Home›Gaon Post›Drishtikon›
Van Dhan Vikas Yojana How Maharashtra S 6 6 Lakh Tribal Families Are Turning Forest Produce Into Livlihood
जंगल से बाजार तक : वन धन विकास योजना ने आदिवासी वनोपज को दिलाई राष्ट्रीय पहचान, बढ़ी कमाई
शिरीष खरे, स्वतंत्र पत्रकार और लेखक
Published by: Umashankar Mishra
Updated Thu, 19 Mar 2026 02:07 PM IST
सार
वन धन विकास योजना ने आदिवासी क्षेत्रों में वनोपज संग्रह को संगठित व्यवसाय में बदलकर जनजातीय समुदायों के लिए स्थायी आजीविका सुनिश्चित की है। मूल्य संवर्धन और बाजार लिंकेज के माध्यम से यह पहल पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक अर्थव्यवस्था से जोड़ रही है।
आदिवासी क्षेत्रों में प्रसंस्करण और भंडारण सुविधाओं को सुदृढ़ करने की पहल सकारात्मक बदलाव ला रही है।
- फोटो : गांव जंक्शन
महाराष्ट्र के गढ़चिरोली, चंद्रपुर और यवतमाल जैसे आदिवासी अंचलों के वन क्षेत्र कोरकू, गोंड और कातकरी समुदायों के लिए केवल संसाधन का स्रोत ही नहीं, बल्कि उनकी आर्थिक और सामाजिक पहचान का आधार भी रहे हैं। जंगलों में सागौन, महुआ, तेंदूपत्ता और औषधीय जड़ों व पत्तों की पैदावार इनके जीवन का मूल आधार रही है, लेकिन असंगठित बाजार और मूल्य संवर्धन के अभाव में आय अस्थिर बनी हुई थी।
केंद्र सरकार ने 14 अप्रैल, 2018 को प्रधानमंत्री वन धन विकास योजना शुरू की। इस योजना का मुख्य उद्देश्य आदिवासी समुदायों को जंगल पर निर्भरता से निकालकर स्थायी, संगठित और बाजार उन्मुख आजीविका के अवसर प्रदान करना था। महाराष्ट्र के आदिवासी विकास विभाग ने इसे राज्य के वन आधारित रोजगार विकल्पों को मजबूत करने का एक प्रमुख कदम माना।
इस योजना के तहत वन धन विकास केंद्र स्थापित किए गए हैं, जहां स्थानीय स्वयं सहायता समूह के सदस्य मिलकर महुआ, तेंदूपत्ता, औषधीय पौधों के बीज और उनकी जड़ जैसी वनोपज का संग्रह, मूल्य संवर्धन और विपणन करते हैं।
लाखों परिवारों को मिला फायदा
महाराष्ट्र में वन धन विकास केंद्रों के माध्यम से लगभग 6.6 लाख परिवारों तक रोजगार के अवसरों और प्रशिक्षण की पहुंच सुलभ हुई है। 25 हजार परिवार सीधे लाभान्वित हुए हैं। आदिवासी विकास विभाग के मुताबिक, वन धन योजना ने आदिवासी समुदाय के लिए स्थायी रोजगार और आय सृजन का नया मॉडल प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही, योजना ने आदिवासी समुदाय के पारंपरिक ज्ञान को बाजार अनुकूल कौशल में बदलने का अवसर दिया है।
महाराष्ट्र के वन विभाग का मानना है कि राज्य में इस योजना से वन संसाधनों का संगठित और स्थायी उपयोग हो रहा है। अवैध संग्रह और असंगठित व्यापार से होने वाला नुकसान घटा है। समुदाय उत्पादन और विपणन को बेहतर नियंत्रित कर रहा है। स्थानीय अनुभव दर्शाते हैं कि वन धन केंद्रों से प्रशिक्षण प्राप्त कुछ समूहों की औसत आय पहले की तुलना में दोगुनी हो गई है। चंद्रपुर के कोरकू समूह ने तेंदूपत्ता के उत्पादन और पैकिंग में सुधार कर राष्ट्रीय स्तर पर सौदे किए। इसके अलावा, योजना ने समुदाय की संगठनात्मक क्षमता, सहयोग और नेतृत्व कौशल को भी मजबूत किया है।
एक केंद्र से जुड़े 15 स्वयं सहायता समूह
वन धन विकास योजना की डिजाइन इसकी सफलता का बड़ा आधार है। प्रत्येक वन धन केंद्र में लगभग 15 स्वयं सहायता समूह जुड़े हैं, जिनके माध्यम से 300-350 लाभार्थियों तक सीधे पहुंच बनाई जाती है। इन केंद्रों में उत्पाद संग्रह तक सीमित न रहकर प्राथमिक प्रसंस्करण, पैकिंग, ब्रांडिंग और विपणन का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इससे आदिवासी पारंपरिक तरीके से वनोपज संग्रह के साथ ही उत्पादों को बाजार अनुरूप बनाने की प्रक्रिया में शामिल हो जाते हैं।
योजना का असर आजीविका के पैटर्न में स्पष्ट दिखाई देता है, स्थानीय समुदायों की आय में सुधार हुआ है, रोजगार स्थिर करने के प्रयासों को बल मिला है। कोशिश है कि युवाओं के पलायन में कमी आए। अधिकारियों के मुताबिक, यह पहल आदिवासी समुदाय को जंगल के संसाधनों पर कानूनी अधिकार और संगठित उद्यम का अवसर प्रदान करने की दिशा में पहला ठोस कदम है।
व्यावहारिक चुनौतियां और समाधान
