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ई-नाम 2.0 का जलगांव मॉडल : किसानों को मध्यस्थों से मुक्ति, उचित दाम की गारंटी, QR कोड - AI से पारदर्शी व्यापार

शिरीष खरे, स्वतंत्र पत्रकार और लेखक Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 13 Dec 2025 07:16 PM IST
सार

भारत के असंगठित ढांचे वाले पारंपरिक कृषि बाजारों में मध्यस्थों का दखल और मूल्य असमानता किसानों को उचित दाम से वंचित करती रही है। ऑनलाइन राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) पारदर्शिता और सही मूल्य सुनिश्चित करता है, जिसे मजबूत करने के लिए अब ई-नाम 2.0 लॉन्च किया गया है।

ई-नाम को वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे शुरू किया।
ई-नाम को वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे शुरू किया। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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भारत जैसे कृषि प्रधान देश, जहां लगभग 60 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, वहां किसानों की बाजार तक सीमित पहुंच एक बड़ी चुनौती रही है। पारंपरिक कृषि बाजार का असंगठित ढांचा, मध्यस्थों की भूमिका और मूल्य निर्धारण में असमानता जैसी समस्याएं किसानों को उचित मूल्य प्राप्त करने से वंचित कर देती हैं। इन चुनौतियों के समाधान के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2016 में राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) की शुरुआत की। ई-नाम राष्ट्रव्यापी ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म है, जो मौजूदा एपीएमसी (कृषि उपज बाजार समिति) मंडियों को जोड़कर एकीकृत राष्ट्रीय बाजार बनाता है। यह पारदर्शी नीलामी, बेहतर मूल्य की खोज और समय पर ऑनलाइन भुगतान सुनिश्चित करता है। अब, वर्ष 2025 में, इसे अधिक उन्नत बनाने के लिए ई-नाम 2.0 की शुरुआत हुई है। यह अपग्रेडेशन अंतर्राज्यीय व्यापार को बढ़ावा देने, डिजिटल तकनीकों को जोड़ने और कृषि मूल्य शृंखला को मजबूत करने पर केंद्रित है। ई-नाम 2.0 न केवल राष्ट्रीय कृषि बाजार तक किसानों की पहुंच सुनिश्चित करता है, बल्कि यह लॉजिस्टिक्स, फिनटेक और गुणवत्ता के आश्वासन जैसी सेवाओं को भी जोड़ता है।

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डेढ़ हजार से अधिक मंडियों का नेटवर्क 
ई-नाम को वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे शुरू किया। इसका उद्देश्य कृषि उत्पादों के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय बाजार बनाना था, जहां किसान अपनी उपज को देशभर के खरीदारों को बेच सकें। शुरू में, यह पहल 585 मंडियों से शुरू हुई और धीरे-धीरे विस्तारित होती रही। जून 2025 तक, यह नेटवर्क 27 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में फैल गया और 1,522 मंडियां इससे जुड़ चुकी हैं। ई-नाम पर 231 कृषि, बागवानी और अन्य वस्तुओं का व्यापार होता है, जिसमें लगभग 1.79 करोड़ किसान, 4,557 किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), 2.70 लाख व्यापारी और 1.20 लाख कमीशन एजेंट पंजीकृत हैं। इसके माध्यम से अब तक 4.41 लाख करोड़ रुपये का व्यापार हो चुका है। हालांकि, ई-नाम की शुरुआती सफलता के बावजूद, इस पर अंतर्राज्यीय व्यापार सीमित रहा। उदाहरण के लिए, वित्तीय वर्ष 2024-25 में अंतर्राज्यीय व्यापार मात्र 21 करोड़ रुपये का था। दरअसल, लॉजिस्टिक्स की कमी, गुणवत्ता परीक्षण का अभाव और राज्य-स्तरीय नियमों में असमानता जैसी समस्याओं ने इसके विस्तार को प्रभावित किया। इन कमियों को दूर करने के लिए सरकार ने ई-नाम 2.0 की योजना बनाई है। ई-नाम में यह अपग्रेडेशन वर्ष 2024 के अंत में प्रस्तावित था और 2025 की शुरुआत में लॉन्च कर दिया गया। बता दें कि ई-नाम 2.0 की परिकल्पना ओपन डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में की गई है, जो आगे और पीछे की कड़ियों को सक्षम बनाता है। दिसंबर 2024 तक, महाराष्ट्र के जलगांव जिले की 4 मंडियों में इसका पायलट चल रहा था।

