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हौसले की जीत : किसान ने 6 महीने तक अकेले खोदा 29 फीट गहरा कुआं, अब सूखे खेतों में लौटेगी हरियाली

गांव जंक्शन डेस्क, दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Mon, 06 Jul 2026 01:07 PM IST
सार

दिसंबर 2025 में गणेश महतो ने किसी सरकारी मदद का इंतजार करने के बजाय खुद ही कुआं खोदने का फैसला किया। तेज धूप, शारीरिक थकान और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने रोज मेहनत जारी रखी। करीब छह महीने तक लगातार काम करने के बाद उन्होंने अकेले 29 फीट गहरा सिंचाई का कुआं तैयार कर दिया।
 

किसान ने 6 महीने तक अकेले खोदा 29 फीट गहरा कुआं
किसान ने 6 महीने तक अकेले खोदा 29 फीट गहरा कुआं - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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कहते हैं कि जहां हौसला होता है, वहां रास्ता खुद बन जाता है। झारखंड के एक किसान ने इस कहावत को सच कर दिखाया। सिंचाई के लिए पानी का कोई साधन नहीं बचा तो उन्होंने हार मानने के बजाय फावड़ा उठाया और छह महीने की लगातार मेहनत से अकेले 29 फीट गहरा कुआं खोद डाला। आज उनकी यह मेहनत लाखों किसानों के लिए प्रेरणा बन गई है।

सिंचाई की समस्या बनी जीवन की सबसे बड़ी चुनौती
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, आर्थिक रूप से कमजोर किसान गणेश महतो का परिवार छोटी जोत की खेती, दिहाड़ी मजदूरी और स्थानीय बाजार में नाश्ता बेचकर अपना गुजारा करता है। पहले वह पड़ोसी के कुएं से खेत की सिंचाई कर लेते थे, लेकिन पारिवारिक विवाद के बाद यह व्यवस्था खत्म हो गई। इसके बाद उनकी खेती के सामने पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया।

फावड़ा उठाया और शुरू कर दी अकेले कुआं खोदने की मेहनत
दिसंबर 2025 में गणेश महतो ने किसी सरकारी मदद का इंतजार करने के बजाय खुद ही कुआं खोदने का फैसला किया। तेज धूप, शारीरिक थकान और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने रोज मेहनत जारी रखी। करीब छह महीने तक लगातार काम करने के बाद उन्होंने अकेले 29 फीट गहरा सिंचाई का कुआं तैयार कर दिया।

पैसों की कमी के बावजूद नहीं टूटा हौसला
गणेश का कहना है कि आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वह पर्याप्त सीमेंट, रेत और अन्य निर्माण सामग्री नहीं खरीद सके। ऐसे में कुएं की ईंटों की चिनाई स्थानीय मिट्टी के गारे से की गई। एक समय ऐसा भी आया जब लोहे की छड़ें खरीदने तक के पैसे नहीं थे।

गांव वालों ने बढ़ाया मदद का हाथ
जब गांव के लोगों ने गणेश महतो की मेहनत देखी तो कई लोग उनकी मदद के लिए आगे आए। गांव के निवासी सुखदेव महतो ने निर्माण कार्य के लिए लगभग 10 लोहे की छड़ें उपलब्ध कराईं। ग्रामीणों ने भी उनका मनोबल बढ़ाया और हर संभव सहयोग किया। गणेश महतो कहते हैं, "खेती के लिए पानी का कोई दूसरा साधन नहीं था। मेरे पास खुद कुआं खोदने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। फावड़े की हर चोट मेरी मजबूरी और संघर्ष से लड़ाई थी। अगर मैं यह कदम नहीं उठाता, तो मेरे खेत हमेशा सूखे रह जाते।"

गांव वालों ने कहा- ऐसा जज्बा पहले कभी नहीं देखा
गणेश की मेहनत देख उनके गांव के लोग भी हैरान हैं। गांव के एक  ग्रामीण मनोज कुमार के अनुसार, "हमने पहले कभी किसी को इतनी लगन और मेहनत से अकेले कुआं खोदते नहीं देखा। उन्होंने बिना हार माने मशीन की तरह लगातार काम किया।"

अब प्रशासन ने भी लिया संज्ञान
ग्रामीणों का कहना है कि मनरेगा जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें समय पर नहीं मिल सका। मामला सामने आने के बाद बोकारो के उपायुक्त अजय नाथ झा ने स्थानीय अधिकारियों को जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं। प्रशासन का कहना है कि पूरे मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है। गणेश महतो की कहानी बताती है कि सीमित संसाधन और कठिन परिस्थितियां भी उस व्यक्ति को नहीं रोक सकतीं, जिसके भीतर कुछ कर दिखाने का दृढ़ संकल्प हो। उनकी मेहनत सिर्फ एक कुआं नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, संघर्ष और आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गई है।
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