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Poultry: पोल्ट्री पर लागत का दबाव बढ़ा, जीएम मक्का आयात की मंजूरी मांगने लगा उद्योग

गांव जंक्शन डेस्क, नोएडा Published by: Himanshu Mishra Updated Thu, 27 Nov 2025 10:57 AM IST
सार

IPEMA ने यह भी कहा कि पोल्ट्री को ‘एनिमल हसबेंड्री’ के तहत देखा जाता है, जिससे इस सेक्टर की समस्याएं बार-बार अनदेखी हो जाती हैं। उद्योग ने मांग की कि पोल्ट्री के लिए अलग विभाग बनाया जाए, ताकि सेक्टर की जरूरतों के मुताबिक नीतियां तैयार की जा सकें।

पोल्ट्री फार्मिंग
पोल्ट्री फार्मिंग - फोटो : AI
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विस्तार
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देश का 3 लाख करोड़ रुपये का पोल्ट्री उद्योग इन दिनों कच्चे माल की बढ़ती कीमतों से दबाव में है। मक्का के लिए एथेनॉल उद्योग से बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने पोल्ट्री सेक्टर की लागत बढ़ा दी है। इसी वजह से उद्योग संगठनों ने केंद्र सरकार से जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड) मक्का आयात की अनुमति देने की मांग की है, ताकि बाजार में सप्लाई बढ़ सके और कीमतों में स्थिरता लौटे।

मक्का को लेकर एथेनॉल उद्योग से कड़ी प्रतिस्पर्धा
इंडियन पोल्ट्री इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (IPEMA) के अध्यक्ष उदय सिंह बायस ने बताया कि देश में हर साल करीब 420 लाख टन मक्का का उत्पादन होता है। इसमें से—
  • एथेनॉल उद्योग को 120–150 लाख टन की आवश्यकता होती है
  • पोल्ट्री उद्योग करीब 250 लाख टन मक्का उपयोग करता है
उन्होंने कहा कि बढ़ती मांग के कारण कीमतें बहुत तेजी से बढ़ी हैं, जिससे उत्पादन लागत में बड़ा इजाफा हुआ है।

उत्पादन लागत अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा कम कर रही
हैदराबाद में आयोजित 17वें पोल्ट्री इंडिया एक्सपो 2025 के दौरान बायस ने कहा कि मक्का और सोया जैसे जरूरी कच्चे माल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्राजील और थाईलैंड जैसे देशों की तुलना में भारत को कमज़ोर स्थिति में ला रही हैं। उन्होंने कहा, “हमारा उद्योग महंगा होता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मार्केट में हमें प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए सरकार को जीएम मक्का आयात पर सकारात्मक निर्णय लेना चाहिए।”

60 लाख लोगों को रोजगार देने वाला क्षेत्र
उद्योग का कहना है कि पोल्ट्री सेक्टर देश में 60 लाख लोगों को रोजगार देता है और प्रोटीन का सबसे सस्ता स्रोत उपलब्ध कराता है। इसके बावजूद कई बार किसान अपनी लागत भी नहीं निकाल पाते। बायस ने कहा कि किसान साल के 52 हफ्तों में से सिर्फ 22 हफ्तों में ही पर्याप्त कमाई कर पाते हैं। उन्होंने मांग की कि विभिन्न मंत्रालयों की नीतियों में सामंजस्य बनाया जाए ताकि पोल्ट्री क्षेत्र आर्थिक रूप से टिकाऊ रह सके।

एक्सपोर्ट को भी पड़ रहा है नुकसान
उद्योग प्रतिनिधियों ने कहा कि वर्तमान में भारत से टेबल एग्स की अधिकांश निर्यात Middle East को होते हैं। इसके अलावा—
  • जापान और यूरोपीय संघ को एग पाउडर
  • और कई देशों को रेडी-टु-ईट / रेडी-टु-कुक चिकन उत्पाद भेजे जाते हैं

लेकिन उत्पादन लागत अधिक होने से भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी नहीं बन पा रहा है। इसलिए उद्योग ने सरकार से विदेशों में रोड शो जैसी एक्सपोर्ट प्रमोशन गतिविधियों के लिए सहायता देने की मांग की है।

पोल्ट्री को ‘उद्योग’ का दर्जा देने की मांग
IPEMA ने यह भी कहा कि पोल्ट्री को ‘एनिमल हसबेंड्री’ के तहत देखा जाता है, जिससे इस सेक्टर की समस्याएं बार-बार अनदेखी हो जाती हैं। उद्योग ने मांग की कि पोल्ट्री के लिए अलग विभाग बनाया जाए, ताकि सेक्टर की जरूरतों के मुताबिक नीतियां तैयार की जा सकें।
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