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युद्ध रोकने से ही नहीं, भूख मिटाने पर भी मिलता है नोबेल : जब किसान के बेटे को मिला था सबसे प्रतिष्ठित सम्मान

गांव जंक्शन, नोएडा Published by: Mohammad Aamil Updated Sat, 21 Jun 2025 07:33 PM IST
सार

जब हम आज किसी को नोबेल पुरस्कार का दावेदार मानते हैं, तो यह याद रखना जरूरी है कि शांति केवल युद्ध रोकने से नहीं आती, बल्कि भूख मिटाने, शिक्षा देने और अवसर पैदा करने से भी आती है। कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग का जीवन इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग ने वैज्ञानिक कृषि के जरिए दुनिया के करोड़ों लोगों को भुखमरी से बचाया था
नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग ने वैज्ञानिक कृषि के जरिए दुनिया के करोड़ों लोगों को भुखमरी से बचाया था - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नोबेल पुरस्कार जीतने का ख्वाब पालकर बैठे हैं। इसके लिए उन्होंने दूसरी बार राष्ट्रपति बनते ही पहल शुरू कर दी। पहले रूस-यूक्रेन जंग में मध्यस्ता की असफल कोशिश, फिर भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद सीजफायर का दावा कर ट्रंप दुनिया में अपनी छवि एक शांतिदूत के तौर पर उकेरने में लगे हुए हैं। 

हाल ही में ईरान-इजरायल युद्ध में भी वह बहुत सोच समझकर कदम उठा रहे हैं। यहां तक कि पाकिस्तान ने तो डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल के लिए नॉमिनेट तक कर डाला। ट्रंप, युद्धों को रोककर नोबेल अवार्ड पाना चाहते हैं। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि यह पुरस्कार युद्ध को रोकने के बजाय भूख से लड़ने के अद्वितीय प्रयास के लिए भी एक शख्स को दिया गया था? चलिए जानते हैं... 

करोड़ो लोगों को मिली भूख से मुक्ति
आज जब कई देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता की बात कर रहे हैं, तो इसके पीछे एक ऐसा नाम है जिसने चुपचाप करोड़ों लोगों को भूख से मुक्ति दिलाई। वो नाम है 'नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग', जो एक अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक थे। उनको विश्व में हरित क्रांति का जनक माना जाता है। 1970 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह पुरस्कार युद्ध को रोकने के बजाय भूख से लड़ने के उनके अद्वितीय प्रयास के लिए दिया गया, जो अब तक के सबसे मानवीय कार्यों में से एक माना जाता है।
कौन हैं नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग?
कौन हैं नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग? - फोटो : गांव जंक्शन
कौन हैं नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग?
नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग का जन्म 25 मार्च 1914 को संयुक्त राज्य अमेरिका के स्टेट आयोवा के क्रेस्को में एक किसान परिवार में हुआ था। उनका जीवन एक आम किसान बालक से लेकर वैश्विक वैज्ञानिक बनने तक का प्रेरक सफर है। उन्होंने मिनेसोटा विश्वविद्यालय से वानिकी में ग्रेजुएशन और बाद में प्लांट पैथोलॉजी में एमएस और पीएचडी की डिग्री हासिल की। 
 
बोरलॉग का विश्वास था कि विज्ञान के सहारे भूख और गरीबी को हराया जा सकता है। उन्होंने कभी कहा था, "भूखे पेट शांति नहीं हो सकती, और खाद्य सुरक्षा ही स्थायी शांति की नींव है।" इस विचार ने उन्हें जीवनभर किसानों, वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं के साथ जोड़कर रखा।


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वैज्ञानिक कृषि सुधार कार्यक्रम

बोरलॉग के नेतृत्व में शुरू हुआ वैज्ञानिक कृषि सुधार कार्यक्रम 1940 के दशक में मेक्सिको से शुरू हुआ। वहां उन्होंने रोग प्रतिरोधी और उच्च उपज देने वाली गेहूं की किस्में विकसित कीं, जो न केवल देश को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में सफल रहीं, बल्कि आगे चलकर भारत और पाकिस्तान जैसे विकासशील देशों में भी क्रांति ले आईं।

