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बंजर जमीन पर महिलाओं ने उगाई नई उम्मीद: 7 एकड़ में खस, सतावर और सब्जियों की खेती से लिखी आत्मनिर्भरता की कहानी

गांव जंक्शन डेस्क, दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sun, 12 Jul 2026 04:58 PM IST
सार

  • धमतरी की महिलाओं ने 7 एकड़ बंजर जमीन को खेती योग्य बनाया।
  • वंदना महिला स्व-सहायता समूह ने शुरू की औषधीय और सब्जियों की खेती।
  • 4 एकड़ में खस और 2 एकड़ में पीली सतावर की खेती।
  • सब्जियों की बिक्री से शुरू हुई नियमित आय।
  • खेती में गोबर की खाद और प्राकृतिक तरीकों को दी जा रही प्राथमिकता।
  • मनरेगा के तहत भी महिलाओं को मिला रोजगार।

बंजर जमीन पर महिलाओं ने उगाई नई उम्मीद
बंजर जमीन पर महिलाओं ने उगाई नई उम्मीद - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के मंदरोत गांव की महिलाओं ने सामूहिक मेहनत, वैज्ञानिक खेती और सरकारी सहयोग के दम पर बंजर जमीन को हरी-भरी खेती में बदल दिया है। कभी नदी किनारे पड़ी 7 एकड़ अनुपयोगी भूमि आज खस (Vetiver), पीली सतावर और मौसमी सब्जियों से लहलहा रही है। यह बदलाव वंदना महिला स्व-सहायता समूह (SHG) की मेहनत और नवाचार का परिणाम है। महिलाओं की यह पहल न केवल उनकी आय बढ़ा रही है, बल्कि गांव की अन्य महिलाओं के लिए भी आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा बन रही है।

पंचायत से मिली जमीन, फिर शुरू हुआ बदलाव
वंदना महिला स्व-सहायता समूह की सदस्य दुलारी बताती हैं कि ग्राम पंचायत ने समूह को पांच वर्ष के अनुबंध पर नदी किनारे की 7 एकड़ बंजर जमीन उपलब्ध कराई। जमीन मिलने के बाद सबसे पहले महिलाओं ने बाड़बंदी, भूमि समतलीकरण, मिट्टी सुधार और वृक्षारोपण का काम किया। इसके बाद खेती की शुरुआत की गई।

4 एकड़ में खस, 2 एकड़ में सतावर की खेती
छत्तीसगढ़ राज्य औषधीय पादप बोर्ड ने समूह को खस के पौधे और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया। वर्तमान में 4 एकड़ में खस की खेती, 2 एकड़ में पीली सतावर की खेती और शेष भूमि पर मौसमी सब्जियों का उत्पादन किया जा रहा है।

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सब्जियों से मिल रही नियमित आय
समूह की महिलाओं को मौसमी सब्जियों की बिक्री से नियमित आय होने लगी है। वहीं, खस और पीली सतावर जैसी औषधीय फसलें तैयार होने के बाद भविष्य में अधिक मुनाफा मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञों के अनुसार औषधीय पौधों की बाजार में अच्छी मांग रहती है, जिससे किसानों को पारंपरिक फसलों की तुलना में बेहतर आमदनी मिल सकती है।

प्राकृतिक खेती पर जोर
दुलारी बताती हैं कि खेती में मुख्य रूप से गोबर की खाद का उपयोग किया जाता है। रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल बहुत कम किया जाता है और आवश्यकता पड़ने पर ही वैज्ञानिक तरीके से कीट प्रबंधन अपनाया जाता है। इससे खेती की लागत कम रहती है और मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहती है।

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मनरेगा से भी मिला रोजगार
महिलाओं को खेती के साथ-साथ महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत वृक्षारोपण और अन्य कार्यों में भी रोजगार मिला, जिससे उनकी अतिरिक्त आय बढ़ी।

750 स्वयं सहायता समूहों को मिल रही प्रेरणा
देवी महिला संकुल संगठन की पीआरपी अनुपमा लोनहारे के अनुसार, उनके संकुल से 32 ग्राम पंचायतों और 39 गांवों के लगभग 750 स्वयं सहायता समूह जुड़े हुए हैं, जिनमें वंदना महिला समूह भी शामिल है। उन्होंने बताया कि औषधीय फसलों की खेती किसानों और महिला समूहों के लिए आय बढ़ाने का बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है। इससे पारंपरिक धान की खेती की तुलना में अधिक लाभ मिलने की संभावना है।

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महिलाओं के लिए प्रेरणा बनी यह पहल
वंदना महिला स्व-सहायता समूह की यह पहल दिखाती है कि यदि सामूहिक प्रयास, सही प्रशिक्षण और सरकारी योजनाओं का लाभ मिले तो बंजर भूमि को भी उपजाऊ बनाया जा सकता है। यह मॉडल महिलाओं को रोजगार, आत्मनिर्भरता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का सफल उदाहरण बनकर सामने आया है।


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