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सफेद सोना को खरा बनाने का समय: कपास खरीद प्रणाली में किसानों का भरोसा जगाने के लिए बदलाव जरूरी

शिरीष खरे, स्वतंत्र पत्रकार और लेखक Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 12 Jan 2026 01:55 PM IST
सार

विदर्भ और मराठवाड़ा की मिट्टी, श्रम और जलवायु तीनों ने मिलकर कपास को सफेद सोने का दर्जा दिया है। लेकिन, यह सोना तभी खरा बन सकता है, जब इसकी खरीद-प्रणाली किसानों में भरोसा जगाए, डिजिटल सुविधाएं उपयोगी सिद्ध हों और नीतिगत व्यवस्था जमीन पर काम करे।

कपास सिर्फ फसल नहीं, बल्कि पूरी उद्योग-शृंखला है - कपास से धागा, धागे से कपड़ा, कपड़े से निर्यात।
कपास सिर्फ फसल नहीं, बल्कि पूरी उद्योग-शृंखला है - कपास से धागा, धागे से कपड़ा, कपड़े से निर्यात। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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कपास की खरीद से जुड़ी समस्याओं को लेकर हाल के महीनों के दौरान कई राज्यों के किसानों में असंतोष देखने को मिला है। मद्रास हाईकोर्ट की फटकार ने यह स्पष्ट किया है कि व्यवस्था में खामियां वास्तविक हैं। लेकिन, अब आवश्यकता शिकायतों को दोहराने की नहीं, बल्कि यह सुझाव देने की है कि महाराष्ट्र जैसे बड़े कपास उत्पादक राज्य में क्या बदलाव तुरंत और प्रभावी रूप से किए जा सकते हैं। इसके लिए यह पड़ताल आवश्यक है कि सफेद सोना कहे जाने वाले कपास की मूल्य-शृंखला को पारदर्शी, विश्वसनीय और किसान-केंद्रित बनाने के व्यावहारिक रास्ते क्या हो सकते हैं, जिससे किसानों को फायदा पहुंचाया जा सके।

कपास खरीदी में दिक्कतें क्यों?
कपास की खरीद के लिए केंद्र कहां और कब खुलेंगे; इस पर स्पष्टता नहीं होने से किसानों में असंतोष फैलता है। दूसरा, कृषि क्षेत्र में डिजिटल समाधान तभी सफल हो सकते हैं, जब किसान उसे सहज रूप से उपयोग करना जानते हों। सीसीआई (भारतीय कपास निगम) के 'किसान एप' का मूल उद्देश्य पारदर्शिता बनाए रखना है। लेकिन, कई ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क, भाषा और तकनीकी सीमाएं इसकी उपयोगिता को सीमित कर रही हैं।

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तीसरा, कपास की कीमत गुणवत्ता पर निर्भर करती है। इसलिए, नमी, गंदगी, फाइबर की लंबाई आदि की माप अनुमान या दृष्टि-आधारित होने के कारण खरीदी के समय विवाद बढ़ने की खबरें सामने आती रहती हैं। चौथा, कपास की खरीद में धीमी गति से तनाव पैदा होता है। इससे किसानों का ट्रॉली किराया बढ़ता है, उनके सामने बारिश का जोखिम रहता है, और किसान कई दिन मंडी में उलझा रहता है।

पांचवां, कपास की बिक्री के बाद तत्काल भुगतान मिलना किसान की नकदी जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण है। हम जानते हैं कि किसानों के लिए बीज खरीदने, मजदूरी चुकाने और घरेलू खर्च के लिए यही मुख्य स्रोत है। छठवां, महाराष्ट्र में कपास का दायरा इतना बड़ा है कि सीसीआई अकेले इस काम को सुचारु रूप से नहीं चला सकती। इसके लिए राज्य सरकार की सहभागिता अनिवार्य है।

