायता मिलने के बाद वे अपने संसाधनों से गतिविधि आगे बढ़ा सकें।
स्वीकृति में देरी पहले दस्तावेजों की कमी या अन्य कारणों से होती थी, लेकिन अब बोर्ड ने हर चरण की निगरानी और समयबद्ध निपटारे पर जोर दिया है।
अधिकारियों और बाहरी एजेंसियों से आने वाले दस्तावेजों की प्रक्रिया भी तेजी से पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं, जिससे आगे स्वीकृति और अन्य प्रक्रियाओं में तेजी आएगी और किसानों को अनावश्यक देरी नहीं होगी।
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पॉलीहाउस या संरक्षित खेती की अन्य संरचनाओं को प्राकृतिक आपदाओं से नुकसान की भरपाई के लिए क्या किसी प्रकार के बीमा व्यवस्था है?
वर्तमान में राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड में संरक्षित खेती की संरचनाओं या बागवानी गतिविधियों के लिए बीमा का कोई प्रावधान नहीं है।
कुछ किसान निजी कंपनियों के माध्यम से बीमा कराते हैं। हालांकि, हमने इस विषय पर विचार शुरू किया है कि ऐसी बीमा व्यवस्था बनाई जा सकती है या नहीं, जिसमें किसान स्वयं प्रीमियम दें, लेकिन प्रीमियम कम हो और उसकी पूरी बागवानी गतिविधि बीमा के दायरे में आ जाए।
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किसानों को उपज का सही दाम मिले, इसके लिए सरकार किस तरह काम कर रही है?
जहां किसी फसल का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है, वहां भंडारण, शीत-शृंखला, परिवहन और प्रसंस्करण की पूरी मूल्य-शृंखला विकसित करना जरूरी है।
देश में शीत-शृंखला सुविधाएं कम होने से पर्याप्त शीतगृह और प्रशीतित वाहनों की जरूरत है, ताकि उपज सुरक्षित बाजार तक पहुंच सके।
मांग और कीमत की जानकारी तथा परिवहन-भंडारण की कमी से किसान अक्सर स्थानीय बाजार में ही उपज बेचते हैं। बंपर उत्पादन होने की स्थिति में कीमत कई बार लागत से नीचे गिर जाती है। सही भाव न मिलने पर उपज को बाजार तक ले जाना भी घाटे का सौदा बन जाता है और किसान कई बार उसे फेंक देते हैं।
इसका बड़ा समाधान प्रसंस्करण हो सकता है। टमाटर से सॉस, फलों से रस-शरबत और अन्य उत्पाद बनाए जा सकते हैं। सूखे फलों का निर्यात भी होता है। प्रसंस्करण से अधिक मूल्य किसान को मिल सकता है।
राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड प्रसंस्करण इकाइयों को भी सहायता और अनुदान देता है। हालांकि, खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय इसके लिए मुख्य रूप से काम करता है। क्लस्टर विकास कार्यक्रम में सार्वजनिक-निजी भागीदारी से कृषि आधारित कंपनियां शीतगृह, कटाई के बाद की सुविधाएं और प्रसंस्करण इकाइयां विकसित कर रही हैं।
जिस गांव या क्षेत्र में बागवानी क्लस्टर बनेगा, वहीं ये सुविधाएं विकसित होंगी और आगे उत्पादों के निर्यात की संभावना भी बढ़ेगी।
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रोपण सामग्री की गुणवत्ता सुधारने के लिए क्या किया जा रहा है?
इसके लिए स्वच्छ पौध कार्यक्रम शुरू किया गया है, जिसकी 50 प्रतिशत धनराशि एशियाई विकास बैंक और 50 प्रतिशत भारत सरकार दे रही है। करीब 1,700 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली इस योजना का प्रारंभिक क्रियान्वयन राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड कर रहा है।
इसका उद्देश्य बागवानी फसलों की वायरस और रोगजनक रहित रोपण सामग्री तैयार कर उसका संवर्धन और प्रमाणित नर्सरियों के जरिए किसानों तक पहुंचाना है।
इस योजना के तहत नौ स्वच्छ पौध केंद्र बनाए जा रहे हैं, जिनमें श्रीनगर में शीत क्षेत्र के फलों और पुणे में अंगूर, अनार व नींबूवर्गीय फलों पर काम होगा। शुरुआत में 75 नर्सरियां विकसित कर उन्हें वित्तीय सहायता दी जाएगी, जहां पौध सामग्री को बढ़ाकर किसानों तक पहुंचाया जाएगा।
इस कार्यक्रम के सफल होने पर किसानों को स्वच्छ व रोगमुक्त रोपण सामग्री मिल सकेगी। इसमें 10-12 प्रमुख बागवानी फसलों को शामिल किया गया है।
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वैश्विक मानकों के अनुरूप बागवानी उत्पाद तैयार करने के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं?
विश्व के कुल बागवानी उत्पादन में भारत चीन के बाद दूसरे स्थान पर है, लेकिन वैश्विक निर्यात बाजार में उसकी हिस्सेदारी केवल दो प्रतिशत है। इसे बढ़ाने के लिए उत्पादन से निर्यात तक व्यवस्था में सुधार जरूरी है।
यूरोप और अमेरिका जैसे बाजारों में गुणवत्ता के कड़े मानक हैं और कीटनाशकों की थोड़ी सी मात्रा मिलने पर भी खेप अस्वीकार हो सकती है, इसलिए किसानों को निर्धारित मानकों का पालन करना होगा।
एपीडा इस दिशा में काम कर रहा है और राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के साथ समन्वय करता है। एपीडा निर्यात के लिए वित्तीय सहायता और जरूरी बुनियादी ढांचा विकसित करने में मदद करता है।
हाल के वर्षों में कई भारतीय फलों के नए देशों में पहुंचने की सकारात्मक खबरें सामने आई हैं। ऐसे में भारत निर्यात बाजार में अपनी मौजूदा दो प्रतिशत हिस्सेदारी को तेजी से बढ़ा सकता है।