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आदिवासियों का कल्पवृक्ष महुआ: छत्तीसगढ़ को कैसे मिले महुआ से तरक्की की राह, बड़े पैमाने पर होता है उत्पादन

अवधेश कुमार मलिक, रायपुर Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 18 Mar 2024 01:12 PM IST
सार

महुआ के फल और फूल छत्तीसगढ़ के करीब 6 लाख परिवारों की आय का स्रोत हैं। महुआ के के प्रसंस्करण को बढ़ावा मिले तो स्थानीय लोगों को तरक्की की नई राह मिल सकती है। 

महुआ से कई तरह के उत्पाद बना रही हैं स्वयं सहायता समूह की महिलाएं।
महुआ से कई तरह के उत्पाद बना रही हैं स्वयं सहायता समूह की महिलाएं। - फोटो : अवधेश मलिक
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विस्तार
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छत्तीसगढ़ का महुआ इस साल जनवरी के पहले पखवाड़े में उस समय चर्चा में आ गया, जब पीएम नरेंद्र मोदी ने राज्य के आदिवासी बहुल क्षेत्र उत्तर बस्तर की बेटी भूमिका भूआर्य से वर्चुअल बातचीत में पूछा कि आपके गांव में महुआ का किस-किस चीज के लिए उपयोग होता है? विकसित भारत संकल्प यात्रा के तहत ग्राम मनकेसरी में लगाए गए शिविर में ग्राम भानबेड़ा की भूमिका ने पीएम मोदी को बताया कि महुआ के लड्डू और आंवले का अचार बनाकर बेचा जाता है। महिला स्वयं सहायता समूह द्वारा लड्डू बनाकर 700 रुपये प्रति किलो की दर से बेचा जाता है। भूमिका ने बताया कि उनके गांव में 29 समूह हैं और वन-धन विकास केंद्र के माध्यम से लघु वनोपज संग्रहण का काम समूह की महिलाओं द्वारा किया जा रहा है, जिसका सभी को लाभ मिल रहा है। 

कल्पवृक्ष मानते हैं आदिवासी 
अब महुआ का प्रसंस्करण कर अन्य उत्पाद बनाने पर जोर दिया जा रहा है। वनों से आच्छादित छत्तीसगढ़ में महुआ के बहुपयोगी फल और फूल बहुतायत में पाए जाते हैं। वनोपज के रूप में संग्रहित महुआ के फल और फूल छत्तीसगढ़ के करीब 6 लाख परिवारों की आय का प्रमुख स्रोत हैं। आदिवासी इसे कल्पवृक्ष मानते हैं। वो दोना और पत्तल और गुड़ से लेकर शराब तक बनाते हैं। गोंड, संथाल, बैगा, मुंडा, हो, उरांव सहित कम से कम 12 राज्यों में फैले अन्य जनजातीय समुदायों का महुआ से गहरा संबंध है। उदाहरण के लिए, किसी गोंडी आदिवासी के लिए, टोंडा (जन्म), मांडा (शादी) और कोंडा (मृत्यु) के सामाजिक अनुष्ठान महुआ के बिना अधूरे ही रहेंगे।

महुआ से बन रहे कई उत्पाद 
कोविड महामारी के समय जब सभी उद्योग-धंधे बंद हो रहे थे और बड़ी संख्या में प्रवासी लोग अपने घर लौट रहे थे, तो उस समय छत्तीसगढ़ में महुआ को लेकर नया प्रयोग हुआ। प्रदेश के कृषि वैज्ञानिकों ने संक्रमण रोकने के लिए इसका उपयोग सैनिटाइजर बनाने में किया और प्रयोग सफल रहा। युवा वैज्ञानिक समर्थ जैन ने महुआ सैनिटाइजर को जशपुर के स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के सहयोग से बनाया। यह प्रयोग काफी सफल रहा और सैनिटाइजर के लिए तय मानदंड पर खरा उतरा। जशपुर से निकलकर महुआ सैनिटाइजर न केवल रायपुर, बिलासपुर, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ और पड़ोसी राज्यों तक पहुंच गया।

सैनेटाइजर बनाने के काम में लगी करुणा भगत बताती हैं, कोविड खत्म होने के साथ हमारे सैनेटाइजर की मांग भी कम हो गई। ऐसे में, समूह की महिलाएं महुआ के अन्य उत्पाद बनाने लगीं। इनमें मल्टी-विटामिन कुकीज, बिस्कुट, जैम, सॉस, लड्डू, मल्टी-विटामिन बार और पाचक कैंडी आदि शामिल हैं। ‘जय जंगल फार्मर प्रोड्यूसर लिमिटेड और वेदिक वाटिका प्रा. लि. के जरिए महुआ के उत्पादों बनाया और बेचा जाने लगा। ईको-फेंडली और स्वास्थ्यवर्धक होने से इनकी मांग बढ़ गई। इसका फायदा समूह की महिलाओं को मिला। समर्थ बताते हैं कि महुआ से बने उत्पाद पोषण से भरपूर होते हैं और इनके सेवन से कुपोषण पर काबू पाने में मदद मिल सकती है। 