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कहां से शुरू होने चाहिए सुधार
राज्यों और सीसीआई को चाहिए कि 30 से 45 दिन पहले खरीद केंद्रों की सूची, तिथि और क्षमता घोषित कर दी जाए। इसके लिए जिलों में कपास खरीद संचालन समिति बनाए जाने की मांग हो रही है, जिसमें सीसीआई, कृषि विभाग और किसान प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं। वहीं, किसानों का कहना है कि खरीद रोकने या सीमित करने का निर्णय लिखित कारणों के साथ सार्वजनिक किया जाना चाहिए। राज्य स्तर पर कपास की खरीद से जुड़े ट्रैकर (वेबसाइट / डैशबोर्ड) विकसित होने चाहिए, जहां प्रतिदिन केंद्रों की खरीद स्थिति अपडेट होती रहे। इस तरह के सुझावों को लागू करने से किसान अपनी फसल कटाई, परिवहन और बिक्री की योजना आसानी से बना पाएंगे, अनिश्चितता कम होगी और भीड़-भाड़ भी नियंत्रित रहेगी।

किसानों के अनुकूल हो डिजिटल प्रक्रिया 
यह जरूरी है कि किसान एप का मराठी या अन्य भाषाओं में प्रभावी इंटरफेस निर्माण किया जाए। वहीं, एप के भीतर ऑफलाइन मोड जोड़ना होगा, जो नेटवर्क आने पर डाटा को सिंक कर दे। इसी तरह, खरीद केंद्रों पर डिजिटल सहायक डेस्क अनिवार्य होने चाहए, जो पंजीकरण और स्लॉट बुकिंग में मदद करें। जिन क्षेत्रों में नेटवर्क कमजोर है, वहां मोबाइल आईटी वैन चलाने की जरूरत है, जैसे आधार नामांकन में होती हैं। इसके अलावा, स्लॉट प्रणाली को लचीला बनाया जाना चाहिए। किसान की स्थिति के आधार पर मौके पर भी टोकन जारी किए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। डिजिटल समाधान किसान के लिए सरल और सहज होंगे, तभी ये पारदर्शिता और तेजी सुनिश्चित कर पाएंगे।

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गुणवत्ता परीक्षण में पारदर्शिता
कपास की कीमत इसकी गुणवत्ता पर निर्भर करती है। गुणवत्ता के निर्धारण से जुड़े विवादों से बचने के लिए जांच प्रक्रिया को वस्तुनिष्ठ और मशीनी बनाने की जरूरत है। सभी खरीद केंद्रों पर हाई वॉल्यूम इंस्ट्रूमेंट, जैसे - मशीन-आधारित परीक्षण उपकरण लगाने चाहिए। किसान को लिखित ग्रेडिंग शीट दी जाए, जिसमें उसके नमूने की सभी मापें दर्ज हों। साथ ही, मशीन परीक्षण का वीडियो प्रदर्शन केंद्र पर लगाया जाए ताकि किसान प्रक्रिया को समझ सकें। गुणवत्ता जांच में पारदर्शिता आएगी तो विवाद घटेंगे और किसान को एमएसपी से कम दाम पर निजी व्यापारियों को बेचने की मजबूरी भी कम होगी।

तेज हो खरीदी और भुगतान
केंद्रों की दैनिक खरीद क्षमता बढ़े, इसके लिए बड़े जिलों में अस्थायी उप-केंद्र खोले जाने चाहिए। कई किसान मानते हैं कि 'पहले आओ, पहले पाओ’ प्रणाली के बजाय टोकन-आधारित स्लॉट दिए जाएं, ताकि किसान बिना लाइन लगाए अपनी बारी का समय जान सकें। वहीं, भुगतान में देरी समाप्त करने की नीति तैयार की जानी चाहिए। किसानों की मांग है कि भुगतान प्रक्रिया को 24-48 घंटे के भीतर अनिवार्य किया जाए। भुगतान तेजी से मिलेगा तो एमएसपी की विश्वसनीयता और मजबूत होगी।

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कृषि जानकारों की राय यह भी है कि इसके लिए ‘महाराष्ट्र राज्य कपास टास्क फोर्स’ बने, जिसमें सीसीआई, कृषि विभाग, जिला प्रशासन, कृषि विश्वविद्यालय, किसान प्रतिनिधि और मार्केट कमेटियां शामिल होनी चाहिए। यह टास्क फोर्स हर 15 दिन में समीक्षा करेगी और रिपोर्ट सार्वजनिक करेगी। जिलों में शिकायत निवारण के लिए 72 घंटे की समय-सीमा तय होनी चाहिए। 

