मध्य प्रदेश की मूंग पर संसद में संग्राम : किसानों के मुद्दे पर भिड़े दो पूर्व मुख्यमंत्री
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sun, 15 Feb 2026 01:04 PM IST
सार
प्रश्नकाल के दौरान दिग्विजय सिंह ने सवाल उठाया कि जिन इलाकों - होशंगाबाद, सीहोर और हरदा - में मूंग की बड़ी पैदावार हो रही है, वहां इसे खरीद क्लस्टर योजना में क्यों शामिल नहीं किया गया। शिवराज सिंह चौहान ने दावा किया कि किसानों के लिए पारदर्शी खरीद व्यवस्था बनाई गई है और भुगतान सीधे किसानों तक पहुंचता है।
संसद में दिग्विजय सिंह से मध्य प्रदेश में मूंग के मुद्दे को उठाया तो शिवराज ने दिया जवाब।
- फोटो : बसंत बिजारणिया
राज्यसभा राज्यसभा में शुक्रवार को उस समय सियासी पारा चढ़ गया, जब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह आमने-सामने आ गए। मुद्दा था मध्य प्रदेश मध्य प्रदेश में मूंग की बंपर पैदावार और उसकी खरीद व्यवस्था। दोनों नेताओं की तीखी नोकझोंक ने सदन में खूब हलचल मचा दी।
मूंग की पैदावार और क्लस्टर योजना पर सवाल
प्रश्नकाल के दौरान दिग्विजय सिंह ने सवाल उठाया कि जिन इलाकों - होशंगाबाद, सीहोर और हरदा - में मूंग की बड़ी पैदावार हो रही है, वहां इसे खरीद क्लस्टर योजना में क्यों शामिल नहीं किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी खरीद में देरी से व्यापारियों को फायदा मिला, जबकि किसानों को पूरा लाभ नहीं मिल पाया।
शिवराज बोले - सिंचाई योजनाओं से बढ़ी पैदावार
इस पर शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि मूंग उत्पादन में बढ़ोतरी उनकी सरकार की सिंचाई योजनाओं की वजह से संभव हुई है। उन्होंने दावा किया कि किसानों के लिए पारदर्शी खरीद व्यवस्था बनाई गई है और भुगतान सीधे किसानों तक पहुंचता है। चौहान ने यह भी कहा कि जब उत्पादन भरपूर है, तो अलग क्लस्टर की जरूरत नहीं पड़ती।
पुरानी सरकारों पर भी छिड़ी बहस
बहस के दौरान चौहान ने कांग्रेस सरकार के समय दलहन उत्पादन कम होने की बात भी उठाई। वहीं दिग्विजय सिंह ने फिर क्लस्टर सूची और खरीदी में देरी के मुद्दे को दोहराया। दोनों नेताओं की जुबानी जंग ने सदन का माहौल गरमा दिया और सियासी चर्चाओं को हवा दे दी।
सियासत में गर्माया मूंग का मुद्दा
मध्य प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के बीच यह टकराव अब राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। किसानों से जुड़े मुद्दे पर हुई इस बहस ने सरकार की खरीद नीति और फसल प्रबंधन को लेकर नए सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
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