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सूखे इलाके में नई उम्मीद : जहां पानी बना चुनौती, वहीं Gen Z किसान ने इस तकनीक से अदरक उगाकर कमाए लाखों

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sun, 27 Sep 2026 03:09 PM IST
सार

महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित बीड़ जिले के 27 वर्षीय किसान निखिल गायकवाड़ ने 2025 में एक एकड़ से 290 क्विंटल अदरक की पैदावार का दावा किया। करीब 6,000 रुपये प्रति क्विंटल के औसत भाव पर उनकी बिक्री 17.4 लाख रुपये रही। खेती की लागत घटाने और पानी बचाने के लिए वह ऊंची क्यारियों, ड्रिप सिंचाई और जैविक पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं।

अदरक की खेती
अदरक की खेती - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित बीड़ जिले में पानी खेती के लिए बड़ी चुनौती है। इसके बावजूद चिंचोली माली गांव के 27 वर्षीय किसान निखिल गायकवाड़ ने अदरक की खेती से अच्छी कमाई का उदाहरण पेश किया है। निखिल के अनुसार, उन्होंने 2025 में एक एकड़ खेत से 290 क्विंटल अदरक की पैदावार ली। इसे उन्होंने औसतन करीब 6,000 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से बेचा। इससे करीब 17.4 लाख रुपये की कुल बिक्री हुई।

निखिल के मुताबिक, खेती की लागत करीब 3 से 3.5 लाख रुपये रही और खर्च निकालने के बाद उन्हें 13 लाख रुपये से अधिक का लाभ हुआ। हालांकि, ये आंकड़े निखिल के अपने अनुभव पर आधारित हैं और हर किसान को इतनी पैदावार या इतनी कीमत मिले, यह जरूरी नहीं है। अदरक की कीमत मौसम और बाजार की स्थिति के अनुसार काफी बदल सकती है। निखिल की कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने ऐसे इलाके में कम पानी के बीच अदरक की खेती की, जहां सिंचाई हमेशा बड़ी चिंता रहती है।

पहले पारंपरिक फसलें उगाते थे
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, निखिल का परिवार करीब 10 एकड़ जमीन पर खेती करता है। परिवार में पहले मुख्य रूप से ज्वार, मूंग, गेहूं और सोयाबीन जैसी फसलें उगाई जाती थीं। पढ़ाई पूरी करने के बाद निखिल कुछ अलग करना चाहते थे। 2022 में उन्होंने अदरक की खेती शुरू करने का फैसला किया। आसपास के किसानों को अदरक उगाते देखकर उन्होंने करीब तीन-चौथाई एकड़ में इसकी खेती का प्रयोग किया। उन्होंने आईआईएसआर-महिमा किस्म लगाई।

पहले ही प्रयोग में उन्हें अच्छा परिणाम मिला। करीब 10 महीने बाद उन्होंने तीन-चौथाई एकड़ यानी लगभग 38 गुंठा जमीन से 187 क्विंटल अदरक की पैदावार ली। उन्होंने इसे करीब 9,300 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से बेचा। इस परिणाम के बाद उनका भरोसा बढ़ा और उन्होंने अदरक का रकबा बढ़ाने का फैसला किया।

बुआई से पहले ही खेत की तैयारी
निखिल की खेती का एक खास तरीका अदरक की बुआई से पहले ही शुरू हो जाता है। वह खेत में अदरक लगाने से पहले चना या हरी मूंग जैसी फसल लेते हैं। फरवरी के आसपास चना की फसल काटने के बाद वह खेत में बचे डंठल और जड़ों को पूरी तरह बाहर नहीं निकालते। इन्हें मिट्टी में मिला देते हैं। इसके बाद खेत में गोबर की खाद डालकर रोटावेटर से मिट्टी की जुताई करते हैं।

उनका मानना है कि अदरक जैसी फसल, जो आठ से नौ महीने तक जमीन के अंदर रहती है, उसके लिए बुआई से पहले मिट्टी की अच्छी तैयारी जरूरी है। इसलिए वह बाद में सुधार करने के बजाय शुरुआत से ही मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने पर ध्यान देते हैं।

