पौधे के जीन की जिद और अपने ही पराग को ठुकराने वाली सरसों : संकर बीज की नई संभावना से बढ़ी किसानों की उम्मीद
डॉ. पारुल तोमर, लोक-संस्कृति की जानकार एवं चित्रकार
Published by: Umashankar Mishra
Updated Tue, 20 Oct 2026 04:54 PM IST
सार
सरसों के खेतों से एक अनूठी खबर आई है, जहां फूल तय करता है कि किस पराग कण को अपनाना है और किसे नकारना है। वैज्ञानिकों ने पौधों के इस फैसले को नियंत्रित करने वाले जीनों का नक्शा तैयार किया है, जिस पर चलकर सरसों की नई किस्में आसानी से विकसित की जा सकेंगी।
अपने ही परागकणों को ठुकराने की प्रकृति की व्यवस्था को स्व-असंगतता या स्व-अस्वीकृति कहते हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
बुधिया आज खुश है। सुबह-सुबह वह खेत की मेड़ पर खड़ा है और दूर तक सरसों के पीले फूल हवा में लहरा रहे हैं। उसे उम्मीद है कि सरसों की खेती आने वाले समय में उसकी आमदनी को नई दिशा देगी। बुधिया की इस उम्मीद के पीछे केवल उसकी मेहनत नहीं है। इसके पीछे खेत से हजारों गुना छोटी ऐसी दुनिया है, जहां वैज्ञानिक सरसों का भविष्य तलाश कर रहे हैं। यह कहानी है जीन की।
दिलचस्प बात यह है कि इस कहानी में सरसों का पौधा खुद वैज्ञानिकों को एक तरह से ‘न’ कहता है। आखिर कोई पौधा अपने ही परागकण को क्यों ठुकराएगा? प्रकृति की इस व्यवस्था को स्व-असंगतता या स्व-अस्वीकृति कहते हैं।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गांधीनगर और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) से सम्बद्ध सरसों अनुसंधान निदेशालय, भरतपुर के सहयोग से हुए शोध में वैज्ञानिकों ने सरसों की दो प्रमुख भारतीय किस्मों, तोरिया और पीली सरसों में इस प्रणाली से जुड़े जीनों का आणविक नक्शा तैयार किया है।
जुलाई 2026 में, शोध पत्रिका फ्रंटियर्स इन प्लांट साइंस में प्रकाशित किया गया यह शोध अहम है, क्योंकि सरसों में अधिक उपज देने वाले संकर बीजों का बड़े पैमाने पर उत्पादन अब तक आसान नहीं रहा।
कई फूल वाले पौधे अपने ही परागकणों को पहचानकर अस्वीकार कर सकते हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
तोरिया बोली ‘न’, पीली सरसों ने ‘हां’
कई फूल वाले पौधे अपने ही परागकणों को पहचानकर अस्वीकार कर सकते हैं। मानो फूल के भीतर एक अदृश्य दरवाजा हो, जिस पर ताला लगा है और चाबी केवल सही परागकण के पास है। इसे ‘लॉक-एंड-की’ प्रणाली की तरह समझा जा सकता है। इसका लाभ यह है कि पौधा स्व-परागण से बचता है, दूसरे पौधों से परागण की संभावना बढ़ती है और आनुवंशिक विविधता बनी रहती है।
दो अलग जनकों के उपयोगी गुण मिलें तो संतति में कई बार बेहतर लक्षण दिखते हैं। शोधकर्ताओं ने दो निकट संबंधी किस्मों पर ध्यान दिया। दोनों एक ही प्रजाति समूह की हैं, पर तोरिया अपने परागकण को स्वीकार नहीं करती, जबकि पीली सरसों कर सकती है।
नियंत्रित परागण प्रयोगों में तोरिया के स्व-परागण पर पराग नलिका की वृद्धि लगभग नहीं हुई, यानी परागकण को आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिला। पर, दूसरे पौधे का उपयुक्त परागकण लाने पर परागण सफल रहा और फूलों में बीज बने। समस्या परागकण में नहीं, उसकी पहचान में थी। सवाल यह था कि इस पहचान और अस्वीकृति को नियंत्रित कौन करता है।
वैज्ञानिकों ने तोरिया के फूलों में एक-एक जीन को अस्थायी रूप से निष्क्रिय किया, जिसे जीन साइलेंसिंग कहते हैं।
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कृत्रिम मेधा ने खींचा प्रोटीन का नक्शा
आणविक जीवविज्ञान और कम्प्यूटेशनल विश्लेषण से टीम ने चार प्रमुख जीनों की पहचान और परीक्षण किया। इन्हें पौधे की सूक्ष्म सुरक्षा व्यवस्था के चार हिस्से समझ सकते हैं। इनमें कोई पहचान करता है, तो कोई संदेश आगे पहुंचाता है, कोई उसे संसाधित करता है और कोई अंतिम कार्रवाई कराता है।
प्रोटीन का काम उसके त्रि-आयामी आकार से जुड़ा होता है। ताला-चाबी मौजूद हों, पर ताले के भीतर का आकार बदल जाए, तो चाबी काम नहीं करती। इसलिए, शोधकर्ताओं ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उपकरण अल्फाफोल्ड-3 से इन प्रमुख प्रोटीनों का त्रि-आयामी ब्लूप्रिंट तैयार किया। खेत में सरसों, प्रयोगशाला में जीन और कंप्यूटर पर प्रोटीन का मॉडल, तीनों ने मिलकर यह रहस्य समझने की राह बनाई।
