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एडवांस्ड ब्रीडिंग तकनीक: कश्मीर में शुरू हुआ देश का पहला भ्रूण-आधारित भेड़ नस्ल सुधार कार्यक्रम

गांव जंक्शन डेस्क, श्रीनगर Published by: Umashankar Mishra Updated Wed, 23 Sep 2026 01:02 PM IST
सार

जम्मू-कश्मीर के भेड़पालन विभाग ने अक्टूबर 2025 से जकूरा स्थित भ्रूण स्थानांतरण तकनीक प्रयोगशाला के जरिए प्रगतिशील किसानों को यह तकनीक मुफ्त उपलब्ध कराई है, जिससे उनकी भेड़ों के झुंड में शुद्ध नस्ल के टेक्सल और ऑस्ट्रेलियन मेरिनो मेमने जन्मे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक पारंपरिक ब्रीडिंग से पांच-छह गुना तेज आनुवंशिक सुधार लाने में सक्षम है। सरकार इसे बढ़ावा देने के लिए 63.14 करोड़ रुपये की लागत से तीन साल में 20 जिला प्रयोगशालाएं स्थापित करने की योजना बना रही है। जानिए, विस्तार से...

भ्रूण स्थानांतरण तकनीक (ETT) से भेड़ों के झुंड में टेक्सल और मेरिनो मेमने का जन्म।
भ्रूण स्थानांतरण तकनीक (ETT) से भेड़ों के झुंड में टेक्सल और मेरिनो मेमने का जन्म। - फोटो : एआई
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विस्तार
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जम्मू-कश्मीर में भेड़ पालकों तक अब सीधे भ्रूण-स्थानांतरण तकनीक (ETT) पहुंचाई जा रही है, और इसका असर भी दिखने लगा है — किसानों के झुंड में शुद्ध नस्ल के टेक्सल और ऑस्ट्रेलियन मेरिनो मेमने जन्म ले चुके हैं। सरकार का मकसद है कि भेड़ों में आनुवंशिक सुधार की रफ्तार तेज हो और पारंपरिक ब्रीडिंग पर निर्भरता कम हो।

जकूरा लैब से मुफ्त मिल रही है तकनीक
भेड़पालन विभाग, कश्मीर, अक्टूबर 2025 से जकूरा स्थित अपनी ETT प्रयोगशाला के जरिए प्रगतिशील किसानों को यह तकनीक बिल्कुल मुफ्त उपलब्ध करा रहा है। प्रयोगशाला के प्रभारी डॉ. सुहैल नबी मागरे के मुताबिक, कई प्रगतिशील किसान अब तक इस तकनीक का लाभ उठा चुके हैं, और भ्रूण स्थानांतरण के जरिए उनके झुंड में शुद्ध नस्ल के टेक्सल और ऑस्ट्रेलियन मेरिनो मेमने पैदा हो चुके हैं।

एलीट मेढ़ों से भ्रूण तक का सफर
यह पहल एक बड़े बदलाव की तरफ संकेत करती है। अब तक किसान अपने झुंड की नस्ल सुधारने के लिए मुख्य रूप से एलीट यानी उम्दा नस्ल के नर मेढ़ों (rams) को झुंड में शामिल करते थे। मागरे बताते हैं, "ETT तकनीक आने से पहले किसानों के नस्ल सुधार कार्यक्रम एलीट मेढ़ों को झुंड में शामिल करने पर ही केंद्रित रहते थे।"

पुराने तरीके की अपनी सीमाएं थीं। ब्रीडिंग पर कमजोर नियंत्रण, एलीट मेढ़ों की सीमित उपलब्धता के चलते अधूरी ब्रीडिंग कवरेज, लंबा जनरेशन गैप, मादा भेड़ों की आनुवंशिक क्षमता का कम इस्तेमाल, और किसानों को पालन-पोषण पर अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता था। ETT तकनीक इन सभी सीमाओं को दूर करते हुए चुनिंदा आनुवंशिक गुणों वाले भ्रूणों को दूसरे मादा पशुओं में स्थानांतरित करने की सुविधा देती है, जिससे उम्दा आनुवंशिक सामग्री को तेजी से बढ़ाया जा सकता है।

मागरे के मुताबिक, "ETT तकनीक न सिर्फ एलीट जर्मप्लाज्म को तेज गति से बढ़ाती है, बल्कि ब्रीडिंग पर सही नियंत्रण के साथ चयन की गुणवत्ता भी बेहतर बनाती है, जिससे आनुवंशिक सुधार तेजी से होता है।" उन्होंने बताया कि ETT के जरिए आनुवंशिक सुधार पारंपरिक ब्रीडिंग के मुकाबले पांच से छह गुना तेज गति से हासिल किया जा सकता है।

