देसी नस्ल की गायों का डेयरी उद्योग में विशेष योगदान है। करनाल स्थित राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो ने देसी गाय की 50 से अधिक नस्लों को सूचीबद्ध किया है। गाय की ये नस्लें स्थानीय जलवायु के अनुरूप खुद को ढालना जानती हैं और इन्हें बेहतर दुग्ध उत्पादन के लिए भी जाना जाता है।
अमृतमहल : कर्नाटक और महाराष्ट्र में पाई जाने वाली देसी गाय की नस्लों में अमृतमहल प्रमुख है। इसकी ऊंचाई लगभग 126 सेमी होती है। प्रौढ़ गाय का वजन लगभग 300-350 किलोग्राम और बैलों का वजन लगभग 500 किलोग्राम होता है। अमृतमहल नस्ल की गायें एक ब्यान्त में लगभग 550-600 लीटर दूध देती हैं।
देवनी गाय : डोंगरी, डोंगरपति, सुरती, वनेरा आदि नामों से विख्यात देवनी गाय भी कर्नाटक के बिदार और महाराष्ट्र के लातूर में अधिक पाई जाती है। यह गाय प्रति ब्यान्त में औसतन 1,135 लीटर दूध देती है।
कृष्णा वैली : देसी गाय की कृष्णा वैली नस्ल भी कर्नाटक के कृष्णा घाटी क्षेत्र में पाई जाती हैं। इस नस्ल के सींग छोटे, शरीर छोटा, टांगें छोटी और मोटी होती हैं। यह एक ब्यान्त में औसतन 900 किलो दूध देती है। हल्लीकर, खिल्लर, कृष्णा घाटी और मलनाड गिद्दा जैसी गाय की नस्लें भी कर्नाटक में पाई जाती हैं।
वेचुर गाय : दुनिया की छोटी गायों में शामिल केरल की वेचुर गाय की ऊंचाई 3 से 4 फीट तक होती है। यह केरल के अलाप्पुझा, एलेप्पी, कोट्टायम, पथानामथिट्टा और कासरगोड में प्रमुखता से पाई जाती है। गाय की यह नस्ल एक ब्यान्त में औसतन 561 लीटर तक दूध देती है।
खिलारी : महाराष्ट्र और कर्नाटक में पाई जाने वाली खिलारी नस्ल की गायों का रंग खाकी, सिर बड़ा, सींग लम्बी और पूंछ छोटी होती है। इस नस्ल की गाय प्रति ब्यान्त औसतन 240 से 515 किलो दूध देती है। इसके दूध की वसा लगभग 4.2 प्रतिशत होती है। यह नस्ल एक ब्यांत में औसतन 240-515 किलो दूध देती है।
लाल सिंधी : गाय की लाल सिंधी प्रजाति पहले सिर्फ सिंध क्षेत्र में पाई जाती थी। लेकिन, अब ये पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और ओडिशा में भी पाई जाती हैं। साहीवाल की तरह लाल सिंधी भी सालाना 2000 से 3000 लीटर तक दूध देती हैं।
बचौर : बिहार के सीतामढ़ी जिले के बचौर एवं कोईलपुर परगना में बचौर नस्ल की देसी गाय पाई जाती है। बचौर को ‘भूटिया’ नाम से भी जानते हैं। बचौर दरभंगा, सीतामढ़ी और मधुबनी जिलों में पाई जाती है। बचौर गाय एक ब्यान्त में औसतन 347 लीटर तक दूध देती है।
पूर्णिया गाय : मवेशियों की एक शुद्ध भारतीय नस्ल पूर्णिया गाय है, जो बिहार के पूर्णिया, अररिया, कटिहार मधेपुरा, किशनगंज और सुपौल जिलों में पाई जाती है। यह प्रतिदिन 1.5 से 3 लीटर दूध देती है। इसका पहला ब्यान्त लगभग 49 महीने का होता है और दो ब्यान्त के बीच का अंतराल लगभग 15 महीने का होता है।
गंगातीरी : यूपी और बिहार के गंगा के मैदानी क्षेत्रों में गंगातीरी गाय का पालन किया जाता है। गंगातीरी नस्ल की गाय 8 से 16 लीटर तक दूध देती है। यह गाय प्रति ब्यान्त में औसतन 900-1200 लीटर दूध देती है।
पोनवार : देसी गाय की नस्लों में यूपी में पाई जाने वाली पोनवार भी शामिल है। रुहेलखण्ड इलाके में पाई जाने वाली पोनवार नस्ल के मवेशी फुर्तीले और मजबूत होते हैं। एनडीडीबी के अनुसार, पोनवार गाय एक ब्यान्त में औसतन 400-500 लीटर तक दूध देती है।
खेरीगढ़ : यूपी की देसी गाय नस्लों में खेरीगढ़ शामिल है। इसका जन्म स्थान लखमीरपुर जिले को माना जाता है। इसे खेर, खारीगढ़ या खारी के नाम से भी जानते हैं। इसके प्रौढ़ सांड का औसत भार 4.7 क्विंटल और गाय का औसत भार 3.4 क्विंटल होता है। यह प्रति ब्यान्त में औसतन 300-500 किलो दूध देती है।
केनकथा : बुंदेलखंड में गाय की केनकथा नस्ल का पालन किया जाता है। यह गाय मुख्य रूप से केन नदी के किनारे के क्षेत्रों में पाली जाती है और केन नदी से ही इसका नाम पड़ा है। केनकथा गाय की एक प्रमुख खासियत है कि यह नस्ल कठिन वातावरण में भी जीवित रह सकती है।
बरगूर : तमिलनाडु के बरगुर पहाड़ी क्षेत्र में पाई जाने वाली बरगूर एक प्रमुख देसी मवेशी नस्ल है। इन गायों का सिर लम्बा, पूंछ छोटी व मस्तक उभरा होता है। यह गाय नस्ल एक ब्यान्त में 250-1300 लीटर दूध देती है।
