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उत्तराखंड का मणिगुह : पहाड़ की चोटी पर किताबों वाला गांव, खास हैं पुस्तक मंदिर
गांव जंक्शन डेस्क, नोएडा
Published by: Mohammad Aamil
Updated Sun, 13 Jul 2025 07:13 PM IST
सार
मणिगुह की लाइब्रेरी में 17,000 से अधिक किताबें हैं। साहित्य, विज्ञान, इतिहास, धर्म, प्रतियोगी परीक्षाएं, तकनीकी शिक्षा... और ये सिर्फ हिंदी ही नहीं, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत, पंजाबी, कश्मीरी जैसी कई भाषाओं में उपलब्ध हैं।
किताबों वाला गांव, सपनों वाला संसार
- फोटो : गांव जंक्शन
उत्तराखंड के गांवों से लोगों के पलायन की खबरें खूब सुनी जाती हैं। इन मुश्किल हलातों में कई लोग ऐसे भी हैं, जो गांवों से पलायन रोकने के साथ कुछ अच्छा कर रहे हैं। उन्हीं में से एक पति-पत्नी की जोड़ी है, जिसने 'हमारा गांव घर फाउंडेशन' के जरिए समुद्र तल से 1664 मीटर की ऊंचाई पर स्थित छोटे से गांव मणिगुह को नई पहचान दिलाई। उन्होंने रुद्रप्रयाग जिले के इस गांव को ‘पुस्तकालय गांव’ बनाया है। अब, यह गांव न सिर्फ पढ़ने की आदतों को जीवित रखे हुए है, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और प्रकृति को एक साथ गूंथने का अनूठा प्रयास कर रहा है।
17 हजार से ज्यादा किताबें
मणिगुह की लाइब्रेरी में 17,000 से अधिक किताबें हैं। साहित्य, विज्ञान, इतिहास, धर्म, प्रतियोगी परीक्षाएं, तकनीकी शिक्षा... और ये सिर्फ हिंदी ही नहीं, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत, पंजाबी, कश्मीरी जैसी कई भाषाओं में उपलब्ध हैं। यह एक ऐसी जगह है जहां पढ़ाई मजबूरी नहीं, खुशी है। यह पुस्तकालय पूरी तरह हाईटेक है।
यहां फ्री कंप्यूटर शिक्षा, इंटरनेट एक्सेस, ऑनलाइन अध्ययन, और बेसिक आईटी ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि गांव के बच्चे तकनीक की दौड़ में पीछे न रहें। यहां 1800 से 1905 के बीच छपी नवकिशोर प्रेस की दुर्लभ किताबें भी मौजूद हैं। जब आप इन्हें पढ़ते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे किसी इतिहास की गली में टहल रहे हों। यह विरासत आने वाली पीढ़ियों को जड़ों से जोड़ती है।
पत्नी ने छोड़ी बड़ी नौकरी, पति ने दिया साथ
- फोटो : सोशल मीडिया
पत्नी ने छोड़ी बड़ी नौकरी, पति ने दिया साथ
सुमन मिश्रा और बेनी नेगी मिश्र ये वो नाम हैं, जिन्होंने शादी के बाद एक गुमनाम गांव को पहचान दे दी। बीना नेगी, रुद्रप्रयाग के गांव बांजगड्डू की रहने वाली हैं। एमबीए करने के बाद उन्होंने दिल्ली में एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर मैनेजर पद पर नौकरी की। उनके पति सुमन मिश्रा, रेख्ता फाउंडेशन के सूफीनामा प्लेटफॉर्म में संपादक हैं। बीना के मन में गांव बसा हुआ था, वे नौकरी छोड़कर वापस गांव आ गईं और वहां शिक्षा का अलख जगाने में जुट गईं। इसमें उनके पति ने उनका बखूबी साथ दिया।
ऐसे की शुरुआत
सुमन मिश्रा बताते हैं कि उन्होंने और उनके साथियों ने मिलकर साल 2023 में मणिगुह गांव को 'पुस्तकालय गांव' बनाने पर काम शुरू किया। वह कहते हैं कि लाइब्रेरी में फाउंडेशन के को-फाउंडर्स राहुल रावत और आलोक सोनी का अहम रोल है। कम संसाधनों के बाबजूद सभी ने कड़ी मेहनत से गांव में लाइब्रेरी बनाना शुरू की। रास्ता खराब था तो खच्चरों के जरिए किताबें व अन्य सामान लाया गया। 26 जनवरी 2023, गणतंत्र दिवस एवं बसंत पंचमी के अवसर पर पुस्तकालय का उद्घाटन किया।
इस पुस्तकालय से हिमालय की चोटियां- चौखंभा, सतोपंथ और थलय सागर नजर आती हैं
- फोटो : सोशल मीडिया
होम-स्टे की भी सुविधा, दिखते हैं खूबसूरत नजारें
मणिगुह में होम-स्टे की सुविधा भी उपलब्ध है। पर्यटक यहां के घरों में रहकर स्थानीय खान-पान, संस्कृति, जीवनशैली को करीब से अनुभव कर सकते हैं। पास ही शुरू होता है घना जंगल, जो इस मौसम में बुरांस के फूलों से गुलजार हो जाता है। इस पुस्तकालय से हिमालय की चोटियां- चौखंभा, सतोपंथ और थलय सागर नजर आती हैं। यहां किताबें पढ़ना एक आध्यात्मिक अनुभव जैसा लगता है। पर्यटक तक कहते हैं “यहां किताबें नहीं, ख्वाब पलते हैं।”
गांव की महिलाओं का नवाचार
गांव की महिलाएं जंगल से गिरे पिरूल (चीड़ की पत्तियां) से सौंदर्यपूर्ण राखियां बनाती हैं। ये राखियां न सिर्फ प्राकृतिक रूप से बनी होती हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता और पर्यावरण प्रेम का प्रतीक भी हैं। “हमारा गांव घर फाउंडेशन” इन राखियों को आप तक पहुंचा रहा है। सुमन कहते हैं कि एक राखी की कीमत 150 प्रति नग (डाक खर्च सहित) रखी है। यह खरीद एक राखी नहीं, एक संदेश है, जो प्रकृति, परंपरा और पहल का।
खास हैं पुस्तक मंदिर
सुमन मिश्रा ने फाउंडेशन के जरिए मणिगुह के साथ-साथ प्रतापनगर, खमोली, बंडी और खाल्यू में पुस्तक मंदिर भी शुरू किए हैं। इन छोटे-छोटे मंदिरों में लोग खुले आसमान और खूबसूरत नजारों के बीच किताबें पढ़ते हैं। सुमन ने बताया कि गांव में पिछले तीन वर्षों में पुस्तक मैराथन, पेरूल वर्कशॉप, लाइब्रेरी महोत्सव जैसे आयोजन हुए, जहां बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने भाग लिया। अब यहां ज्ञान बोझ नहीं, रोशनी बन चुका है।
कैसे पहुंचे?
रुद्रप्रयाग से 36 किमी दूर, केदारनाथ रूट पर स्थित बेडू बगड़ से होकर 13 किमी पहाड़ी रास्ता तय करके मणिगुह पहुंचा जा सकता है। रास्ते में मिलती हैं हिमालय की दृश्यावली, सादगी भरे गांव और शांति का अनुभव।
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