ऊन से मटन की ओर बदलती प्राथमिकताएं
यह बदलाव ऐसे समय आ रहा है जब जम्मू-कश्मीर की भेड़-ब्रीडिंग प्राथमिकताएं ऊन से हटकर मटन उत्पादन के अनुकूल नस्लों की ओर शिफ्ट हो रही हैं। मागरे के मुताबिक, पहले जब वैश्विक स्तर पर ऊन की मांग ज्यादा थी, तब आयात और ब्रीडिंग कार्यक्रम मुख्य रूप से मेरिनो और कॉरीडेल जैसी ऊन वाली नस्लों पर केंद्रित रहते थे। कश्मीरी मेरिनो नस्ल स्थानीय स्तर पर खूब फैली, लेकिन उर्वरता, वृद्धि दर और ड्रेसिंग परसेंटेज जैसे गुणों में यह पीछे रह गई।

इसी दौरान अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर मटन की मांग बढ़ी है, जिसकी वजह बदलते खान-पान के तरीके, स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती जागरूकता और भेड़ के मांस का सांस्कृतिक व पाक-कला संबंधी महत्व है। सरकार के HADP प्रोजेक्ट 24 के तहत जम्मू-कश्मीर ने टेक्सल, डॉर्पर, रोमानोव और फिन जैसी मटन नस्लों को शामिल किया है।

आनुवंशिकी को माना जा रहा प्रमुख बाधा
कृषि उत्पादन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में अनुमानित रूप से 43.68 लाख भेड़ें और करीब 22.5 लाख बकरियां हैं, जिनमें से करीब आधी ही प्रजनन योग्य मानी जाती हैं। यहां हर साल करीब 370 लाख किलोग्राम मटन और 80 लाख किलोग्राम से ज्यादा ऊन का उत्पादन होता है, जो इस पशुधन क्षेत्र के आर्थिक महत्व को दर्शाता है।

मागरे के मुताबिक, उत्पादकता की बुनियाद आनुवंशिकी पर टिकी होती है, और इसका आउटपुट आनुवंशिकी तथा पोषण, बीमारी नियंत्रण व झुंड प्रबंधन जैसे पर्यावरणीय कारकों के तालमेल पर निर्भर करता है। पर्यावरणीय स्थितियों में स्थानीय स्तर पर सुधार किया जा सकता है, लेकिन आनुवंशिक सुधार के लिए नई आनुवंशिक सामग्री तक पहुंच जरूरी होती है। पारंपरिक चयनात्मक ब्रीडिंग धीमी होती है और सीमित आनुवंशिक विविधता के चलते इसकी अपनी सीमाएं हैं, जबकि विदेशी आनुवंशिकी को सहायक प्रजनन तकनीकों के साथ मिलाकर आनुवंशिक बदलाव को तेज किया जा सकता है।

आनुवंशिक धरोहर को सहेजने में भी मददगार
ETT तकनीक जम्मू-कश्मीर को जीवित पशुओं को इधर-उधर ले जाए बिना कीमती आनुवंशिक सामग्री को सहेजने और स्थानांतरित करने में भी मदद कर सकती है। मागरे के मुताबिक, भ्रूण और वीर्य को संरक्षण, व्यापार और आनुवंशिकी के आवागमन के लिए क्रायोप्रिजर्व यानी जमाकर सुरक्षित रखा जा सकता है, जिससे जीवित पशुओं के परिवहन से जुड़े जोखिम और विदेशी बीमारियों के प्रवेश की आशंका भी घटती है।

जम्मू-कश्मीर ने पिछले कई दशकों में ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, न्यूजीलैंड, स्विट्जरलैंड, दक्षिण अफ्रीका और फिनलैंड जैसे देशों से उम्दा नस्ल की भेड़-बकरियां आयात की हैं। विभाग का कहना है कि उचित व्यवस्थित संरक्षण की कमी के चलते समय के साथ इन शुद्ध नस्लों में मिलावट होती गई।

व्यापक स्तर पर रोलआउट की तैयारी
कृषि मंत्री जावेद अहमद डार ने बताया कि सरकार एलीट भेड़ जर्मप्लाज्म के भ्रूण-आधारित प्रसार और संरक्षण के लिए एक नेटवर्क तैयार कर रही है। उन्होंने कहा, "जम्मू-कश्मीर का ETT कार्यक्रम देश का पहला ऐसा कार्यक्रम होगा, जो एलीट भेड़ जर्मप्लाज्म के उन्नत भ्रूण-आधारित प्रसार, संरक्षण और वितरण के लिए एक नेटवर्क स्थापित करेगा।"

इस कार्यक्रम की प्रस्तावित लागत तीन साल में 63.14 करोड़ रुपये रखी गई है, और चरणबद्ध तरीके से 20 जिला ETT प्रयोगशालाएं स्थापित करने की योजना है। डार ने कहा, "पारंपरिक ब्रीडिंग के विपरीत, भ्रूण स्थानांतरण तकनीक एलीट डोनर पशुओं की उम्दा आनुवंशिकी को तेजी से बढ़ाने में सक्षम बनाती है, साथ ही कम समय में ज्यादा प्रजनन दर और तेज आनुवंशिक सुधार भी हासिल करती है, जबकि कीमती शुद्ध नस्लों को वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित भी रखा जाता है।"

उन्होंने बताया कि इस मिशन का लक्ष्य एलीट ब्रीडिंग स्टॉक का एक आत्मनिर्भर स्रोत तैयार करना है, ताकि आयात पर निर्भरता घटे और मटन व ऊन की उत्पादकता में सुधार हो सके।
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