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क्यूआर कोड से उत्पादों की ट्रैकिंग आसान
इस मंच से जुड़कर किसानों और व्यापारियों को कई लाभ मिलते हैं। ऑटोमेटेड बिडिंग और डिमांड-सप्लाई डेटा इसकी विशेषता है। इस मंच पर स्वचालित बोली प्रक्रिया से व्यापार तेज और पारदर्शी होता है। डिमांड-सप्लाई डेटा की सुविधा से किसान बाजार की मांग के अनुसार उत्पादन योजना बना सकते हैं। क्यूआर कोड से उत्पादों की ट्रैकिंग आसान होगी, जो गुणवत्ता और आपूर्ति शृंखला की पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा। साथ ही, इसमें ओपन नेटवर्क ऑफ डिजिटल कॉमर्स असेइंग (डिजिटल वाणिज्य मूल्यांकन का ओपन नेटवर्क), लॉजिस्टिक्स और फिनटेक सेवाओं को एकीकृत किया गया है। फसलों या कृषि उत्पादों की गुणवत्ता के मूल्यांकन के लिए निजी प्रदाताओं को मंडियों में असेइंग और परिवहन सेवाएं प्रदान करने की अनुमति रहेगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से मूल्य निर्धारण सटीक होगा। इसी तरह, किसान अपनी उपज का विवरण अपलोड करके बिना मंडी आए बोली लगा सकते हैं। इसका मोबाइल एप 12 भाषाओं में उपलब्ध है। वहीं, किसान एफपीओ संग्रह केंद्रों से भी व्यापार कर सकते हैं।

जलगांव के अनुभव से मिले अच्छे सबक  
महाराष्ट्र में कृषि का योगदान राज्य की जीडीपी में लगभग 13 प्रतिशत है और जलगांव जिला इसका एक प्रमुख हिस्सा है। जिले का क्षेत्रफल 11,790 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें 7 लाख से अधिक किसान परिवार रहते हैं। यहां की मिट्टी उपजाऊ है, जो केला उत्पादन में देश में तीसरा स्थान रखती है। यहां वार्षिक केला उत्पादन लगभग 15 लाख मीट्रिक टन है, जो निर्यात के लिए भी जाना जाता है। इसके अलावा, कपास का उत्पादन भी महत्वपूर्ण है, जो जिले की अर्थव्यवस्था का आधार है।

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ई-नाम का सफर

  • 585 मंडियों से 2016 में शुरुआत। 
  • 1522 मंडियां जून 2025 तक ई-नाम प्लेटफॉर्म से जुड़ चुकी हैं।
  • 231 कृषि, बागवानी और अन्य वस्तुओं का व्यापार हो रहा है। 
  • 1.79 करोड़ किसान, 4,557 एफपीओ, 2.70 लाख व्यापारी और 1.20 लाख कमीशन एजेंट ई-नाम प्लेटफॉर्म पर पंजीकृत हैं। 
  • 4.41 लाख करोड़ रुपये का व्यापार ई-नाम पर हो रहा है। 
पारंपरिक मंडी व्यवस्था में किसानों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मध्यस्थों द्वारा मूल्य निर्धारण में हेरफेर, परिवहन की उच्च लागत और गुणवत्ता परीक्षण की कमी से किसानों को उचित मूल्य नहीं मिलता। उदाहरण के लिए, जलगांव की मंडी में केले की बोली प्रक्रिया अक्सर स्थानीय व्यापारियों तक सीमित रहती है, जिससे राष्ट्रीय बाजार की पहुंच नहीं हो पाती।

बता दें कि ई-नाम 1.0 ने महाराष्ट्र में 300 से अधिक मंडियों को जोड़ा, लेकिन एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच व्यापार मात्र 5-10 प्रतिशत ही रहा। वित्तीय वर्ष 2023-24 में, महाराष्ट्र में ई-नाम के माध्यम से 50,000 करोड़ रुपये का व्यापार हुआ, लेकिन जलगांव जैसी कृषि उपज मंडियों में यह आंकड़ा अपेक्षा से कम ही बना रहा।

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ई-नाम 2.0 की पायलट परियोजना इसी तरह कमी को दूर करने के लिए डिजाइन की गई। दिसंबर 2024 में शुरू हुई इस परियोजना के लिए जलगांव का चयन किया गया, क्योंकि यह जिला डिजिटल साक्षरता में अग्रणी है। यहां युवा किसान अधिक हैं। केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय और महाराष्ट्र राज्य कृषि विपणन बोर्ड के संयुक्त प्रयास से यह पायलट परियोजना चल रही है। इसके तहत चार मंडियां जलगांव (मुख्य मंडी), चोपड़ा (केला केंद्र), भुसावल (नदी तट पर लॉजिस्टिक्स सुविधा) और एरंडोल (कॉटन हब) चुनी गईं, जो जिले की विविध कृषि उपज का प्रतिनिधित्व करती हैं।

