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Jhalmuri History From Streets Of Bengal It Reached World Workers During World War Ii Gave It Recognition
झालमुड़ी की जायकेदार विरासत: बंगाल की गलियों से दुनिया तक पहुंच, द्वितीय विश्व युद्ध में मजदूरों ने दिलाई पहचान
मोहम्मद आमिल, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Mon, 20 Apr 2026 01:22 PM IST
सार
चुनावी सरगर्मियों के बीच पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम में एक अलग तस्वीर देखने को मिली, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी व्यस्त चुनावी रैलियों के बीच पारंपरिक स्ट्रीट फूड झालमुड़ी का स्वाद लेने पहुंच गए। सादगी और स्थानीय स्वाद से जुड़ी इस झलक ने लोगों का ध्यान खींचा है। आइए जानते हैं, आखिर क्या है झालमुड़ी का इतिहास और कैसे बना यह देशभर में पसंद किया जाने वाला स्नैक।
भारत अपने विविधता भरे खानपान और परंपराओं के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। यहां हर राज्य में कुछ न कुछ खास स्वाद मिलता है, जो वहां की पहचान है। इनमें से एक नाम है झालमुड़ी का, जो पश्चिम बंगाल का एक बेहद लोकप्रिय स्ट्रीट फूड है।
हर गली-नुक्कड़ पर - हलचल भरे बाजारों से लेकर शांत नदी-किनारों तक - मिलने वाला यह जायकेदार व्यंजन अब बंगाली पहचान का एक अहम हिस्सा बन चुका है। सिर्फ नाश्ते से कहीं बढ़कर, झालमुड़ी इस क्षेत्र की उस खानपान की विरासत की निशानी है, जो अपने तीखे और चटपटे जायकों के लिए मशहूर है।
झालमुड़ी अपने तीखे और चटपटे स्वाद से हर किसी को आकर्षित करती है। कागज के कोन में परोसा जाने वाला यह हल्का-फुल्का नाश्ता सिर्फ भूख ही नहीं मिटाता, बल्कि अपने हर कौर से खाने वाले को लाजवाब स्वाद का अनुभव कराता है। 19 अप्रैल को बंगाल के दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी झालमुड़ी का स्वाद चखकर इस स्थानीय व्यंजन से जुड़ाव दिखाया।
क्या है झालमुड़ी?
झालमुड़ी दो शब्दों से मिलकर बना है, ‘झाल’ यानी मसालेदार और ‘मुरी’ यानी फूला हुआ चावल यानी मुरमुरे। इन दोनों के मेल से बना यह व्यंजन स्वाद और सुगंध का अनोखा संगम माना जाता है। सरसों के तेल की तेज महक, कटी प्याज, हरी मिर्च, चना, मसाले और नींबू का रस का मिश्रण झालमुड़ी को अनूठा स्वाद देता है। यह हल्का, स्वादिष्ट और झटपट तैयार होने वाला स्नैक है, जो खासतौर पर शाम के समय काफी पसंद किया जाता है।
बिहार नहीं, बंगाल है इसकी असली पहचान
अक्सर लोग झालमुड़ी को बिहार का स्ट्रीट फ़ूड समझ लेते हैं, लेकिन इसकी असली जड़ें पश्चिम बंगाल में हैं। कोलकाता की गलियों में आपको आज भी झालमुड़ी बेचने वाले आसानी से मिल जाएंगे, जहां यह लोगों के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है।
नाम बदला, स्वाद वही रहा
दिलचस्प बात यह है कि जगह बदलने के साथ इसका नाम बदल जाता है, लेकिन इसका स्वाद वही रहता है। कर्नाटक में इसे ‘झुरीमुरी’, मुंबई में ‘भेलपुरी’ और उत्तर प्रदेश में ‘लइया-चना’ कहा जाता है। हर क्षेत्र अपने अंदाज में इसे बनाया जाता है, लेकिन इसकी आत्मा वही रहती है- सस्ता, स्वादिष्ट और तुरंत तैयार होने वाला स्नैक।
स्ट्रीट फूड का सितारा झालमुड़ी
खानपान पर लिखने वाले कुछ लेखकों और इतिहासकारों की मानें तो झालमुड़ी को असली पहचान द्वितीय विश्व युद्ध के आसपास मिली। उस समय बिहार और यूपी से आए मजदूरों ने इसे बंगाल की सड़कों पर बेचना शुरू किया। वे इसे पुराने सिगरेट के टिन के डिब्बों में तैयार करते थे, जो उस दौर की एक खास पहचान बन गई थी। हालांकि, बंगाल में यह पहले से मौजूद था, लेकिन इन लोगों ने इसे लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई।
सिर्फ स्नैक नहीं, एक सांस्कृतिक पहचान
आज झालमुड़ी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेशों में भी अपनी पहचान बना चुका है। झालमुड़ी केवल एक हल्का-फुल्का नाश्ता नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक है। यह बताता है कि कैसे साधारण सामग्री से भी लाजवाब स्वाद तैयार किया जा सकता है और कैसे एक छोटे से ठेले से शुरू हुआ सफर दुनिया तक पहुंच सकता है।
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