डिजिटल खेती की योजनाओं में जमीन के मालिक किसान ही नहीं, बटाईदार, महिला किसान और खेतिहर मजदूरों को भी शामिल करने की जरूरत है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) समेत डिजिटल तकनीक खेती की उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ाने में मदद कर सकती है। लेकिन इसका वास्तविक फायदा तभी मिलेगा, जब ये तकनीकें देश के अधिकांश किसानों तक पहुंचें और खेती की रोजमर्रा की व्यवस्था का हिस्सा बनें।
बिजनेस लाइन में पब्लिश फाउंडेशन फॉर एग्रेरियन स्टडीज के सीनियर रिसर्च असिस्टेंट साई चंदन कोटू, निदेशक संदीपन बक्सी और संयुक्त निदेशक तपस सिंह मोदक की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार ने 2024 में कृषि क्षेत्र की डिजिटल पहलों को एक साथ जोड़ने के लिए डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन (DAM) शुरू किया था। इसका लक्ष्य किसान केंद्रित मजबूत डिजिटल व्यवस्था तैयार करना है। हालांकि, मिशन में किसान की परिभाषा जमीन के मालिकाना हक से जुड़ी होने पर सवाल उठ रहे हैं। इससे महिला किसानों, बटाईदार किसानों और ग्रामीण कृषि मजदूरों का बड़ा हिस्सा डिजिटल कृषि व्यवस्था से बाहर रह सकता है।
जमीन के मालिक ही किसान क्यों?
भारत की खेती में बड़ी संख्या में ऐसे लोग काम करते हैं, जिनके नाम जमीन नहीं है। उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कृषि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 42 फीसदी है। ग्रामीण महिलाओं में करीब 75 फीसदी कृषि क्षेत्र में काम करती हैं, लेकिन ग्रामीण जमीन मालिकों में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 17 फीसदी है।
बटाईदार किसान भी कृषि उत्पादन में अहम भूमिका निभाते हैं। इनमें कई किसान भूमिहीन या बहुत कम जमीन वाले होते हैं और दूसरे लोगों की जमीन पट्टे पर लेकर खेती करते हैं। जमीन उनके नाम नहीं होने के कारण वे सरकारी रिकॉर्ड में किसान के रूप में दर्ज नहीं हो पाते।
डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन में किसान की परिभाषा को जमीन के मालिकाना हक से आगे नहीं बढ़ाया गया है। राज्यों को किसानों की पहचान करने की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन इसके लिए जरूरी स्पष्ट और अनिवार्य दिशा-निर्देश नहीं हैं। इसका असर भविष्य में कृषि ऋण, सब्सिडी वाले इनपुट, सीधे खाते में मिलने वाली सरकारी सहायता और सरकारी खरीद जैसी सुविधाओं पर पड़ सकता है। यदि डिजिटल व्यवस्था में किसान की पहचान जमीन के मालिकाना हक से ही तय होती रही तो पहले से मौजूद असमानता और बढ़ सकती है।
पुरानी नीतियों में भी उठ चुका है मुद्दा
किसान की परिभाषा को व्यापक बनाने की जरूरत पहले भी कई सरकारी दस्तावेजों में बताई जा चुकी है। राष्ट्रीय कृषि नीति 2000, राष्ट्रीय किसान नीति 2007 और किसानों की आय दोगुनी करने वाली समिति की 2018 की रिपोर्ट में महिला किसानों के जमीन के अधिकार और किसान की पहचान को जमीन के मालिकाना हक से अलग करने की जरूरत पर जोर दिया गया था। इन सिफारिशों को अभी तक पूरी तरह लागू नहीं किया गया है। ऐसे में डिजिटल व्यवस्था तैयार करने से पहले इस मूल समस्या को दूर करना जरूरी है।
खेतिहर मजदूरों पर भी कम ध्यान
डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन में भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की स्थिति पर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। इनमें बड़ी संख्या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों की है। ग्रामीण इलाकों में कई मजदूर खेती के साथ दूसरे काम भी करते हैं और कुछ छोटे स्तर पर पट्टे की जमीन पर खेती भी करते हैं।
डिजिटल तकनीक और ऑटोमेशन से खेती में कुशल कामगारों की मांग बढ़ सकती है, लेकिन नियमित और कम कौशल वाले हाथ से किए जाने वाले कामों की जरूरत घट सकती है। इससे ग्रामीण रोजगार पर असर पड़ने की आशंका है। हालांकि, डिजिटल तकनीक का ग्रामीण रोजगार पर कुल प्रभाव अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इसलिए डिजिटल खेती के साथ नए कौशल का प्रशिक्षण और वैकल्पिक रोजगार के अवसर तैयार करने की जरूरत है। लेख के मुताबिक, मौजूदा मिशन में ऐसे बदलावों से प्रभावित होने वाले मजदूरों की मदद के लिए कोई स्पष्ट संस्थागत व्यवस्था नहीं है।
ग्रामीण महिलाओं की डिजिटल पहुंच भी कम
डिजिटल खेती का फायदा उठाने के लिए स्मार्टफोन, इंटरनेट और डिजिटल जानकारी जरूरी है। लेकिन ग्रामीण भारत में इन सुविधाओं की पहुंच अभी सीमित है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) के 2025 के Comprehensive Modular Survey के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार, ग्रामीण वयस्कों में करीब आधे लोगों ने बताया कि उनके पास स्मार्टफोन है और उनके घर में इंटरनेट की सुविधा भी उपलब्ध है।
ग्रामीण महिलाओं की स्थिति इससे भी कमजोर है। एक-तिहाई से कुछ अधिक ग्रामीण वयस्क महिलाएं ही ऐसे घरों में रहती हैं जहां इंटरनेट उपलब्ध है और उनके पास स्मार्टफोन है। यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खेती में महिलाओं की भागीदारी काफी ज्यादा है।
डिजिटल साक्षरता भी बड़ी चुनौती
सिर्फ स्मार्टफोन और इंटरनेट होना पर्याप्त नहीं है। डिजिटल तकनीक का सही इस्तेमाल करने के लिए डिजिटल साक्षरता भी जरूरी है। अगर डिजिटल साक्षरता को कंप्यूटर और इंटरनेट चलाने की सामान्य क्षमता से मापा जाए तो तस्वीर बेहतर दिखाई देती है। लेकिन इंटरनेट का इस्तेमाल जानकारी हासिल करने के लिए करने की क्षमता को आधार बनाया जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग अभी भी डिजिटल रूप से सक्षम नहीं हैं। आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण वयस्कों में करीब आधे लोग इंटरनेट का इस्तेमाल सूचना हासिल करने के लिए नहीं कर पाते। महिलाओं और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों में यह समस्या और ज्यादा है।
डिजिटल खेती के साथ सुरक्षा और रोजगार पर भी ध्यान जरूरी
डिजिटल कृषि से किसानों को मौसम, बाजार भाव, फसल प्रबंधन, ऋण और सरकारी योजनाओं की जानकारी तेजी से मिल सकती है। लेकिन इसके लिए यह जरूरी है कि किसान डिजिटल व्यवस्था में शामिल हों और उसका इस्तेमाल कर सकें। इसलिए डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन को केवल तकनीक और डिजिटल बुनियादी ढांचे तक सीमित रखने के बजाय महिला किसानों, बटाईदारों, भूमिहीन मजदूरों, डिजिटल रूप से कमजोर ग्रामीण परिवारों और रोजगार पर पड़ने वाले असर को भी ध्यान में रखना होगा।
डिजिटल कृषि के लिए राष्ट्रीय नीति को खेती के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसके लंबे समय के असर को भी ध्यान में रखना चाहिए। तभी डिजिटल तकनीक का लाभ व्यापक स्तर पर किसानों और ग्रामीण आबादी तक पहुंच सकेगा।
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