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मुसीबत में कोंकण का राजा: कीटों और रोगों के प्रकोप से कम हो रही हापुस आम की मिठास

शिरीष खरे, ठाणे Published by: Umashankar Mishra Updated Fri, 04 Apr 2025 12:54 PM IST
सार

मौसम की मार, कर्नाटक से मिल रही चुनौती और कीटों तथा रोगों के बढ़ते प्रकोप ने 'कोंकण का राजा' कहे जाने वाले हापुस आम की दशा बिगाड़ दी है। महाराष्ट्र के इस अंचल में हापुस आम का उत्पादन करने वाले किसान अब नई समस्या से जूझ रहे हैं।

हापुस आम को कहा जाता है 'कोंकण का राजा'।
हापुस आम को कहा जाता है 'कोंकण का राजा'। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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कोंकण की पूरी अर्थव्यस्था पर्यटन के साथ खास तरह के आमों की पैदावार से चलती है। यहां का हापुस आम गुणवत्ता की हर कसौटी में आम की बाकी सभी किस्मों पर भारी पड़ता है। लिहाजा, भारतीय बाजार में सबसे पहले आने वाला यह आम बाजार में सबसे महंगा भी बिकता है। लेकिन, विदेशों में बड़े पैमाने पर निर्यात किए जाने वाला यह आम इन दिनों संकट में है। पिछले कुछ वर्षों से 'कोंकण के राजा' को मौसम के उतार-चढ़ाव का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। इसे अब कर्नाटक के आम से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है। वहीं, तरह-तरह के कीड़ों से रोगग्रस्त 'कोकण का राजा' अन्य दूसरी मुश्किलों से घिर गया है।

अल्फांसो से हापुस नाम कैसे पड़ा?
यह बात वर्ष 1510 से 1515 के बीच की है, तब अल्फोंसो डी अल्बुकर्क नामक एक पुर्तगाली वायसराय ने गोवा पर शासन किया था। वह मलेशिया से एक विशेष आम का पौधा यहां लाया। इस प्रकार के आम के कई पौधे तब स्थानीय आम के बगीचों में लगाए गए थे। ऐसा आम नया था और इस प्रकार के आम का नाम वायसराय अल्फोंसो के नाम पर रखा गया था। समय के साथ यह एपस बन गया और महाराष्ट्र आने तक हापुस बन गया। इसलिए, कई लोग इसे अल्फोंसो और कई लोग इसे हापुस नाम से जानते हैं। इसमें भी देवगढ़ का हापुस आम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यहां का हापुस आम इतनी ऊंची कीमत पर बिकता है कि गरीब आदमी सामान्यत: इसे खरीद नहीं पाता। अल्फोंसो ही हापुस है, जो बाद में गोवा से उसके नजदीकी क्षेत्र कोंकण में आकर ऐसा बसा कि आज यह यहां की पहचान बन गया है।

ऐसे फैला हापुस का राज 
कई शताब्दियों के इतिहास के बावजूद, लगभग 35-40 वर्ष पहले तक कोकण में भी इस फल की बड़े पैमाने पर खेती नहीं की जाती थी।    वर्ष 1993-94 में, रोजगार गारंटी योजना के तहत यहां बड़े पैमाने पर आमों के बाग लगाने का अभियान चलाया गया। कोंकण में हापुस आम के लिए उपजाऊ मिट्टी और अनुकूल जलवायु के कारण इसकी खेती को बढ़ावा मिला। आज अकेले रत्नागिरी जिले में 67 हजार हेक्टेयर में इसकी खेती की जाती है। रत्नागिरी के बाद कोंकण का सिंधुदुर्ग हापुस आम का प्रमुख उत्पादक जिला है, जहां 39 हजार हेक्टेयर में आम की खेती की जाती है। 

कहां से आता है मौसम का पहला आम
हापुस आम रत्नागिरी जिले की नौ तहसीलों में से राजापुर, रत्नागिरी, संगमेश्वर, गुहागर और दापोली में अधिक होता है। इसकी वजह यह है हापुस आम यहां की रेतीली या खाड़ी बेल्ट वाले क्षेत्रों और लाल मिट्टी में अच्छी तरह बढ़ता है। कोंकण के आम का मौसम आमतौर पर फरवरी से शुरू होता है और जिले के कई हिस्सों में मई के अंत तक रहता है।

