Home›Pashudhan›
Bihar S Doctor Didis Transform Rural Economy 8 992 Pashu Sakhis Leading Animal Healthcare And Women Empower
बिहार में 'डॉक्टर दीदी' का कमाल: 8,992 पशु सखियां संवार रहीं पशुधन की सेहत और राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था
गांव जंक्शन डेस्क, पटना
Published by: Umashankar Mishra
Updated Tue, 27 Oct 2026 08:56 PM IST
सार
बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में 8,992 प्रशिक्षित पशु सखियां (जीविका दीदियां) पशुधन के संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में गेम-चेंजर साबित हो रही हैं। 'डॉक्टर दीदी' के रूप में लोकप्रिय ये दीदियां पशुओं के प्राथमिक उपचार, टीकाकरण और पोषण के प्रति जागरूकता फैला रही हैं, जिससे पशुओं की मृत्यु दर में भारी कमी आई है। गया जिला 540 पशु सखियों के साथ राज्य में शीर्ष पर है।
पशु सखियों की तैनाती में गया जिला सबसे आगे है, जहाँ सर्वाधिक 540 पशु सखियां अपनी सेवाएं दे रही हैं।
- फोटो : AI Image (सांकेतिक तस्वीर)
बिहार के ग्रामीण अंचलों में पशुपालकों की तकदीर और पशुधन की सेहत सुधारने में 'डॉक्टर दीदी' बड़ी भूमिका निभा रही हैं। राज्य में इस समय 8,992 प्रशिक्षित पशु सखियां कार्यरत हैं, जो जीविका दीदियों के रूप में गांवों में पशुओं की प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, समय पर टीकाकरण, कृमिनाशक दवाओं के उपयोग और संतुलित आहार के प्रति पशुपालकों को जागरूक कर रही हैं। इस अनूठी पहल से जहाँ एक ओर बहुमूल्य पशुधन का संरक्षण हो रहा है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार और आर्थिक स्वावलंबन के नए मार्ग प्रशस्त हुए हैं।
गया जिले में सर्वाधिक पशु सखियां, मुजफ्फरपुर दूसरे स्थान पर
पशु सखियों की तैनाती के जिलेवार आंकड़ों पर नजर डालें तो इस मुहिम में गया जिला सबसे आगे है, जहाँ सर्वाधिक 540 पशु सखियां अपनी सेवाएं दे रही हैं। इसके बाद मुजफ्फरपुर में 443, कटिहार में 432, नवादा में 430, पूर्णिया में 430 और नालंदा में 424 पशु सखियां ग्रामीण पशुपालकों को तकनीकी और चिकित्सा सहायता उपलब्ध करा रही हैं।
प्राथमिक चिकित्सा से घटी पशुओं की मृत्यु दर
बिहार के ग्रामीण परिवेश में पशुपालन आजीविका का एक मुख्य स्तंभ है। चिकित्सा के अभाव में पशुओं की अचानक होने वाली मौत से गरीब परिवारों पर बड़ा आर्थिक संकट आ जाता है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर मौजूद ये प्रशिक्षित पशु सखियां बीमारियों की शुरुआती लक्षणों से पहचान कर तुरंत प्राथमिक उपचार देती हैं। उनके निरंतर प्रयासों से ग्रामीण क्षेत्रों में खासकर बकरियों की मृत्यु दर में भारी गिरावट आई है, जिससे पशुपालन का व्यवसाय अब अधिक सुरक्षित और मुनाफेदार बन गया है।
स्वावलंबन की प्रतीक बनीं लखीसराय की खुशबू कुमारी
इस प्रशिक्षण से जीवन बदलने की एक प्रेरक कहानी लखीसराय जिले के चानन प्रखंड की ईंटोन पंचायत स्थित मननपुर गांव की खुशबू कुमारी की है। इंटरमीडिएट पास खुशबू वर्ष 2019 में जीविका के स्वयं सहायता समूह से जुड़ी थीं। उन्होंने कृषि कार्य के लिए समूह से 1 लाख रुपये का लोन लिया, जिससे उन्हें सालाना 40 से 50 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा होने लगा।
उनकी कार्यकुशलता को देखते हुए वर्ष 2023 में उन्हें 'पशु सखी' के रूप में चुना गया। जीविका से गहन प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद खुशबू अब गांव-गांव जाकर बकरीपालकों को स्वास्थ्य निगरानी, पोषण और पीपीआर (PPR) व ईटी (ET) जैसी घातक बीमारियों के खिलाफ टीकाकरण के लिए प्रेरित करती हैं। उनके इस समर्पण के कारण ग्रामीण अब उन्हें आदर से 'डॉक्टर दीदी' कहते हैं।
महिला सशक्तिकरण से मजबूत होती ग्रामीण अर्थव्यवस्था
राज्य के ग्रामीण विकास एवं सूचना व जनसंपर्क मंत्री श्रवण कुमार ने इस जीविका मॉडल की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। उन्होंने कहा कि जीविका दीदियां अपनी मजबूत इच्छाशक्ति और कठिन परिश्रम से ग्रामीण परिवारों को आर्थिक संबल प्रदान कर रही हैं।
सरकार का मुख्य ध्येय सुदूर क्षेत्रों तक वित्तीय और तकनीकी मदद पहुंचाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाना है। मंत्री ने स्पष्ट किया कि पशु सखी मॉडल के माध्यम से न केवल पशुधन सुरक्षित हो रहा है, बल्कि महिलाओं को हुनरमंद बनाकर सूबे के सर्वांगीण विकास में उनकी बराबरी की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है।
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।