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बेबी लौकी की विदेशी बाजार में मांग : कतर तक पहुंच रही उपज, इस तकनीक से बदल गई किसान की कमाई

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Thu, 08 Oct 2026 01:59 PM IST
सार

  • 500 ग्राम की बेबी लौकी की कतर में मांग, बिचौलियों के जरिए हो रहा निर्यात।
  • बेंगलुरु के किसान करिगौड़ा रोजाना करीब 1 टन लौकी की तुड़ाई करते हैं।
  • 50 रुपये किलो के भाव पर एक दिन की बिक्री करीब 50 हजार रुपये।
  • 90 दिन के सीजन में करीब 45 लाख रुपये की सकल बिक्री का अनुमान।

लौकी
लौकी - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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बेंगलुरु के एक किसान ने लौकी की खेती का ऐसा तरीका अपनाया है, जिससे उनकी उपज विदेश तक पहुंच रही है।  मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, बेंगलुरु अर्बन जिले के कारलापुरा पाल्या के किसान करिगौड़ा करीब 3.5 एकड़ में बेबी लौकी उगाते हैं। खास बात यह है कि वे लौकी को बड़ा होने देने के बजाय करीब 500 ग्राम वजन पर ही तोड़ लेते हैं। उनकी यह उपज बिचौलियों के जरिए कतर भेजी जाती है।

करिगौड़ा के मुताबिक, सितंबर से दिसंबर के बीच वे रोजाना करीब एक टन बेबी लौकी की तुड़ाई करते हैं। इसे करीब 50 रुपये किलो के भाव पर बेचते हैं। इस हिसाब से एक दिन की उपज की बिक्री करीब 50 हजार रुपये बैठती है। 90 दिन के सीजन में कुल बिक्री करीब 45 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। हालांकि, यह कुल बिक्री है, शुद्ध मुनाफा नहीं। बीज, मजदूरी, खाद, सिंचाई, खेती, तुड़ाई, पैकिंग और दूसरी लागत निकालने के बाद ही वास्तविक मुनाफा पता चलेगा।

विदेश की मांग देखकर बदली फसल
करिगौड़ा किसान परिवार से आते हैं। उनके दादा और पिता भी खेती करते थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने भी खेती को ही अपना काम चुना। परिवार पहले मक्का, टमाटर और बैंगन जैसी पारंपरिक फसलें उगाता था, लेकिन उपज का सही दाम मिलना हमेशा बड़ी चुनौती रहा।

इसी समस्या ने करिगौड़ा को खेती में प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने ऐसी सब्जियों की तलाश शुरू की, जिनकी भारत के बाहर भी मांग हो। इसी दौरान उन्हें बेबी लौकी की विदेशी बाजार में मांग के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने इसकी खेती शुरू की।

70 दिन में शुरू हो जाती है तुड़ाई
करिगौड़ा आमतौर पर जून-जुलाई में लौकी की बुवाई करते हैं। करीब 70 दिन बाद सितंबर में पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है। लौकी को पूरी तरह विकसित होने से पहले ही तोड़ लिया जाता है, ताकि उसका वजन करीब 500 ग्राम रहे।

किसान ने बताया कि वह ‘स्वीकार 045 एफ1’ किस्म की लौकी उगाते हैं। खेत से बिचौलिए सीधे उपज खरीद लेते हैं और उसे विदेश भेजने की व्यवस्था करते हैं। इससे किसान को खुद निर्यात की प्रक्रिया नहीं संभालनी पड़ती और वह केवल खेती और खरीदार की जरूरत के मुताबिक उपज तैयार करने पर ध्यान देता है।

ड्रिप और मशीनों ने खेती आसान की
करिगौड़ा के मुताबिक, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और आधुनिक कृषि मशीनों ने खेती की संभावनाएं बढ़ाई हैं। उनका मानना है कि अलग-अलग सब्जियों की खेती में प्रयोग करके किसान अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं।

बैंगन और टमाटर भी उगाते हैं
बेबी लौकी की अच्छी कमाई के बावजूद करिगौड़ा केवल एक फसल पर निर्भर नहीं हैं। वे बैंगन और टमाटर भी उगाते हैं। बैंगन को तमिलनाडु के होसुर बाजार में करीब 45 रुपये किलो के भाव पर बेचते हैं। अलग-अलग फसलों की खेती से उनकी आमदनी के स्रोत बढ़ते हैं और किसी एक फसल या बाजार पर निर्भरता कम होती है। 
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