5 लाख क्विंटल महुआ फूल का संग्रह
एक अनुमान के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में 5 लाख क्विंटल महुआ फूल का संग्रहण किया जाता है, जिसकी कीमत 150-200 करोड़ रुपये तक आंकी गई है। राज्य सरकार ने वर्ष 2022 में निविदा जारी करके 2000 क्विटल महुआ फूलों के विक्रय का लक्ष्य रखा गया था। 1,150 क्विंटल महुआ फूल की बिक्री भी की गई। आमतौर पर राज्य सरकार 10-25 रुपये प्रति किलो की दर से महुआ फूल खरीदती है। अकेले जशपुर जिले में 12,000 से 15,000 क्विंटल महुआ एकत्रित होता है। समर्थ कहते हैं, अपनी जरूरत के मुताबिक हम महुआ फूल खरीद लेते हैं। करीब 300 लोग; जिनमें महिलाएं, किसान, आदिवासी, मजदूर सभी वर्गों के लोग शामिल है; समर्थ की कंपनी के साथ जुड़कर यह काम कर रहे हैं। इनमें महुआ संग्रहण करने वालों से लेकर उत्पाद बनाने, पैकेजिंग और मार्केटिंग का काम करने वाले लोग शामिल हैं।  
अनिल कुमार राय
अनिल कुमार राय - फोटो : गांव जंक्शन
फ्रांस तक लोकप्रिय महुआ 
फ्रांस में कॉग्नैक, जापान में साके, कोरिया में सोजू तो स्कॉटलैंड की स्कॉच की तरह भारत की भी अपनी पारंपरिक शराब प्रसिद्ध है। इनमें गोवा की फेनी, केरल की टोडी, छत्तीसगढ़ की महुआ, और झारखंड व ओडिशा में प्रचलित चावल से बनी हंड़िया शामिल है। माह के नाम से बॉटलिंग कर छत्तीसगढ़ की महुआ शराब को अब वैश्विक स्तर पर बेचा जा रहा है। मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के बस्तर में मिलने वाली महुआ शराब राज्य और देश से निकलकर अब फ्रांस पहुंच चुकी है। वहीं, फ्रांस समेत अन्य देशों के लोग इसके मुरीद हो गए हैं। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक महुआ शराब अब फ्रांस में बॉटलिंग कर बेची जा रही है। फ्रांस में इसे 'माह' के नाम से बेचा जा रहा है। फ्रांस में लोग अब अंग्रेजी शराब छोड़ महुआ के दीवाने हो रहे हैं। 

महुआ से बन सकता है एथेनॉल 
रायपुर स्थित पंडित रविशंकर शुक्ला यूनिवर्सिटी के शोध में पाया गया है कि महुआ का उपयोग बॉयोफ्यूल एथेनॉल बनाने में हो सकता है। इससे संबंधित रिपोर्ट 2016 में प्रस्तुत की गई थी, जिसमें कहा गया कि फूडचेन को डिस्टर्ब किए बिना महुआ को परिष्कृत कर एथेनॉल बना सकते है। इससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।

सरकार को करनी होगी पहल
दलित आदिवासी मंच से जुड़े देवेंद्र कहते हैं, महुआ का प्रसंस्करण ठीक तरीके से किया जाए, तो सूदूर अंचलों में रहने वाले दलित, गरीब और आदिवासी लोगों को फायदा हो सकता है। राज्य में महुआ प्रोसेसिंग प्लांट लग जाए, तो बड़ी संख्या में रोजगार मिल सकता है और लोगों की आमदनी बढ़ सकती है। छत्तीसगढ़ की पूर्ववर्ती बघेल सरकार ने एथेनॉल बनाने के लिए महुआ के प्रयोग हेतु कैबिनेट से प्रस्ताव पास कर इसे हरी झंडी दे दी थी। प्राप्त सूचना के मुताबिक महुआ बोर्ड के गठन हेतु आदेश भी निकाला गया।

इन सभी तथ्यों को देखते हुए, अब यह जरूरी है कि सरकार की ओर से ठोस जमीनी पहल की जाए, ताकि महुआ संग्रहण और प्रसंस्करण से जुड़े लोगों के जीवन स्तर में सुधार हो सके। हाल में, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने महुआ उत्पादों की गुणवत्ता को काफी सराहा था। इसके बाद, उम्मीद बंधी है कि सरकार की ओर से इन उत्पादों को बाजार दिलाने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो महुआ उत्पादों की खपत बढ़ने के साथ इस क्षेत्र के लोगों की आय भी बढ़ेगी।  
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