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बदलती जलवायु में खेती : जैव प्रौद्योगिकी बनेगी सहारा, किसान बनेंगे आत्मनिर्भर

एन. रघुराम, प्रोफेसर-गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 23 May 2026 02:18 PM IST
सार

बदलती जलवायु और कमजोर होती मिट्टी के कारण खेती अजैविक और जैविक तनावों से जूझ रही है। जैव प्रौद्योगिकी फसलों को सशक्त बनाकर उत्पादन बढ़ाने और मिट्टी की सेहत सुधारने में मदद मिल सकती है। इस क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देकर टिकाऊ कृषि की ओर आगे बढ़ना होगा।

बायोटेक से मजबूत होगी खेती, बढ़ेगा उत्पादन, आत्मनिर्भर होंगे किसान।
बायोटेक से मजबूत होगी खेती, बढ़ेगा उत्पादन, आत्मनिर्भर होंगे किसान। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से 'जय अनुसंधान' का जो दृष्टिकोण देश के सामने रखा है, उसे साकार करने की असली चुनौती और अवसर हमारे खेतों में मौजूद है। एक कृषि वैज्ञानिक के रूप में मेरा स्पष्ट मानना है कि जब खेती मौसम की मार और बंजर होती मिट्टी जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब जैव प्रौद्योगिकी यानी बायोटेक्नोलॉजी ही वह विज्ञान है जो भारतीय कृषि की तस्वीर बदल सकता है। खेती में विज्ञान का यह हस्तक्षेप अब कोई दूरगामी विकल्प नहीं, बल्कि आज की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है।

दो बड़े संकट, एक अहम समाधान
भारतीय खेती आज मुख्यतः दो बड़े तनावों से जूझ रही है और इनसे फसलों को बचाना विज्ञान की सबसे पहली प्राथमिकता है। पहला संकट प्रकृति की मार है। सूखा, बेमौसम बारिश, बाढ़, अचानक बढ़ता तापमान और मिट्टी व पानी में बढ़ता खारापन किसान की फसल को तबाह कर देते हैं। इन्हें अजैविक तनाव कहते हैं। अगर फसल पूरे इन प्राकृतिक आपदाओं को नहीं झेल पाती, तो किसान के हाथ सिर्फ बर्बादी आती है।

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जैव प्रौद्योगिकी फसलों में आनुवंशिक रूप से ऐसे गुण विकसित करती है, जिससे वे इन कठोर परिस्थितियों में भी टिकी रहें और अच्छी पैदावार दे सकेें। दूसरा संकट जीव-जंतुओं, कीटों और बीमारियों का हमला है। जैविक तनाव यानी जीवों द्वारा फसल को पहुंचाया जाने वाला नुकसान उतना ही घातक है। मिट्टी के भीतर के सूक्ष्म कृमि और हानिकारक जीवाणु, पौधों पर हमला करने वाले फफूंद, विषाणु, कीड़े, इल्लियां और यहां तक कि मिनटों में कई एकड़ फसल चट कर जाने वाले टिड्डी दल - ये सब इसी श्रेणी में आते हैं। इतना ही नहीं, कटाई के बाद भंडारण में लगने वाले कीड़ों से अनाज की सुरक्षा, सब्जियों की शेल्फ लाइफ बढ़ाना और उत्पादों की गुणवत्ता सुधारना भी जैव प्रौद्योगिकी की अहम उपलब्धियां हैं।

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खेती और आनुवंशिकी का सफर 
खेती के जीव विज्ञान में रोचक तथ्य यह है कि सभी पौधों को समान पानी, उर्वरक और मिट्टी मिलती है, फिर भी उनके परिणाम अलग होते हैं - किसी में कंद, किसी में पत्तियां, तो किसी में फल या अनाज अधिक विकसित होते हैं। पौधे का आनुवंशिक ढांचा यह सब तय करता है। पिछले लगभग 10 हजार वर्षों से इन्सान इस प्रक्रिया को अपने अनुसार ढालने की कोशिश कर रहा है। शुरुआत में किसान बाढ़ या सूखे जैसी विपरीत परिस्थितियों में तनकर खड़े रहने वाले मजबूत और बेहतर पौधों की पहचान करके और उनके बीज चुनकर बोते थे। बाद में, उन्होंने अलग पौधों के परागण से नए बीज तैयार करना सीखा। हालांकि, इस पारंपरिक विधि की अपनी सीमाएं हैं। यह केवल एक ही प्रजाति या करीबी प्रजातियों तक सीमित है और पूरी तरह अलग जीवों के गुणों को इसमें शामिल नहीं किया जा सकता।

