भारत में किसानों की आय और फसलों की कीमतों को लेकर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की चर्चा होती रही है, लेकिन पशुपालक अब भी इस सुरक्षा दायरे से बाहर हैं। सरकार 22-23 प्रमुख फसलों के लिए MSP घोषित करती है, लेकिन दूध, मांस और अंडे की कीमतों के लिए कोई तय न्यूनतम मूल्य नहीं है। बिजनेस लाइन में पब्लिश गोकारिन के संस्थापक और सीईओ रामानुज पांडा की रिपोर्ट के अनुसार, पशुपालन क्षेत्र के बढ़ते महत्व को देखते हुए अब इस दिशा में भी नीति बनाने की जरूरत है।
2023-24 में पशुधन क्षेत्र का कृषि जीवीए में करीब 31 फीसदी योगदान रहा। पशुपालन और डेयरी विभाग के अनुसार देश के 60 फीसदी से अधिक ग्रामीण परिवार अपनी आजीविका के लिए किसी न किसी रूप में पशुपालन पर निर्भर हैं।
उत्पादन बढ़े तो कीमत गिरने का खतरा
पशुपालकों के सामने सबसे बड़ी समस्या तब आती है, जब उत्पादन अच्छा होने के बावजूद बाजार में कीमतें गिर जाती हैं। दूध या अन्य पशु उत्पादों की आपूर्ति बढ़ने पर बाजार में अतिरिक्त माल यानी ग्लट की स्थिति बन सकती है। ऐसे में खरीद मूल्य उत्पादन लागत से भी नीचे चला जाए तो छोटे पशुपालकों की मुश्किल बढ़ जाती है।
इसका असर केवल आय घटने तक सीमित नहीं रहता। गंभीर स्थिति में किसान अपने दूध देने वाले या प्रजनन योग्य पशु तक बेचने को मजबूर हो सकते हैं। इसके बाद दोबारा पशु खरीदने के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ सकता है।
दूध के लिए पारंपरिक MSP आसान नहीं
सवाल उठता है कि कीमत बाजार पर ही क्यों न छोड़ दी जाए? डेयरी और पोल्ट्री क्षेत्र में सहकारी समितियों और निजी कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा से काफी विकास हुआ है। लेकिन क्षेत्र का विकास और छोटे उत्पादकों को कीमत गिरने से बचाना अलग-अलग मुद्दे हैं।
दूध के मामले में अनाज की तरह पारंपरिक MSP व्यवस्था लागू करना आसान नहीं है। कच्चे दूध को जल्दी एकत्र कर ठंडा करना जरूरी होता है। अतिरिक्त दूध को लंबे समय तक रखने के लिए प्रसंस्करण संयंत्र, पैसा और तैयार बाजार की जरूरत होती है। इसलिए बड़ी मात्रा में दूध खरीदकर रखने वाली सरकारी व्यवस्था बनाना महंगा और मुश्किल हो सकता है।
कीमत गिरने पर सीधे मिले अंतर की रकम
ऐसे में ‘प्राइस डेफिशिएंसी पेमेंट’ यानी मूल्य अंतर भुगतान एक विकल्प हो सकता है। इसके तहत अगर बाजार में दूध की कीमत तय सीमा से नीचे चली जाती है तो पात्र पशुपालकों को बाजार मूल्य और तय सीमा के बीच का अंतर सरकार की ओर से दिया जा सकता है।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी क्षेत्र में तय समर्थन सीमा 40 रुपये प्रति लीटर है और बाजार में दूध 34 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है, तो पात्र पशुपालक को दोनों कीमतों के बीच का अंतर यानी 6 रुपये प्रति लीटर दिया जा सकता है। इससे सरकार को बड़ी मात्रा में दूध खरीदकर रखने की जरूरत नहीं होगी और पशुपालक को कीमत गिरने से कुछ राहत मिल सकेगी।
डेयरी सहकारी समितियों का लिया जा सकता है सहारा
भारत में इस व्यवस्था के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा पहले से मौजूद है। देश में डेयरी सहकारी समितियों का बड़ा नेटवर्क है। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) और राज्यों की सहकारी डेयरी संस्थाओं के पास किसानों से दूध खरीदने और भुगतान करने की व्यवस्था पहले से है। ऐसे में नई खरीद व्यवस्था खड़ी करने के बजाय मौजूदा सहकारी ढांचे का इस्तेमाल कर कीमतों में भारी गिरावट के समय पशुपालकों को राहत देने की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।
छोटे और भूमिहीन पशुपालकों को ज्यादा फायदा
पशुपालन उन छोटे और भूमिहीन परिवारों के लिए खास महत्व रखता है, जिनके पास खेती के लिए पर्याप्त जमीन नहीं है। ऐसे परिवार एक-दो दूध देने वाले पशु पालकर भी नियमित आमदनी हासिल कर सकते हैं। पशु उनके लिए आय का साधन होने के साथ एक संपत्ति भी होता है। इसलिए दूध की कीमतों में अचानक बड़ी गिरावट का असर ऐसे परिवारों पर ज्यादा पड़ सकता है। लक्षित आय सुरक्षा व्यवस्था से इन छोटे पशुपालकों को ज्यादा मदद मिल सकती है।
पहले कुछ क्षेत्रों में हो प्रयोग
विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार पूरे देश में तुरंत दूध के लिए कानूनी MSP लागू करने के बजाय पहले कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में प्रयोग कर सकती है। खासकर उन इलाकों में जहां दूध का उत्पादन ज्यादा होने पर कीमतों में तेज गिरावट आती है, वहां मूल्य अंतर भुगतान योजना का परीक्षण किया जा सकता है।
इसके साथ ही पशुधन की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव पर नजर रखने के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) जैसी व्यवस्था बनाने पर भी विचार किया जा सकता है। इससे सरकार को पशुपालकों की लागत, बाजार भाव और कीमतों में उतार-चढ़ाव की नियमित जानकारी मिल सकेगी।
पशुधन पहले ही देश की कृषि अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। अब जरूरत ऐसी नीति आजमाने की है, जो दूध और पशु उत्पादों की कीमतों में भारी गिरावट से छोटे पशुपालकों को बचाए, लेकिन सरकार पर बहुत अधिक आर्थिक बोझ भी न डाले।
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