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लंपी रोग का खतरा : गाय-भैंस में गांठ और तेज बुखार को न करें नजरअंदाज, पशुपालक ऐसे पहचानें लक्षण... करें बचाव

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sat, 19 Sep 2026 04:11 PM IST
सार

  • आगरा में गोवंशीय पशुओं में लंपी त्वचा रोग के मामले बढ़ने की जानकारी सामने आई है।
  • लंपी वायरस से होने वाली बीमारी है, जो मच्छर, मक्खी, चिंचड़ और जूं जैसे कीटों से फैल सकती है।
  • तेज बुखार, आंख-नाक से पानी और शरीर पर कठोर गांठें इसके प्रमुख लक्षण हैं।
  • गंभीर मामलों में पशु कमजोर पड़ सकता है और दूध उत्पादन कम हो सकता है।

गाय-भैंस
गाय-भैंस - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश के आगरा में गोवंशीय पशुओं में लंपी त्वचा रोग के मामले बढ़ रहे हैं। यह वायरस से होने वाली बीमारी है, जो मच्छर, मक्खी, चिंचड़ और जूं जैसे खून चूसने वाले कीटों के अलावा संक्रमित पशुओं के संपर्क से फैल सकती है। पशुपालकों को संक्रमित पशुओं को तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग रखने और पशुशाला में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी गई है।

कृषि विज्ञान केंद्र, बिचपुरी के पशुपालन विशेषज्ञ धर्वेंद्र सिंह चौहान के अनुसार, लंपी स्किन डिजीज मुख्य रूप से रक्त चूसने वाले कीटों के जरिए फैलती है। संक्रमित पशुओं के संपर्क से भी संक्रमण का खतरा रहता है। इसके अलावा सीमेन, प्लेसेंटा तथा दूषित पानी और चारे से भी संक्रमण फैलने की आशंका हो सकती है।

तेज बुखार और शरीर पर गांठें प्रमुख लक्षण
लंपी रोग से संक्रमित पशु में शुरुआत में तेज बुखार आ सकता है। इसके साथ आंख और नाक से पानी आना तथा सिर, गर्दन और जननांगों के आसपास कठोर गांठें और सूजन दिखाई दे सकती है। गंभीर मामलों में गांठों में घाव हो सकते हैं। पशु कमजोर पड़ सकता है और उसका वजन तथा दूध उत्पादन कम हो सकता है। कुछ मामलों में लंगड़ापन, सांस लेने में परेशानी और निमोनिया जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।

बीमार पशु को तुरंत अलग करें
विशेषज्ञ के अनुसार, किसी पशु में लंपी के लक्षण दिखाई देने पर उसे तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए। बीमार पशु के लिए चारा और पानी की अलग व्यवस्था रखें। उसका अनावश्यक आवागमन भी रोकें। पशुशाला को साफ और सूखा रखें। नियमित रूप से विसंक्रमण करें और मच्छर, मक्खी तथा चिंचड़ जैसे कीटों की रोकथाम करें। बाहर से लाए गए नए पशुओं को कुछ समय तक अलग रखकर उनकी निगरानी करना भी जरूरी है।

घावों की देखभाल में जेल का इस्तेमाल
पशुपालन विशेषज्ञ धर्वेंद्र सिंह चौहान के अनुसार, त्वचा पर बने घावों की सहायक देखभाल के लिए नीम, तुलसी, ग्वारपाठा और हल्दी से जेल तैयार किया जा सकता है। इसके लिए एक लीटर पानी में 400-500 ग्राम नीम की पत्तियां और 50-100 ग्राम तुलसी डालकर पानी आधा होने तक उबालने की सलाह दी गई है। मिश्रण ठंडा होने के बाद इसे छान लें। इसमें 300-400 ग्राम ग्वारपाठे का गूदा और पांच चम्मच हल्दी मिलाई जा सकती है।

घाव को साफ करने के बाद इस मिश्रण को बाहरी रूप से सुबह-शाम लगाया जा सकता है। हालांकि, यह सिर्फ सहायक देखभाल है। पशु की हालत गंभीर होने, तेज बुखार, सांस लेने में परेशानी या बड़े घाव होने पर पशु चिकित्सक से उपचार कराना जरूरी है।

मृत पशु का शव खुले में न फेंकें
लंपी से किसी पशु की मौत होने पर उसके शव को खुले में फेंकने से बचें। पशुपालन विभाग और स्थानीय प्रशासन की सलाह के अनुसार शव का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण किया जाना चाहिए। विशेषज्ञ के अनुसार, करीब 1.5 मीटर गहरे गड्ढे में चूना और नमक डालकर शव का निस्तारण किया जा सकता है। पशुशाला, वाहन और संक्रमित सामग्री की भी उचित विसंक्रमक से सफाई करनी चाहिए।

पशुपालक इन बातों का रखें ध्यान
  • बीमार पशु को तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग करें।
  • बीमार पशु के लिए अलग चारा-पानी रखें।
  • पशुशाला को साफ और सूखा रखें।
  • मच्छर, मक्खी और चिंचड़ पर नियंत्रण करें।
  • नए पशुओं को कुछ समय अलग रखकर निगरानी करें।
  • पशु में गांठ, तेज बुखार या कमजोरी जैसे लक्षण दिखें तो पशु चिकित्सक से संपर्क करें।
  • मृत पशु के शव का खुले में निस्तारण न करें।
  • संक्रमित पशु और उसकी सामग्री के संपर्क के बाद सफाई और विसंक्रमण का ध्यान रखें।

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