ऊंची क्यारियों में अदरक, नीचे ड्रिप सिंचाई
बीड़ जैसे कम पानी वाले इलाके में सिंचाई का बेहतर इस्तेमाल निखिल की खेती का अहम हिस्सा है। वह खेत में ऊंची क्यारियां बनाकर अदरक की खेती करते हैं। इन क्यारियों में ड्रिप सिंचाई की पाइप लगाई जाती है। ड्रिप से पानी सीधे पौधों की जड़ों के आसपास पहुंचता है। इससे पूरे खेत में पानी फैलाने के बजाय जरूरत वाली जगह पर सिंचाई की जाती है।

निखिल क्यारियां तैयार करते समय सोयाबीन के अवशेष और गिरी हुई पत्तियों जैसे जैविक पदार्थ भी मिलाते हैं। उनके अनुसार, इससे मिट्टी ढीली रहती है और अदरक की गांठों को जमीन के अंदर बढ़ने के लिए बेहतर जगह मिलती है। वह एक एकड़ में करीब 10 क्विंटल अदरक के बीज का इस्तेमाल करते हैं। पौधों के बीच की दूरी आधे फुट से कम रखते हैं।

मिट्टी और जड़ों की सेहत पर जोर
अदरक का बड़ा हिस्सा जमीन के अंदर विकसित होता है। इसलिए निखिल खेत की मिट्टी और जड़ों की सेहत पर खास ध्यान देते हैं। वह ट्राइकोडर्मा, दूसरे सूक्ष्मजीव आधारित उत्पाद और जैव उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं। उनका कहना है कि अदरक आठ से नौ महीने तक मिट्टी के अंदर रहती है, इसलिए इस दौरान मिट्टी और जड़ क्षेत्र को स्वस्थ रखना जरूरी है।

हालांकि, जैविक या सूक्ष्मजीव आधारित उत्पाद किसी फसल की सफलता की गारंटी नहीं देते। पैदावार पर मिट्टी, मौसम, पानी, रोग-कीट, खेती की लागत और बाजार भाव जैसे कई कारकों का असर पड़ता है।

खेत से ही खरीद लेते हैं व्यापारी
निखिल ने अदरक की बिक्री के लिए भी अलग तरीका अपनाया है। फसल तैयार होने पर थोक व्यापारी सीधे उनके खेत पर पहुंचते हैं। व्यापारी ही अदरक की खुदाई के लिए मजदूरों की व्यवस्था करते हैं और मशीनों से अदरक की सफाई भी कराते हैं। इसके बाद उपज को आगे बाजार में ले जाया जाता है। इससे निखिल को अलग से मंडी तक परिवहन का खर्च नहीं उठाना पड़ता और कटाई व धुलाई की पूरी व्यवस्था भी खुद नहीं करनी पड़ती। वह अपना ज्यादा समय फसल की देखभाल पर लगा पाते हैं।

अब दो एकड़ में कर रहे अदरक की खेती
2025 की फसल से मिले अच्छे परिणाम के बाद निखिल ने अदरक की खेती का रकबा बढ़ाकर दो एकड़ कर दिया है। इसकी खुदाई मार्च के आसपास होने की उम्मीद है। हालांकि, उन्हें बाजार भाव को लेकर जोखिम का भी पता है। अदरक के दाम में तेजी से बदलाव हो सकता है और हर साल ऊंचा भाव मिलना तय नहीं है। निखिल का मानना है कि अच्छी पैदावार के साथ खेती की लागत को नियंत्रित रखना जरूरी है, ताकि कम भाव मिलने पर भी नुकसान का जोखिम कम किया जा सके।

निखिल की कहानी सिर्फ एक साल में 17 लाख रुपये की बिक्री तक सीमित नहीं है। इसके पीछे खेत की पहले से तैयारी, पानी का सही इस्तेमाल, मिट्टी की सेहत पर ध्यान और खेत से ही बिक्री की व्यवस्था जैसे कई तरीके हैं। बीड़ जैसे सूखा प्रभावित इलाके में उन्होंने दिखाया है कि फसल का चुनाव बदलने के साथ-साथ खेती का तरीका बदलना भी कम पानी वाली परिस्थितियों में अहम हो सकता है।
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