जरा सोचिए कि भारत के खेतों में उगने वाला एक नन्हा सा सफेद फूल, जो सूरज की रोशनी में मुलायम रेशों के बादल में बदल जाता है, आखिर कैसे बन जाता है 6 करोड़ किसानों की रोजी-रोटी और करोड़ों लोगों के रोजगार का जरिया? यह कहानी है कपास की, जिसे भारत में यूं ही नहीं 'सफेद सोना' कहा जाता, बल्कि इसलिए क्योंकि खेत से लेकर दुनिया भर की अलमारियों तक यह एक पूरी अर्थव्यवस्था को धागे में पिरोता है।
दुनिया में सबसे अनोखा है भारत का कपास
भारत इकलौता देश है, जो कपास की चारों मान्यता प्राप्त प्रजातियां उगाता है। इसमें दो एशियाई किस्में (जी. आर्बोरियम और जी. हर्बेसियम), मिस्री कपास (जी. बारबाडेंस) और अमेरिकी अपलैंड कपास (जी. हिरसुटम) शामिल हैं। दिलचस्प बात यह है कि आज देश में उगने वाली लगभग सभी बीटी कपास किस्में जी. हिरसुटम की ही देन हैं। साल 2002 में आई बीटी कपास ने बॉलवर्म कीट के आतंक को काफी हद तक कम कर दिया और किसानों की जेब में ज्यादा पैसा आने लगा।
स्वदेशी आंदोलन से अब तक कपास का सफर
भारत का कपास से नाता हजारों साल पुराना है। कभी यह उपमहाद्वीप सूती वस्त्रों का वैश्विक केंद्र हुआ करता था। 19वीं सदी में कोलकाता, मुंबई और अहमदाबाद में कपड़ा मिलें लगीं, और अहमदाबाद को तो "भारत का मैनचेस्टर" तक कहा जाने लगा। स्वदेशी आंदोलन ने इस उद्योग को नई ताकत दी, और आज वही विरासत भारत के वस्त्र उद्योग की नींव है।
किसानों को मिल रही MSP की मजबूत ढाल
बाजार गिरे या चढ़े, किसान को घाटा न हो - इसी सोच के साथ न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था काम करती है। वर्ष 2026-27 के लिए मध्यम रेशे वाली कपास का MSP बढ़ाकर 8,267 रुपये और लंबे रेशे वाली कपास का 8,667 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है। कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) ने 2025-26 सीजन में 24 लाख लेनदेन के जरिए 41,530 करोड़ रुपये मूल्य की 105 लाख गांठ कपास की खरीद की।
वर्ष 2031 तक उत्पादन दोगुना करने की तैयारी
वर्ष 2025-26 में शुरू हुए पांच साल के कपास उत्पादकता मिशन का बजट 5,659.22 करोड़ रुपये है, और साल 2031 तक उत्पादन को 297 से बढ़ाकर 498 लाख गांठ तक पहुंचाने का लक्ष्य है। यह मिशन 14 राज्यों के 140 जिलों में फैला है और करीब 32 लाख किसानों तक इसका सीधा फायदा पहुंचने की उम्मीद है।
गुजरात के राजकोट में किसान विनोदभाई वडोदरिया ने सघन रोपण तकनीक अपनाकर उपज में 30-35% का इजाफा किया, वहीं महाराष्ट्र के जलगांव में भास्कर चौधरी की उपज में 37.5% की बढ़ोतरी दर्ज हुई, जो यह दिखाता है कि सही तकनीक से किसान की किस्मत सच में बदल सकती है।
मोबाइल एप से किसानों को मिली नई ताकत
लंबी कतारें और इंतजार अब बीते दिनों की बात हो सकती है। कपास किसान मोबाइल ऐप के जरिए अब तक 41 लाख से ज्यादा किसान पंजीकृत हो चुके हैं, जो घर बैठे ही स्लॉट बुक कर सकते हैं और आधार-लिंक्ड भुगतान पा सकते हैं। यानी टेक्नोलॉजी अब खेत के आखिरी छोर तक पहुंच रही है।
कस्तूरी कॉटन भारत - कपास को मिलेगी नई पहचान
जैसे किसी ब्रांड की अपनी पहचान होती है, वैसे ही अब भारतीय कपास को भी मिल रही है अपनी वैश्विक ब्रांडिंग। कस्तूरी कॉटन भारत पहल के तहत QR कोड और ब्लॉकचेन तकनीक से कपास की पूरी यात्रा को ट्रैक किया जा रहा है। 30 जून 2026 तक 3,29,550 गांठें प्रमाणित हो चुकी हैं, जिससे भारतीय कपास को शुद्धता और गुणवत्ता के वैश्विक प्रतीक के तौर पर स्थापित किया जा रहा है।
करघे से आगे भी है कपास की कहानी
कपास सिर्फ कपड़ों तक सीमित नहीं है। इसके बीज से करीब 18% खाद्य तेल निकलता है, जिसे "हार्ट ऑयल" कहा जाता है क्योंकि इसमें दिल के लिए फायदेमंद पॉलीअनसैचुरेटेड फैटी एसिड भरपूर मात्रा में होता है। बचा हुआ हिस्सा पशुओं के चारे में, डंठल गांवों में बायोमास ईंधन में, और सबसे छोटे रेशे अस्पतालों में शल्य चिकित्सा कपास के रूप में इस्तेमाल होते हैं। साफ है कि कपास की कोई कतरन बेकार नहीं जाती।
निर्यात में भी भारत की मजबूत धाक
वित्त वर्ष 2025 में भारत का कपास निर्यात 11.49 अरब डॉलर तक पहुंचा, जिसमें अमेरिका सबसे बड़ा खरीदार (26.35%) बनकर उभरा, इसके बाद बांग्लादेश और श्रीलंका का नंबर आता है। खेत से निकलकर यह "सफेद सोना" अब दुनिया भर की अलमारियों की शान बन रहा है।
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