पायलट परियोजना की शुरुआत में 2 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया, जबकि केंद्र से सॉफ्टवेयर और ट्रेनिंग सपोर्ट मिला। इसमें चरणबद्ध तरीके से कार्यान्वयन हुआ। पहले चरण (दिसंबर 2024) में इंफ्रास्ट्रक्चर सेटअप किया गया। चारों मंडियों में 20 कंप्यूटर, वाई-फाई और स्मार्ट वेइंग मशीनें लगाई गईं। साथ ही, 1,000 किसानों का पंजीकरण किया गया। दूसरे चरण (जनवरी 2025) में ट्रेनिंग और वर्कशॉप आयोजित की गईं। एसएएफसी (स्मॉल फार्मर्स एग्री-बिजनेस कंसोर्शियम) ने 10 दिवसीय सत्र आयोजित किए। इसमें महिलाओं और युवा किसानों पर विशेष जोर रहा। तीसरे चरण (फरवरी-मार्च 2025) में लाइव ट्रायल हुआ। केला (चोपड़ा), कॉटन (एरंडोल), सब्जियां (भुसावल) और अनाज (जलगांव) पर फोकस रहा। पहले महीने में 500 लेनदेन हुए, जिनकी कुल कीमत 5 करोड़ रुपये थी।

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अक्तूबर 2025 तक पायलट परियोजना को सफल कहा जा सकता है। इसके कारण अंतर्राज्यीय व्यापार 30 प्रतिशत बढ़ा है और किसानों को औसतन 15 प्रतिशत अधिक मूल्य मिला। उदाहरण के लिए, चोपड़ा मंडी में केले का मूल्य 25 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 30 रुपये हो गया। पारदर्शी बोली से मध्यस्थों का दखल कम हुआ। एक सर्वे के अनुसार, 80 प्रतिशत किसानों ने 10-20 प्रतिशत आय वृद्धि दर्ज की। एफपीओ को मजबूती मिली है और 200 सदस्यों वाले समूह बनाए गए। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल डिवाइड के अंतर को पाटने में भी मदद मिली। इसका असर इस बात से समझा जा सकता है कि अब मोबाइल एप से महिलाएं घर से ही ट्रेडिंग कर रही हैं।

ई-नाम 2.0 का पर्यावरणीय प्रभाव भी एक दिलचस्प पहलू है। पारंपरिक व्यवस्था में किसानों को अपनी उपज मंडी तक लाने और खरीदारों को वहां पहुंचने के लिए लंबी यात्राएं करनी पड़ती थीं। फार्मगेट ट्रेडिंग और डिजिटल बोली ने इन यात्राओं को 40 प्रतिशत तक कम किया है। इसके अलावा, लॉजिस्टिक्स ऑप्टिमाइजेशन ने परिवहन के दौरान ईंधन की खपत को 15 प्रतिशत घटा दिया है।

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जलगांव मंडी में मोबाइल क्वालिटी टेस्टिंग वैन की सुविधा ने स्थानीय स्तर पर गुणवत्ता जांच को संभव बना दिया है, जिससे उपज को बार-बार मंडी लाने-ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती। पायलट परियोजना के जरिए जलगांव को ‘ग्रीन मंडी’ के रूप में प्रचारित करने की योजना बनाई गई है, जो सभी बाकी मंडियों के लिए प्रेरणा बनेगी।

चुनौतियां और समाधान

  • डिजिटल साक्षरता : बुजुर्ग किसानों की समस्या को दूर करने के लिए अतिरिक्त ट्रेनिंग और हेल्प डेस्क सहायक हो सकते हैं।
  • इंटरनेट कनेक्टिविटी : ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर इंटरनेट की चुनौती स्टारलिंक जैसी सैटेलाइट सेवाओं के परीक्षण से दूर हो सकती है।
  • राज्यों के नियम : विभिन्न राज्यों के टैक्स संबंधी मुद्दों का समाधान जीएसटी के एकीकरण से हो सकता है।
  • साइबर सुरक्षा : साइबर खतरों का समाधान ई-केवाईसी और ब्लॉकचेन बन सकता है।

(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के नवंबर 2025 अंक में प्रकाशित किया गया  है) 

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