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पर्दे का ‘नाना’ खेतों में भी था अपना: उगाते थे आलू-बैंगन... किसानों के दर्द से था गहरा रिश्ता

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Thu, 08 Oct 2026 01:07 PM IST
सार

  • नाना पाटेकर का किसानों और खेती से गहरा जुड़ाव रहा।
  • किसानों की मदद के लिए मकरंद अनासपुरे के साथ ‘नाम फाउंडेशन’ की शुरुआत की।
  • महाराष्ट्र के ग्रामीण और किसान परिवारों के लिए संस्था ने काम किया।
  • पुणे के पास फार्महाउस में आलू, बैंगन, धान, गेहूं और चना जैसी फसलें उगाई जाती थीं।

पर्दे का ‘नाना’ खेतों में भी था अपना
पर्दे का ‘नाना’ खेतों में भी था अपना - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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फिल्मी पर्दे पर अपनी दमदार आवाज और बेबाक अंदाज से पहचान बनाने वाले नाना पाटेकर का 75 साल की उम्र में निधन हो गया। गोवा में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके जाने से फिल्म जगत में शोक है, लेकिन नाना की जिंदगी का एक ऐसा पक्ष भी रहा, जो गांव, खेत और किसानों से जुड़ा था। वह सिर्फ पर्दे पर किरदार निभाने वाले अभिनेता नहीं थे, बल्कि किसानों की जिंदगी और उनकी परेशानियों को करीब से समझने की कोशिश करने वाले इंसान भी थे।

महाराष्ट्र के किसान परिवारों की मुश्किलों ने नाना को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने किसानों की मदद के लिए सिर्फ आर्थिक सहयोग नहीं किया, बल्कि उनके बीच जाकर उनकी परेशानियां समझीं। बाद में इसी सोच को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाने के लिए ‘नाम फाउंडेशन’ की शुरुआत हुई। अभिनेता मकरंद अनासपुरे भी इस पहल से जुड़े। संस्था ने महाराष्ट्र के ग्रामीण और किसान परिवारों के लिए काम किया।

मुंबई की चकाचौंध से दूर खेतों में बिताते थे वक्त
नाना पाटेकर का खेती से रिश्ता सिर्फ किसानों की मदद करने तक सीमित नहीं था। वह खुद भी खेती में दिलचस्पी रखते थे। पुणे के पास खड़कवासला इलाके के डोणजे गांव में उनके फार्महाउस का जिक्र मिलता है। बताया जाता है कि यहां आलू, बैंगन, धान, गेहूं और चना जैसी फसलें उगाई जाती थीं। खेत में गाय, बैल, बकरियां और मुर्गियां भी पाली जाती थीं। फार्म पर उगाई गई सब्जियों का इस्तेमाल उनके खाने में भी होता था।

फिल्मी दुनिया की चकाचौंध से दूर खेतों का यह जीवन शायद नाना के उस रूप को सामने लाता है, जिसे कम लोग जानते थे। मिट्टी, फसल, पशु और गांव का यह माहौल उनके लिए सिर्फ फार्महाउस की सजावट नहीं था।

किसान सिर्फ अनाज नहीं उगाता, पूरे देश का पेट भरता है
नाना पाटेकर कई मौकों पर किसानों की स्थिति और उनकी आमदनी को लेकर खुलकर बोलते रहे। द लल्लनटॉप को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि किसान बहुत ज्यादा कुछ नहीं मांगता। वह सिर्फ अपनी मेहनत की सही कीमत चाहता है।

उनकी बात में किसान की पूरी जिंदगी की तस्वीर दिखाई देती थी। किसान खुले आसमान के नीचे फसल तैयार करता है। कभी मौसम की मार झेलता है, कभी पशुओं से फसल बचाता है और कभी बाजार में अपनी उपज की सही कीमत के लिए इंतजार करता है। इसके बाद वही अनाज शहरों और घरों की रसोई तक पहुंचता है। नाना का सवाल सीधा था- जब किसान इतनी मेहनत करता है तो उसकी फसल की कीमत तय करते समय उसकी मेहनत की कीमत क्यों नहीं जुड़ती?

डेढ़ करोड़ की कार नहीं खरीदी, किसान परिवारों को बांट दिए पैसे
किसानों के प्रति नाना की संवेदनशीलता सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं थी। लेखक रणबीर पुष्प के मुताबिक, एक समय नाना करीब डेढ़ करोड़ रुपये की कार खरीदने वाले थे। इसी दौरान उन्होंने टीवी पर किसान आत्महत्या से प्रभावित परिवारों की हालत देखी। परिवारों की परेशानी देखकर उन्होंने कार खरीदने का फैसला बदल दिया। उन्होंने उस पैसे को जरूरतमंद किसान परिवारों की मदद में लगाने का फैसला किया। नाना ने अपने एक कलाकार दोस्त के साथ मिलकर 15-15 हजार रुपये के चेक बनवाए और किसान परिवारों में बांटे।

लेकिन नाना यहीं नहीं रुके। उन्हें लगा कि कुछ परिवारों को पैसे देने से समस्या खत्म नहीं होगी। किसानों और ग्रामीण परिवारों को लंबे समय तक सहारा देने के लिए काम करना होगा। इसी सोच ने आगे चलकर नाम फाउंडेशन की नींव मजबूत की।

खेतों में जाकर किसानों का दर्द समझा
नाना सूखे से प्रभावित इलाकों में भी गए। उन्होंने किसान परिवारों से मुलाकात की और उनकी परेशानियों को करीब से देखा। उनका मानना था कि किसान को सिर्फ एक बार आर्थिक मदद देने के बजाय ऐसा सहारा दिया जाना चाहिए, जिससे वह दोबारा अपने पैरों पर खड़ा हो सके। किसानों की आत्महत्या को लेकर भी वह लगातार चिंतित रहे। वह किसानों से मुश्किल समय में हिम्मत न हारने और आत्मघाती कदम न उठाने की अपील करते थे। उनके लिए किसान सिर्फ आंकड़ा नहीं था, बल्कि एक परिवार, एक घर और कई लोगों की उम्मीद था।

किसान से रिश्ता दिल का था
नाना कई बार खुद को किसान कहने में गर्व महसूस करने की बात कह चुके थे। खेत की उपज से होने वाली कमाई को वह अपने साथ काम करने वाले किसानों के साथ साझा करते थे। उनके लिए खेती कोई फैशन या शौक नहीं थी। पर्दे पर उन्होंने कई किरदार निभाए, लेकिन असल जिंदगी में किसानों के साथ खड़ा होना उनके व्यक्तित्व का ऐसा पक्ष था, जिसे कैमरे की जरूरत नहीं थी।

नाना पाटेकर की आवाज अब खामोश हो गई है, लेकिन किसानों के हक, उनकी मेहनत और उनके सम्मान की बात करने वाली उनकी आवाज लंबे समय तक याद की जाएगी। फिल्मी दुनिया उन्हें एक बेहतरीन अभिनेता के तौर पर याद करेगी, वहीं गांव और किसान शायद उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में याद करेंगे, जो खेत की मेड़ तक पहुंचा, किसान के घर बैठा और उसके दर्द को समझने की कोशिश की।
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