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प्राकृतिक सीमाएं और वैज्ञानिक चमत्कार 
यहीं पर आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी ने प्रकृति के उस अवरोध को तोड़ दिया। इसका सबसे ज्वलंत और सफल उदाहरण कपास की खेती में देखा गया। वैैज्ञानिकों ने रिसर्च में पाया कि मिट्टी में एक ऐसा जीवाणु मौजूद होता है, जो एक विशेष प्रकार का विषैला तत्व बनाता है। यह तत्व कपास की फसल को बर्बाद करने वाली इल्लियों के लिए जानलेवा होता है। उन्होंने उस जीवाणु से जीन निकालकर कपास के पौधे में डाल दिया। नतीजा यह हुआ कि जो कीड़े पहले पूरी फसल तबाह कर देते थे, वे अब कपास का पत्ता खाते ही खत्म हो जाते हैं। दो अलग-अलग प्रजातियों के बीच यह प्रयोग प्राकृतिक ब्रीडिंग से संभव नहीं हो सकता था। 

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सही नहीं प्रकृति से खिलवाड़ का आरोप 
वैज्ञानिकों की सफलताओं को लेकर अक्सर कुछ लोग यह आरोप लगाते हैं कि वे प्रकृति के खिलाफ जा रहे हैं। मेरा स्पष्ट कहना है कि यह एक भ्रांति है। सच तो यह है कि इन्सान हजारों सालों से खेती के जरिये प्रकृति को अपने हिसाब से ही ढाल रहा है। हर नई तकनीक के साथ कुछ खतरे जुड़े होते हैं। इसे आग के उदाहरण से समझा जा सकता है। आग एक खतरा है, अगर आप उसके बहुत पास जाएंगे तो जल जाएंगे। लेकिन, इन्सानों ने आग को नियंत्रित करना सीख लिया और आज हम उससे अपना खाना पकाते हैं। यही बात बिजली पर लागू होती है, जिससे करंट लगने का खतरा है, लेकिन हम उस जोखिम का प्रबंधन करते हैं और उसका लाभ लेते हैं। जैव प्रौद्योगिकी में भी ठीक यही होता है। देश में कोई भी नया आनुवंशिक बीज या उत्पाद सीधे किसानों के खेतों तक नहीं पहुंचता। इसके पीछे एक बेहद लंबी, जटिल और सख्त नियामक प्रक्रिया काम करती है। सरकार, वैज्ञानिक समितियों और समाज की कड़ी निगरानी में उत्पाद के आर्थिक, स्वास्थ्य और पर्यावरण संबंधी खतरों का कड़ा मूल्यांकन किया जाता है। जब पूरी तरह से तसल्ली हो जाती है कि उत्पाद सुरक्षित है, तभी उसे सार्वजनिक उपयोग के लिए मंजूरी दी जाती है। 

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पश्चिमी देशों की नकल से बचना होगा 
कृषि अनुसंधान की प्राथमिकताओं को लेकर हमें पश्चिमी देशों और भारत के बीच का अंतर समझना होगा। पश्चिमी देशों में लोगों के भोजन का सत्तर से नब्बे प्रतिशत हिस्सा मांस पर आधारित होता है। वहां जो भी मक्का या सोयाबीन उगाया जाता है, उसका अधिकांश हिस्सा सीधे इन्सानों के खाने के लिए नहीं होता, बल्कि वह जानवरों को चारे के रूप में खिलाने के लिए उगाया जाता है, ताकि उन जानवरों से मांस प्राप्त किया जा सके। वहां खेती बड़े-बड़े फार्म में होती है और मजदूरों की भारी कमी है। इसलिए, वहां की तकनीकें खरपतवारनाशी रसायनों को सहने की क्षमता विकसित करने पर केंद्रित हैं, ताकि मशीनों से खरपतवार को नियंत्रित किया जा सके। इसके बिल्कुल विपरीत स्थिति भारत में है, जहां बहुत बड़ी आबादी का मुख्य भोजन सीधे तौर पर शाकाहारी है। हमारे खेतों में जो अनाज और सब्जियां पैदा होती हैं, वे सीधे इन्सान की थाली में जाती हैं। इसलिए, हमें पश्चिमी देशों की तकनीकों की अंधी नकल करने की जरूरत नहीं है। हमारी रिसर्च का केंद्र हमारी अपनी परिस्थितियों, पोषण जरूरतों, बीमारियों से बचाव और भारत की खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखकर होना चाहिए।

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वैज्ञानिकों की सामाजिक जिम्मेदारी 
वैज्ञानिक सामाजिक जिम्मेदारी भी जरूरी है। वैज्ञानिकों को अब केवल अपनी प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जब नई वैज्ञानिक तकनीकों को लेकर समाज में शंकाएं उठती हैं, तो यह वैैज्ञानिकों की जिम्मेदारी है कि वे आगे आएं, जनता से संवाद करें और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर उनके सवालों के जवाब दें। अगर वैज्ञानिक खामोश रहेंगे, तो अफवाहें फैलने लगेंगी। कृषि जैव प्रौद्योगिकी भविष्य की कोई कल्पना नहीं, बल्कि आज की नितांत आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन की मार, कम होती उपजाऊ जमीन और बढ़ती आबादी के इस दौर में पूरी तरह से जांची-परखी और सुरक्षित वैज्ञानिक तकनीकों को खुले मन से अपनाकर ही भारत अपनी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है। (देवेश सारस्वत से बातचीत पर आधारित) 

(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के मई 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)

 
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