Home›Kheti Kisani›Krishi Vyapar›
India S Sugar Market Under Pressure Falling Output Rising Demand And The Ethanol Equation
कीमतों में उछाल, मिठास में कड़वाहट: गन्ने से इथेनॉल तक चीनी के बाजार का बदला गणित, कैसा रहेगा त्योहारी सीजन
अजय केडिया, बाजार विशेषज्ञ
Published by: Umashankar Mishra
Updated Mon, 21 Sep 2026 01:08 PM IST
सार
बढ़ती मांग, घटते उत्पादन और इथेनॉल के लिए डायवर्जन से चीनी आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है। आयात से राहत मिल सकती है, पर कीमतों की दिशा नए पेराई सीजन, मौसम, रिकवरी रेट और नीतियों पर निर्भर करेगी। जानिए, विस्तार से...
देश के कई हिस्सों में चीनी की खुदरा कीमतें 65 रुपये प्रति किलो के करीब पहुंच गई हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
सुबह की चाय हो या त्योहारों की मिठाई, चीनी के बिना भारतीय रसोई की कल्पना मुश्किल है। इन दिनों यह मिठास उपभोक्ताओं की जेब पर भारी पड़ रही है। भारतीय चीनी बाजार इस समय अहम मोड़ पर है। देश के कई हिस्सों में चीनी की खुदरा कीमतें 65 रुपये प्रति किलो के करीब पहुंच गई हैं।
महज एक महीने में देश भर के खुदरा और थोक बाजारों में चीनी के दाम 24 प्रतिशत उछलकर 56 से 60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। इस तेजी ने उपभोक्ताओं, व्यापारियों और नीति निर्माताओं की चिंताएं बढ़ा दी हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि हमेशा अधिशेष रहने वाला हमारा चीनी बाजार अचानक तंगी का सामना कर रहा है?
दरअसल, बाजार में पूरी तरह से सप्लाई की कमी नहीं है, बल्कि हम एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। बाजार आरामदायक सरप्लस की स्थिति से निकलकर ‘टाइट सप्लाई’ वाले माहौल में प्रवेश कर गया है।
घटता उत्पादन और बढ़ता दबाव
इस संकट का सबसे बड़ा कारण उत्पादन अनुमानों में आई भारी कमी है। मौजूदा सीजन के लिए भारत के चीनी उत्पादन का अनुमान पहले के 343 लाख मीट्रिक टन से घटाकर लगभग 306 लाख मीट्रिक टन कर दिया गया है। यह करीब 11 प्रतिशत यानी 37 लाख मीट्रिक टन की बड़ी गिरावट है।
इस गिरावट के पीछे अल नीनो के कारण हुई अनियमित बारिश, कुछ इलाकों में जलभराव, कीटों के हमले और चीनी की रिकवरी दर में आई कमी जैसे कारण जिम्मेदार हैं। विशेष रूप से महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में मौसम की मार ने पैदावार को बुरी तरह प्रभावित किया है।
लगातार बढ़ रही है चीनी की घरेलू मांग
भारत दुनिया का सबसे बड़ा चीनी उपभोक्ता है। हमारी सालाना खपत लगभग 280 से 290 लाख मीट्रिक टन यानी करीब 23 से 24 लाख मीट्रिक टन प्रतिमाह है। अगस्त से नवंबर के बीच त्योहारों के कारण मांग अपने चरम पर होती है। इसके अलावा बेकरी, डेयरी और बेवरेज जैसी फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री, ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती क्रयशक्ति और होटल तथा खानपान क्षेत्र की ओर से भी लगातार भारी खपत हो रही है।
जब उत्पादन घटकर घरेलू खपत के इतना करीब आ जाए, तो सप्लाई में हल्की सी रुकावट भी कीमतों में बड़ा उछाल ला देती है।
इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम ने चीनी मिलों को कमाई का नया जरिया दिया और किसानों के भुगतान में मदद की।
- फोटो : गांव जंक्शन
इथेनॉल का गणित भी समझना होगा
इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम ने चीनी मिलों को कमाई का नया जरिया दिया और किसानों के भुगतान में मदद की। लेकिन, अब यह बहस का विषय बन गया है। हाल के वर्षों में चीनी उत्पादन का लगभग 8 से 10 प्रतिशत यानी 25 से 30 लाख मीट्रिक टन इथेनॉल बनाने के लिए डायवर्ट किया गया है। इससे बाजार में उपलब्ध चीनी का स्टॉक कम हुआ है। अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती इथेनॉल मिश्रण के लक्ष्यों, चीनी की उपलब्धता, उपभोक्ता कीमतों और किसानों की आय के बीच सही संतुलन बनाने की है।
आयात और निर्यात में संतुलन का सवाल
पहले हम अतिरिक्त उत्पादन के दम पर निर्यात करते थे, जिससे मिलों की नकदी बढ़ती थी। लेकिन, घटता उत्पादन सवाल खड़े करता है कि क्या निर्यात के फैसले ज्यादा आशावादी अनुमानों पर आधारित रहे हैं? स्थिति संभालने के लिए सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात को मंजूरी दे दी है। हालांकि, यह हमारी 280 से 290 लाख मीट्रिक टन की सालाना खपत का मात्र 3 से 4 प्रतिशत है। यह कदम बाजार में फौरी राहत तो दे सकता है, लेकिन स्थाई समाधान नहीं है।
जलवायु परिवर्तन और आगे की राह
गन्ना ऐसी फसल है, जिसे बहुत अधिक पानी की जरूरत होती है। अनियमित बारिश और बढ़ता तापमान इसके लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं। ऐसे में ड्रिप सिंचाई, जलवायु अनुकूल बीजों और मक्का जैसे इथेनॉल के वैकल्पिक स्रोतों को अपनाना समय की मांग है। अक्तूबर से शुरू होने वाला 2026-27 का नया पेराई सीजन बाजार की अगली दिशा तय करेगा।
गन्ने की वास्तविक उपलब्धता, रिकवरी रेट, मानसून और सरकार की नीतियां अहम होंगी। भारत के सामने अब असली चुनौती सिर्फ अधिक चीनी पैदा करने की नहीं है, बल्कि उपभोक्ताओं के लिए सस्ती चीनी, मिलों के मुनाफे, किसानों की आय और इथेनॉल की बढ़ती जरूरतों के बीच सटीक संतुलन साधने की है। आने वाले कुछ महीने तय करेंगे कि यह महंगाई एक अस्थायी दौर है या चीनी बाजार किसी ढांचागत बदलाव की ओर बढ़ चुका है।
(यह स्टोरी मूल रूप से अमर उजाला गांव जंक्शन पत्रिका के सितंबर 2026 अंक में प्रकाशित की गई है)
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।