आज जब पंजाब के हजारों युवा बेहतर भविष्य की तलाश में विदेश जा रहे हैं, वहीं बठिंडा जिले के भागी बांदर गांव के 35 वर्षीय गुरदीप सिंह ने अपने गांव में रहकर खेती और पशुपालन के दम पर सफलता की नई कहानी लिखी है। उन्होंने करीब 10 वर्षों में दो भैंसों और एक बकरी से शुरुआत कर आज लगभग 1 करोड़ रुपये मूल्य का एकीकृत कृषि एवं पशुपालन उद्यम खड़ा कर लिया है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार आज गुरदीप वैज्ञानिक तरीके से डेयरी, बकरी पालन और खेती कर रहे हैं। उनके इस व्यवसाय का सालाना कारोबार लगभग 36 से 37 लाख रुपये है, जबकि सभी खर्च निकालने के बाद उन्हें करीब 25 लाख रुपये का शुद्ध लाभ होता है।
नौकरी छोड़कर अपनाया खेती और पशुपालन
गुरदीप सिंह ने बीए करने के बाद बठिंडा के जिला प्रशासनिक परिसर में टाइपिस्ट की नौकरी की। चार साल तक नौकरी करने के बाद उन्हें लगा कि वे स्वतंत्र रूप से कुछ करना चाहते हैं। वर्ष 2014 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और अपने पिता के साथ खेती और पशुपालन शुरू कर दिया। गुरदीप बताते हैं कि यही फैसला उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।
दो भैंस और एक बकरी से हुई शुरुआत
शुरुआत में उनके घर में केवल दो भैंसें थीं, जिनका दूध परिवार के उपयोग के लिए होता था। इसके अलावा उन्होंने कुछ हजार रुपये खर्च कर बीटल नस्ल की एक बकरी खरीदी। उन्होंने कमाई को खर्च करने के बजाय हर साल अपने व्यवसाय में दोबारा निवेश किया। धीरे-धीरे पशुओं की संख्या बढ़ती गई और आज उनका छोटा प्रयास एक सफल व्यवसाय में बदल चुका है।
आज हैं 22 भैंसें और 50 बीटल बकरियां
वर्तमान में गुरदीप के पास 21-22 नीली रवि और मुर्रा नस्ल की भैंसें हैं। इनमें से 10-12 भैंसें हर समय दूध देती हैं। इसके अलावा उनके पास लगभग 50 शुद्ध नस्ल की बीटल बकरियां भी हैं। खेती के लिए उनके पास कुल 11 एकड़ जमीन है, जिसमें 8 एकड़ अपनी और 3 एकड़ पट्टे पर ली गई है।
दूध बिक्री से हर साल 20 लाख रुपये तक की कमाई
गुरदीप की आय का सबसे बड़ा स्रोत डेयरी है। वे अपने ग्राहकों के घरों तक सीधे दूध पहुंचाते हैं, जिससे उन्हें बेहतर दाम मिलते हैं। दूध बिक्री से उन्हें हर साल लगभग 18 से 20 लाख रुपये की आय होती है। इसके अलावा वे हर वर्ष 2 से 3 अच्छी नस्ल की नीली रवि और मुर्रा भैंसें भी बेचते हैं, जिनकी कीमत करीब 1.5 लाख रुपये प्रति भैंस होती है।
बकरी पालन भी बना लाभ का बड़ा जरिया
गुरदीप केवल बकरियों के बच्चे बेचने पर निर्भर नहीं रहते। वे मादा बच्चों को अपने फार्म पर ही रखकर झुंड बढ़ाते हैं। वर्तमान में वे हर साल 50 से अधिक बकरी के बच्चे बेचते हैं। एक बच्चे की कीमत 10 से 12 हजार रुपये तक मिलती है, जबकि अच्छी नस्ल की प्रजनन योग्य बकरी 30 हजार रुपये तक बिक जाती है। बकरी पालन से उन्हें हर साल खर्च निकालने के बाद लगभग 6 से 7 लाख रुपये की आय होती है।
पशुपालन बना आर्थिक सुरक्षा का मजबूत आधार
गुरदीप का मानना है कि पशुधन किसानों के लिए सबसे सुरक्षित निवेश है। जरूरत पड़ने पर पशुओं को आसानी से बेचकर नकदी प्राप्त की जा सकती है। साथ ही ये मशीनों की तरह निष्क्रिय नहीं रहते, बल्कि रोज दूध और प्रजनन के माध्यम से आय भी देते हैं। इसी आय की बदौलत उन्होंने एक एकड़ अतिरिक्त जमीन और 500 वर्ग गज का आवासीय प्लॉट भी खरीदा है।
चारे की व्यवस्था खुद करते हैं
पशुओं का खर्च कम रखने के लिए गुरदीप अपने खेत में ही मक्का, हरा चारा, कम अवधि वाली धान, गेहूं और ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती करते हैं। इससे बाजार से चारा खरीदने की जरूरत कम पड़ती है और लागत नियंत्रित रहती है। वे बताते हैं कि फसल से होने वाली आय को बचत के रूप में रखते हैं, जबकि घर का पूरा खर्च डेयरी और बकरी पालन की कमाई से चलता है। खास बात यह है कि उन्होंने आज तक अपने व्यवसाय के लिए कोई बैंक ऋण नहीं लिया।
किसानों को मुफ्त में देते हैं प्रशिक्षण
गुरदीप का फार्म अब आसपास के किसानों के लिए सीखने का केंद्र बन चुका है। हर सप्ताह 4-5 किसान उनके फार्म पर पशुपालन की जानकारी लेने आते हैं। वे सभी को मुफ्त में प्रशिक्षण देते हैं और सलाह देते हैं कि शुरुआत हमेशा छोटे स्तर से करें, अच्छी नस्ल के पशु तैयार करें, मुनाफे को दोबारा व्यवसाय में लगाएं और संख्या से अधिक गुणवत्ता पर ध्यान दें।
विदेश जाने की बजाय गांव में ही बनाई सफलता
गुरदीप सिंह का कहना है कि उन्हें भी विदेश जाने के अवसर मिले थे, लेकिन उन्होंने अपने परिवार और गांव के साथ रहकर खेती-पशुपालन को चुना। उनका कहना है कि यदि किसान आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से काम करें तो पंजाब की जमीन ही उन्हें विदेशों जैसी कमाई दे सकती है। उनके अनुसार, मेहनत और सही योजना के साथ डेयरी और बकरी पालन किसानों को कर्ज से निकालकर आर्थिक रूप से मजबूत बना सकते हैं।
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