कपास मूल्यवर्धन क्लस्टर
कपास सिर्फ फसल नहीं, बल्कि पूरी उद्योग-शृंखला है - कपास से धागा, धागे से कपड़ा, कपड़े से निर्यात। यदि दीर्घकालीन योजना बनाई जाए तो महाराष्ट्र इस पूरी शृंखला का केंद्र बन सकता है। इसके लिए हो यह सकता है कि विदर्भ और मराठवाड़ा में कपास मूल्यवर्धन क्लस्टर विकसित किए जाएं। जिनिंग और प्रेसिंग इकाइयों को आधुनिक मशीनों के लिए ब्याज सहायता मिले। इसके बाद, टेक्सटाइल पार्कों से जोड़कर कपास उत्पादों की स्थानीय प्रोसेसिंग बढ़ाई जाए। इससे किसानों को बेहतर कीमत और रोजगार दोनों मिलेंगे। वहीं, जलवायु परिवर्तन को देखते हुए सूखा-रोधी कपास किस्मों का विकास तेज किए जाने की जरूरत है।

जोखिम प्रबंधन क्यों जरुरी?
महाराष्ट्र में कपास की खेती अब केवल बाजार या खरीद-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि तेजी से बदलती जलवायु इसकी सबसे गंभीर चुनौती बन चुकी है। पिछले दस वर्षों में विदर्भ और मराठवाड़ा में अनियमित बरसात, लंबे शुष्क अंतराल, अचानक अतिवृष्टि, गुलाबी सुंडी जैसे कीटों का प्रकोप और तापमान में तीव्र उतार-चढ़ाव देखा गया है। ये कुछ ऐसे कारक हैं, जो मिलकर कपास की पैदावार और गुणवत्ता दोनों को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में केवल सीसीआई या एमएसपी पर निर्भर रहना किसान के लिए दीर्घकालीन समाधान नहीं है। खरीद-प्रणाली में सुधार जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी जोखिम का प्रबंधन भी है। 

कपास एक मौसम-संवेदनशील फसल है। महाराष्ट्र के प्रत्येक जिले में जोखिम का स्तर अलग होता है। इसलिए, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और भारतीय मौसम विभाग को मिलकर एक कपास जलवायु जोखिम एटलस बनाना चाहिए, जो किसान को बताए कि किस इलाके में कौन-सी किस्में स्थिर हैं, किस माह में कीट का जोखिम अधिक रहता है, देर से बुआई का क्या असह होगा, या फिर कौन-सा क्षेत्र उच्च जोखिम वाली पट्टी है। इस डाटा को सीसीआई और कृषि विभाग दोनों खरीद-योजना में शामिल कर सकते हैं, ताकि जोखिम वाले क्षेत्रों में विशेष खरीद सहायता या प्रोत्साहन दिया जा सके।

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महाराष्ट्र देश का सबसे बड़ा कपास उत्पादक राज्य है, जहां लगभग 36 से 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कपास के अंतर्गत आता है। विदर्भ में विशेषकर यवतमाल, अकोला और अमरावती, इसी तरह मराठवाड़ा में नांदेड़, हिंगोली, परभणी कपास की मुख्य पट्टी हैं। कपास खेती यहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है, लेकिन पिछले एक दशक में इसकी स्थिति लगातार दबाव में रही है।

अनियमित मानसून, गुलाबी सुंडी का प्रकोप, कृषि निवेश की बढ़ती लागत, मजदूरी का महंगा होना और बाजार कीमतों में अस्थिरता ने कपास को जोखिम वाली फसल बना दिया है। इसके बावजूद, कपास महाराष्ट्र के लिए आज भी 'सफेद सोना' है, क्योंकि यही फसल लाखों परिवारों को आजीविका देती है और राज्य के कपड़ा उद्योग को कच्चा माल उपलब्ध कराती है। चुनौती यही है कि कपास के उत्पादन, खरीद और बाजार के स्तरों पर और सुधार किए जाएं, ताकि यह सफेद सोना किसान के लिए असली सोने जैसा लाभदायी साबित हो सके।

(यह लेख मूल रूप से अमर उजाला गांव जंक्शन पत्रिका के दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
 
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