कंगायम : तमिलनाडु में पाए जाने वाले कंगायम गोवंश फुर्तीले होते हैं। कंगायम नस्ल कोयम्बटूर के दक्षिणी इलाकों में पाई जाती है। यह गाय 10-12 सालों तक दूध देती है। एक ब्यान्त में यह औसतन 540 लीटर तक दूध देती है।
पुंगनूर : गाय की पुंगनूर नस्ल आंध्रप्रदेश में पाई जाती है। यह सफेद, भूरे या हल्के भूरे से गहरे भूरे या लाल रंग की होती है। कभी-कभी सफेद रंग मिश्रित लाल, भूरे या काले रंग के धब्बे वाले मवेशी भी देखे जाते हैं। यह नस्ल एक ब्यान्त में 194 से 1100 लीटर दूध देती है।
बिंझारपुरी : ओडिशा की बिन्झारपुरी गाय जाजपुर, भद्रक और केंद्रपाड़ा जिलों में मुख्य रूप से पाई जाती है। अधिकांश छोटे और भूमिहीन किसान इन मवेशियों के गुणों के कारण इन्हें पालते हैं। यह गाय एक ब्यान्त में लगभग 915 से 1350 लीटर दूध देती है।
कोसली : मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के रायपुर, राजनांदगांव, दुर्ग और बिलासपुर में पाई जाने वाली कोसली नस्ल का आकार छोटा होता है। कोसली गाय का वजन 160 से 200 किलोग्राम तक होता है। कोसली गाय एक ब्यान्त में 250 लीटर तक दूध देती है। इस गाय के दूध में 4.5 प्रतिशत तक फैट की मात्रा पाई जाती है।
बद्री : देसी गाय की यह नस्ल उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके में पाई जाती है। इसे पहाड़ी गाय के रूप में भी जाना जाता है। बद्री नस्ल के मवेशियों का सामान्य रंग काला, भूरा या स्लेटी होता है, हालांकि मादा का सफेद रंग कम ही देखा जाता है। बद्री गाय से प्रति ब्यान्त औसत दूध उत्पादन 632 लीटर मिलता है और इसके दूध में औसत वसा 4 प्रतिशत होती है।
लद्दाखी गाय : इस नस्ल की नस्ल ऊंचाई वाले ठंडे क्षेत्रों में पाई जाती है। लद्दाखी गाय की नस्ल का मूल निवास जम्मू-कश्मीर का लेह-लद्दाख क्षेत्र है। इनसे प्रतिदिन लगभग 2 से 5 लीटर दुग्ध उत्पादन मिलता है। इन गायों के दूध में वसा का औसत 5.24 प्रतिशत होता है।
गिर नस्ल : गाय की गिर नस्ल मुख्य रूप से गुजरात में पाई जाती है। इसका मूल स्थान गुजरात के काठियावाड़ के दक्षिण में स्थित गिर के जंगल बताए जाते हैं। गिर गाय से औसतन 2110 लीटर दुग्ध उत्पादन मिलता है। गिर नस्ल की गायों की इजराइल और ब्राजील जैसे देशों में भारी मांग हैं।
कांकरेज : गाय की कांकरेज नस्ल मुख्य रूप से गुजरात और राजस्थान के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्रों बाड़मेर, सिरोही तथा जालौर में मुख्य रूप से पाई जाती है। यह प्रतिदिन 5 से 10 लीटर दूध देती है। कांकरेज नस्ल की गाय एक ब्यान्त में औसतन 1738 लीटर तक दूध देती हैं।
मेवाती : राजस्थान और हरियाणा के साथ-साथ यूपी में मेवाती नस्ल की गाय पाई जाती है। यह नस्ल राजस्थान के भरतपुर एवं अलवर के अलावा, हरियाणा के फरीदाबाद व गुड़गांव और यूपी के मथुरा तक फैली हुई है। यह नस्ल एक ब्यान्त में औसतन 958 लीटर दूध देती है।
राठी : राजस्थान के गंगानगर, बीकानेर और जैसलमेर में पाई जाने वाली राठी नस्ल की गाय प्रतिदन 6 से 8 लीटर दूध देती है। राठी नस्ल का नाम राठस जनजाति के नाम पर पड़ा है। राठी गाय एक ब्यान्त में औसतन 1560 लीटर दूध देती हैं।
साहीवाल : यह गाय मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, एमपी, यूपी और राजस्थान में पाई जाती है और सालाना 2000 से 3000 लीटर दूध देती है। दुग्ध कारोबारी इन्हें काफी पसंद करते हैं। यह गाय एक बार में करीब 10 महीने तक दूध देती है।
थारपारकर : राजस्थान के थार रेगिस्तान के नाम पर थारपारकर नस्ल की गाय का नाम पड़ा है, जो एक रोग प्रतिरोधी नस्ल मानी जाती है। यह जोधपुर और जैसलमेर में मुख्य रूप से पाई जाती है। थारपारकर गाय औसतन एक ब्यान्त में 1749 लीटर दूध देती है।
असम की लखीमी, महाराष्ट्र और गोवा में पाई जाने वाली कोंकण कपिला, हरियाणा और चंडीगढ़ की बिलाही और तमिलनाडु की पुल्लिकुलम भी देसी गाय की नस्लें हैं। इसी तरह, सीरी नस्ल की गाय सिक्किम और भूटान के साथ-साथ दार्जिलिंग के आसपास के क्षेत्रों में पाई जाती है।