भारत में जब आमों का मौसम शुरू होता है तब बाजार में सबसे पहले कोंकण का हापुस आम आता है, जिसके चलते भी इसकी मांग और कीमतें आसमान छूती हैं। रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग जिलों की सीमा पर प्रसिद्ध देवगढ़ आम सबसे पहले फरवरी-मार्च महीने में बाजार में आता है। इसलिए, इसका सीजन भी जल्दी खत्म हो जाता है। लेकिन, उसके बाद फिर रत्नागिरी तहसील में राजापुर, गावखाड़ी, पावस, गणपतिपुले, जयगढ़, संगमेश्वर, बनकोट के क्षेत्रों में आम का उत्पादन शुरू हो जाता है। वन क्षेत्रों या नदी के किनारे के क्षेत्रों - संगमेश्वर और चिपलुन के आम अप्रैल-मई में पकते हैं। इस तरह, यहां पर आम का कुल मौसम लगभग साढ़े तीन से चार महीने तक बना रहता है।

हर वर्ष यहां के इन आमों से होने वाली कुल आमदनी का 60 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी, एशियाई, यूरोपीय और अमेरिका महाद्वीपों के कई देशों को निर्यात से प्राप्त होता है। महाराष्ट्र में ही आम की दस से अधिक किस्में हैं। इनमें पायरी, गोवा मानकुर, सुवर्णरेखा, नीलम, केसर बेंगानपल्ली, हिमसागर, बनेसन और ओलूर शामिल हैं। इनमें से किसी की कीमत हापुस से ज्यादा नहीं है।

बदलते प्राकृतिक चक्र में फंसा 'राजा'
जलवायु अनुकूल होने पर ही हापुस आम की पैदावार अच्छी होती है। लेकिन, इसमें थोड़ा-सा भी फेरबदल होने पर उत्पादन की मात्रा, रूप और गुणवत्ता में अंतर आ जाता है। पिछले दस-बारह वर्षों में प्राकृतिक बदलाव का असर हापुस आम की मात्रा, रूप और गुणवत्ता पर पड़ा है।

कभी लंबा मानसून, कभी कम समय तक ठंड और कभी भीषण गर्मी से आम की यह प्रजाति झुलस रही है। हापुस आम के पेड़ को ठंडे मौसम की आवश्यकता होती है, जिसमें अच्छे फूल आने के लिए न्यूनतम तापमान लगभग 14-15 डिग्री और फल लगने के बाद आम पकने के लिए लगभग 30-35 डिग्री तापमान होना चाहिए। तापमान का यह कांटा थोड़ा भी आगे-पीछे हो जाए तो नाजुक मिजाज के 'राजा' की तबीयत बिगड़ने लगती है। ऐसे में इसकी फलियां छोटी हो जाएंगी, पेड़ से जल्दी गिर जाएंगी या फिर इसके छिलके जल जाएंगे। 

कीटों ने बढ़ाया संकट
मौसम की मार के साथ-साथ कीटों और रोगों का प्रकोप भी बढ़ गया है। इस सीजन में थ्रिप्स कीट ने यहां आम के बागों का बजट बिगाड़ दिया है। नियंत्रण के लिए दवाओं का छिड़काव बढ़ा दिया गया है, जिससे लागत बढ़ गई। लेकिन, उत्पादन में कमी आई है, जिससे किसानों को घाटा उठाना पड़ रहा है। कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन का समय कोंकण के आम उत्पादकों के लिए सबसे बुरा था। इस दौरान विदेशी विमान सेवाएं प्रभावित हुई थीं, जिससे हापुस आमों का विदेशी निर्यात रुक गया था। सबसे ज्यादा नुकसान उन उत्पादकों और कारोबारियों को हुआ था, जो सिर्फ हापुस आमों का कारोबार करते हैं और जिनकी कमाई हापुस आमों के विदेशी निर्यात से जुड़ी है।

बाजार में क्यों बढ़ी प्रतिस्पर्धा 
पिछले कुछ वर्षों में हापुस आम से कर्नाटक के आम ने बड़ी प्रतिस्पर्धा शुरू कर दी है। इसी सीजन की बात करें, तो जहां नवी मुंबई के वाशी बाजार में हापुस आम की आवक देखी गई है, वहीं कर्नाटक के आम ने भी इसी बाजार में बड़ी मात्रा में प्रवेश किया है। इसीलिए, कोंकण के हापुस आम का भाव गिर गया। ऐसे में, इस साल का पड़वा (नया साल) कोकण के आम बागवानों के लिए ज्यादा खुशियों भरा नहीं रहा। यदि मौसमी चक्र बिगड़ता रहा और अन्य कारक भी हावी रहे तो ‘कोंकण के राजा’ का भविष्य भी अस्थिर और अनिश्चित हो सकता है। 
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