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पहली किरण का पता, अरुणाचल का डोंग : जहां सबसे पहले होती है भारत की सुबह, जानिए गांव का अनोखा रहस्य

गांव जंक्शन डेस्क, दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sun, 21 Jun 2026 06:55 PM IST
सार

अरुणाचल प्रदेश के डोंग गांव में पहुंचकर लगता है मानो प्रकृति ने अपने सबसे सुंदर रंग बड़े जतन से संभालकर रख छोड़े हों। न भीड़ का शोर, न शहरों की भागदौड़ - सिर्फ पहाड़, नदियां, हवा और उगते सूरज का अद्भुत सौंदर्य। 
 

पहली किरण का पता अरुणाचल का डोंग
पहली किरण का पता अरुणाचल का डोंग - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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उगते सूरज की पहली किरणें जब धरती को छूती हैं, तो मानो प्रकृति स्वयं नया जीवन रच रही होती है। आसमान पर बिखरती लालिमा, पहाड़ों पर फैलती सुनहरी आभा और पक्षियों का मधुर कलरव मन को ऐसी ताजगी से भर देता है, जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं। मगर, कभी आपने कभी सोचा है कि भारत में उगता हुआ सूरज सबसे पहले कहां दिखाई देता है? इस प्रश्न का उत्तर है - डोंग गांव, जो अरुणाचल प्रदेश के अंजॉ जिले में स्थित है। 

भारत की पहली सुबह की पहचान
लंबे समय तक माना जाता था कि देश में सबसे पहले सूर्योदय अंडमान-निकोबार के कटचल द्वीप पर होता है। वर्ष 1999 में हुए अध्ययनों के बाद यह तथ्य सामने आया कि अरुणाचल प्रदेश के डोंग क्षेत्र में सूर्य की पहली किरणें सबसे पहले पड़ती हैं। इसके बाद, यह छोटा-सा सीमांत गांव अचानक प्रकृति प्रेमियों और यात्रियों के आकर्षण का केंद्र बन गया। 

लोहित व सती नदियों का संगम
डोंग गांव समुद्र तल से लगभग 1,240 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान ब्रह्मपुत्र की सहायक लोहित और सती नदियों के संगम के निकट बसा है। भारत, चीन और म्यांमार की सीमाओं के पास स्थित होने के कारण इसका सामरिक महत्व भी काफी अधिक है। सर्दियों के दिनों में यहां कई बार सुबह साढ़े चार बजे ही सूर्योदय दिखाई देने लगता है। 

मंजिल सुंदर, रास्ता कठिन
डोंग की यात्रा आसान नहीं है और शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबी भी है। निकटतम प्रमुख नगर तेजू है। वहां से वालॉन्ग तक लंबा सफर दुर्गम पर्वतीय मार्गों से होकर गुजरता है। इसके बाद, डोंग पहुंचने के लिए पैदल यात्रा करनी पड़ती है। आज भी सूर्योदय देखने के लिए यात्रियों को लगभग आठ किलोमीटर का पर्वतीय मार्ग तय करना पड़ता है। रास्ते में घने वन, पहाड़ी ढलान, कलकल बहती जलधाराएं और बादलों से ढकी चोटियां सफर को रोमांचक बना देती हैं। कठिन चढ़ाई के बावजूद हर मोड़ पर खुलता प्राकृतिक दृश्य थकान को आनंद में बदल देता है।

प्रकृति प्रेमियों की पसंद 
डोंग उन लोगों के लिए भी खास है, जो प्रकृति के करीब समय बिताना चाहते हैं। डोंग क्षेत्र के आसपास एक प्राकृतिक गर्म जलस्रोत भी है, जिसे स्थानीय लोग विशेष महत्व देते हैं। लोहित नदी के किनारे स्थित यह जलस्रोत भूमिगत भू-तापीय गतिविधियों के कारण गर्म रहता है। यद्यपि यह स्नान के लिए बहुत बड़ा नहीं है, मगर इसके स्वच्छ और पारदर्शी जल में पैर डुबोकर बैठना भी एक सुखद अनुभव होता है। रास्ते में स्थित वालॉन्ग युद्ध स्मारक 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस की याद दिलाता है। नामती मैदान, किबिथू गांव और आसपास के पर्वतीय दृश्य इस यात्रा को और भी अर्थपूर्ण बना देते हैं। 

यात्रा से पहले कर लें पूरी तैयारी
डोंग की यात्रा के लिए अप्रैल से जुलाई के बीच का समय उपयुक्त माना जाता है। इस दौरान प्राकृतिक सौंदर्य अधिक होता है। सर्दियों में यहां अत्यधिक ठंड पड़ती है, हालांकि सूर्योदय देखने के लिए यही मौसम लोकप्रिय माना जाता है। डोंग सीमावर्ती व दूरस्थ क्षेत्र में स्थित है, इसलिए यहां सुविधाएं सीमित हैं। यात्रा पर निकलने से पहले भोजन, ईंधन और आवश्यक सामान की पर्याप्त व्यवस्था कर लेनी चाहिए। ठहरने के लिए हवाई और वालॉन्ग बेहतर विकल्प माने जाते हैं। इस क्षेत्र में प्रवेश के लिए भारतीय नागरिकों को इनर लाइन परमिट और विदेशी यात्रियों को संरक्षित क्षेत्र अनुमति पत्र लेना अनिवार्य है।  

छोटा गांव, बड़ी पहचान
एक समय डोंग में अपेक्षाकृत अधिक आबादी रहती थी, लेकिन पानी की कमी के कारण धीरे-धीरे लोगों का पलायन होता गया। आज यहां बहुत कम लोग निवास करते हैं। पुराने सीढ़ीदार खेत, बिखरे घर और शांत वातावरण यहां के अतीत की कहानी कहते हैं। लेकिन, यही नीरवता डोंग की सबसे बड़ी ताकत भी है। यहां न शहरी शोर है, न भीड़भाड़। दूर-दूर तक फैली हरियाली, पहाड़ों के बीच बहती नदियां और निर्मल वातावरण मन को एक अलग ही शांति का अनुभव कराते हैं। 
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