वैज्ञानिकों ने तोरिया के फूलों में एक-एक जीन को अस्थायी रूप से निष्क्रिय किया, जिसे जीन साइलेंसिंग कहते हैं। इसके लिए कृत्रिम रूप से बने छोटे डीएनए खंड फूल के वर्तिकाग्र पर लगाए गए, यानी उस हिस्से पर, जहां परागकण सबसे पहले पहुंचता है। ये खंड किसी खास जीन से जुड़कर उसकी गतिविधि घटा देते हैं।
तीन प्रमुख जीनों को निष्क्रिय करने पर तोरिया की 'न' कहने की व्यवस्था लगभग ढह गई, और जो पौधा अपना ही पराग ठुकराता था, वह उसे अपनाने लगा। पर, चौथे जीन की कहानी अलग निकली। यह जीन पौधे को परागकण के प्रति प्रतिक्रिया देने में मदद करता है, लेकिन इसकी गतिविधि को रोक देने पर असर केवल थोड़ा-सा दिखा।
इसका मतलब है कि जिस जीन को अब तक इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा माना जाता था, तोरिया में उसकी भूमिका उतनी बड़ी नहीं निकली। यह संभव है कि इस किस्म में कोई और तरीका उसका काम संभाल लेता हो।
एक दरवाजा, दो ताले
शोधकर्ताओं ने परागण के कुछ ही मिनटों के भीतर वर्तिकाग्र पर होने वाले जैव-रासायनिक बदलाव भी देखे। असंगत परागकण गिरते ही पौधा प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन अणुओं की एक स्थानीय रासायनिक ढाल बना देता है, जो परागकण के अंकुरण को रोकने में भूमिका निभाती है।
विशेष रंग-परीक्षण में जहां ये अणु जमा हुए, वहां रंग गहरा दिखा। परागकण को पहचानने और उस पर प्रतिक्रिया करने वाले कुछ जीनों को शांत करने पर यह रासायनिक प्रतिक्रिया घट गई, पर एक अन्य जीन को शांत करने पर खास बदलाव नहीं आया। इसका अर्थ है कि सरसों में अपने परागकण को रोकने के दो तरीके हैं। एक में रासायनिक प्रतिक्रिया होती है, दूसरे में कोशिका के भीतर कुछ पदार्थ तोड़कर परागकण को रोका जाता है। मानो एक ही दरवाजे पर दो ताले हों, एक विफल हो तो दूसरा काम संभाल ले। यही स्वयं-अस्वीकृति प्रणाली को और मजबूत बना सकता है।
किसानों के लिए अहम है यह खोज
सरसों मुख्यतः स्वयं-परागण वाली फसल है, इसलिए उच्च उपज वाले संकर बीजों का बड़े पैमाने पर उत्पादन कठिन और महंगा रहा है। पारंपरिक संकर बीज उत्पादन में हजारों फूलों से हाथ से पुंकेसर हटाने की श्रमसाध्य मेहनत करनी पड़ सकती है। स्व-अस्वीकृति की प्राकृतिक व्यवस्था को समझकर नियंत्रित किया जा सके तो भरोसेमंद संकर बीज उत्पादन आसान हो सकता है।
संकर सरसों की कुछ किस्मों में सामान्य किस्मों की तुलना में अधिक उपज और बेहतर तेल उत्पादन की संभावना देखी गई है, हालांकि खेत-स्तर के परिणाम किस्म, वातावरण और प्रबंधन पर निर्भर करेंगे। फिर भी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों के किसानों के लिए बेहतर बीज का अर्थ कम क्षेत्र में अधिक उत्पादन और बेहतर आर्थिक अवसर हो सकता है।
खाद्य तेल के मोर्चे पर हो सकता है लाभ
भारत की खाद्य तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है, इसलिए घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाना किसान की आय के साथ खाद्य और आर्थिक सुरक्षा का भी सवाल है। बेहतर संकर किस्में विकसित होकर खेतों में अच्छा प्रदर्शन करें, तो घरेलू सरसों उत्पादन बढ़ सकता है और आयात निर्भरता घटाने के राष्ट्रीय प्रयासों, जैसे राष्ट्रीय
खाद्य तेल मिशन (तिलहन) को बल मिल सकता है।
ब्रीडर अब स्व-असंगतता के गुण को दूसरे उपयोगी गुणों के साथ जोड़ने पर काम कर सकते हैं।
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लखनऊ से भरतपुर तक फैली नई उम्मीद
तोरिया और पीली सरसों उत्तर भारत के कई हिस्सों की अहम फसलें हैं। लखनऊ से भरतपुर तक के कृषि क्षेत्र में इस शोध से स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बेहतर बीज की उम्मीद बढ़ी है, जिसका लाभ आगे छोटे और सीमांत किसानों तक पहुंच सकता है।
ब्रीडर अब स्व-असंगतता के गुण को दूसरे उपयोगी गुणों के साथ जोड़ने पर काम कर सकते हैं, यानी एक ही नई किस्म में कई खूबियां लाने की कोशिश। पर, बुधिया की उम्मीद तुरंत खेत तक नहीं पहुंचेगी। प्रयोगशाला की खोज को पहले नई किस्मों के विकास और परीक्षण से गुजरना होगा।
अलग-अलग मिट्टी और मौसम में उनका मूल्यांकन होगा और बीज उत्पादन की उपयुक्त तकनीक विकसित करनी होगी। तभी यह तकनीक बड़े पैमाने पर किसानों तक पहुंचेगी। यह मंजिल नहीं, पर बुधिया के खेत तक पहुंचने की दिशा में एक मजबूत शुरुआत जरूर है।
(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के अक्तूबर 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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