भारत में कर दिया चमत्कार
भारत में जब 1960 के दशक में खाद्यान्न संकट चरम पर था और अकाल की स्थितियां बन रही थीं, तब बोरलॉग के "मैक्सिकन गेहूं" ने भारत में चमत्कार कर दिखाया। गेहूं उत्पादन तीन गुना तक बढ़ गया और देश ने 1970 तक खाद्यान्न आत्मनिर्भरता हासिल कर ली। यही वह बदलाव था जिसे "हरित क्रांति" कहा गया। यह एक ऐसी क्रांति थी, जिसने देश की कृषि और अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल दी।

विश्व खाद्य पुरस्कार की स्थापना
बोरलॉग के प्रशिक्षण और विचारों से हजारों कृषि वैज्ञानिक प्रेरित हुए, और उन्होंने CIMMYT (अंतर्राष्ट्रीय मकई और गेहूं सुधार केंद्र) के माध्यम से अनेक विकासशील देशों में कृषि तकनीकों का प्रसार किया। उन्होंने विश्व खाद्य पुरस्कार की स्थापना भी की, ताकि खाद्य और कृषि के क्षेत्र में नवाचार को वैश्विक पहचान दी जा सके। 

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क्यों कहते हैं 'हरित क्रांति का जनक'?
बोरलॉग को हरित क्रांति का जनक कहा जाता है। उन्होंने खेती को परंपरागत तरीकों से हटाकर विज्ञान आधारित, अधिक उत्पादक और सतत (sustainable) प्रणाली में बदल दिया। उनके प्रयासों से फसलों की उत्पादकता बढ़ी। भूख और कुपोषण में कमी आई। साथ ही कई विकासशील देशों में खाद्य आत्मनिर्भरता आई। 
भारत और नोबेल
भारत और नोबेल - फोटो : गांव जंक्शन
भारत ने किया था पद्म विभूषण से सम्मानित
25 जनवरी 2006 को, नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग को भारत के राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम (अमेरिका) और कांग्रेसनल गोल्ड मेडल (अमेरिका) से भी सम्मानित किया गया था। 
 

बोरलॉग अपने अंतिम वर्षों तक सक्रिय रहे। उन्होंने अफ्रीका में किसानों के लिए कार्यक्रम चलाया और Ug99 जैसी खतरनाक फसल बीमारियों के खिलाफ वैश्विक चेतना जगाई। वे कहते थे, "जब तक भूख है, तब तक मेरा काम अधूरा है।" 



भारत और नोबेल
विश्व का सबसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान को भारत के लिए भी गौरव का विषय रहा है। रवींद्रनाथ टैगोर (साहित्य, 1913), सीवी रमन (भौतिकी, 1930), मदर टेरेसा (शांति, 1979), अमर्त्य सेन (अर्थशास्त्र, 1998) और कैलाश सत्यार्थी (शांति, 2014) जैसे नाम भारत की शान हैं।

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क्या है नोबेल पुरस्कार? 

चलिए जानते हैं कि नोबेल पुरस्कार आखिर है क्या? नोबेल पुरस्कार को विश्व का सबसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान माना जाता है। यह पुरस्कार उन व्यक्तियों या संगठनों को प्रदान किया जाता है, जिन्होंने बीते वर्ष के दौरान मानव जाति को 'सबसे बड़ा फायदा' पहुंचाया हो। प्रसिद्ध स्वीडिश वैज्ञानिक और डायनामाइट के आविष्कारक अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत पर इसकी स्थापना आधारित है।

किन क्षेत्रों में मिलता है नोबेल?
नोबेल पुरस्कार छह क्षेत्रों में मिलता है। शुरुआत में यह पुरस्कार पांच क्षेत्रों- भौतिकी, रसायन विज्ञान, चिकित्सा/फिजियोलॉजी, साहित्य और शांति के लिए दिया जाता था। विशेष रूप से शांति पुरस्कार उन लोगों को दिया जाता है, जिन्होंने, राष्ट्रों के बीच भाईचारे को बढ़ावा देने, स्थायी सेनाओं को कम करने या खत्म करने, और शांति सम्मेलनों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। वर्ष 1968 में एक छठा पुरस्कार जोड़ा गया, जिसे अर्थशास्त्र के क्षेत्र में 'स्वेरिजेस रिक्सबैंक पुरस्कार' कहा जाता है। यह नोबेल की वसीयत में शामिल नहीं था, परंतु इसे भी नोबेल पुरस्कार समारोह के साथ ही प्रदान किया जाता है।


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