कई व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं, जिन्हें राज्य और केंद्र स्तर पर पहचान कर समाधान खोजे जा रहे हैं। सबसे प्रमुख चुनौती बाजार पहुंच सुनिश्चित करने और गुणवत्ता बनाए रखने की है। आदिवासी समुदाय भले ही प्राथमिक स्तर पर उत्पाद तैयार कर रहे हों, लेकिन बड़े बाजार, निर्यात या उच्च गुणवत्ता वाली ब्रांडिंग तक उनकी पहुंच अभी भी सीमित है। स्थानीय विपणन नेटवर्क को मजबूत करना, ब्रांड प्रमाणीकरण और विपणन चैनलों तक समर्थन देना आवश्यक है ताकि उत्पादन अधिक मूल्य लायक हो सके।
दूसरी प्रमुख चुनौती अवसंरचना और बुनियादी सुविधाओं की है। कई आदिवासी इलाकों में संग्रहण, भंडारण और प्राथमिक प्रसंस्करण सुविधाओं का अभाव है। इससे उत्पाद समय पर संसाधित नहीं हो पाते और उनकी गुणवत्ता पर असर पड़ता है। इन चुनौतियों के संभावित समाधान की दिशा में सरकार और पक्षकार सक्रिय हैं।
वन विभाग और आदिवासी विकास विभाग, ग्रामीण आजीविका मिशन तथा महिला स्वयं सहायता समूहों के साथ मिलकर व्यापार लिंक एजेंसियों और बाजार विशेषज्ञों के सहयोग से समुदाय को समर्थन प्रदान कर रहे हैं। इससे ब्रांडिंग, गुणवत्ता नियंत्रण और तकनीकी सहायता जैसे तत्वों के प्रभावी होने की संभावनाएं हैं।
जंगल, जल और महिलाओं की भागीदारी
महाराष्ट्र के गढ़चिरोली, चंद्रपुर, यवतमाल और ठाणे के घने जंगल - जिनमें सागौन, महुआ, तेंदूपत्ता और औषधीय पौधों की बहुलता है, वन धन विकास योजना के लिए आदर्श संसाधन बने हुए हैं। मानसून और गर्मी के मौसम में उत्पादों के संग्रह और प्रसंस्करण की रणनीति अब योजना के प्रशिक्षण केंद्रों के माध्यम से व्यवस्थित हुई है, जिससे आय में स्थिरता आ रही है।
जल संग्रहण की पुरातन परंपराओं को भी इस योजना से जोड़ा जा रहा है। छोटे तालाब और कुएं आज यहां न केवल घरेलू जरूरतों के लिए उपयोग हो रहे हैं, बल्कि महुआ और औषधीय उत्पादों की तैयारी में भी इनका उपयोग किया जाता है। महिला सदस्य इस पूरी प्रक्रिया में सक्रिय हैं; वे न केवल संग्रह और प्रसंस्करण करती हैं, बल्कि पैकिंग, ब्रांडिंग और विपणन में भी नेतृत्व कर रही हैं। कई महिला समूह तो खुद प्रशिक्षण प्राप्त कर अन्य आदिवासी समूहों को मार्गदर्शन भी देते हैं।
वन आधारित छोटे स्टार्टअप
वन धन विकास योजना के आगे के प्रभाव और संभावनाएं और भी व्यापक हैं। प्रशिक्षण और बाजार नेटवर्क के विस्तार से अधिक युवा अब स्थानीय उद्यमिता में शामिल हो सकते हैं। छोटे पैमाने पर वन आधारित स्टार्टअप, जैसे - हर्बल उत्पाद, जैम, तेल एवं हस्तशिल्प, राज्य और राष्ट्रीय बाजार में पहुंच सकते हैं, जिससे आर्थिक अवसरों और आय में वृद्धि होगी।
टिकाऊ मॉडल बनाने पर फोकस
वन संसाधनों के सतत उपयोग और संरक्षण की संभावनाएं भी मजबूत हुई हैं। जंगलों के संरक्षण के साथ ही पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक उत्पादन तकनीक से जोड़कर टिकाऊ मॉडल बनाया जा रहा है। भविष्य में डिजिटल विपणन, ई-कॉमर्स और ग्रामीण रोजगार नेटवर्क के समन्वय से यह मॉडल और अधिक प्रभावशाली बन सकता है। वन धन विकास योजना की सबसे बड़ी संभावना यही है कि यह आदिवासी अंचलों में स्थायी रोजगार, सामाजिक सशक्तिकरण और पर्यावरणीय संरक्षण को जोड़कर एक बहुआयामी विकास मॉडल पेश कर सकती है।
योजना को सुदृढ़ करने के लिए राज्य सरकार ने इसे शबरी महामंडल और राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से जोड़ा है। ट्राइबल रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट द्वारा उत्पादों की जीआई टैगिंग और ब्रांडिंग की जा रही है ताकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई जा सके। साथ ही, अमेजॉन व फ्लिपकार्ट जैसे प्लेटफॉर्म्स के जरिये इन उत्पादों को वैश्विक बाजार से जोड़ने की रणनीति तैयार की गई है।
यह पहल न केवल बिचौलियों को खत्म करेगी, बल्कि एमएसपी के माध्यम से लघु वनोपज का विपणन सुनिश्चित करके अंतिम छोर पर खड़े आदिवासी समुदाय के लोगों के बैंक खातों तक सीधा आर्थिक लाभ पहुंचाकर 'वन धन' के संकल्प को यथार्थ बना रही है।
(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के मार्च 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।