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बैम्बू की बदलती कहानी: हरे तनों से हरित उद्यमों तक आजीविका के अवसर, गांवों की तरक्की का माध्यम बन रहा बांस

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 12 Sep 2026 07:19 PM IST
सार

वर्ष 2017 के ऐतिहासिक सुधार के बाद बांस कैसे भारत में आजीविका, महिला सशक्तिकरण और उद्यमिता में नए बदलावों का जरिया बन गया है - असम, सिक्किम, त्रिपुरा, नगालैंड, मिजोरम, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की कहानियों के साथ पढ़ें यह प्रेरक रिपोर्ट...

उत्पादों की विविधता से आगे बढ़कर बांस की मूल्य शृंखला भी लगातार फैल रही है, और इसमें महिलाओं के समूह अहम भागीदार बनकर उभरे हैं।
उत्पादों की विविधता से आगे बढ़कर बांस की मूल्य शृंखला भी लगातार फैल रही है, और इसमें महिलाओं के समूह अहम भागीदार बनकर उभरे हैं। - फोटो : AI Image
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विस्तार
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गुरुग्राम में आयोजित सरस आजीविका मेले के एक स्टॉल पर रखा बांस का थैला देखने में भले ही साधारण लगे, पर उसके पीछे छिपी कहानी असाधारण है। यह कहानी है असम की विशाखा दीदी की, जिन्होंने 2014 में यह थैला बनाया था। स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने अपने ससुर के पुराने बांस शिल्प उद्यम को नए डिजाइनों के साथ फिर से जीवंत किया।

सरकारी सहयोग और प्रदर्शनियों ने उन्हें बड़े बाज़ारों तक पहुंचाया, और 2025 में भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में हिस्सा लेकर उन्होंने बांस उत्पादों की बिक्री से 2 लाख रुपये कमाए। यह सफर बताता है कि किस तरह एक स्थानीय शिल्प, सही मौका मिलने पर, फलता-फूलता उद्यम बन सकता है।

जब कानून बना रुकावट, और सुधार बना रास्ता
पीढ़ियों से बांस देश के कई समुदायों की पारंपरिक आजीविका का हिस्सा रहा है, लेकिन एक पुराना नियम इसकी असली आर्थिक ताकत को दबाए हुए था। अंग्रेज़ों के ज़माने के एक कानून में बांस को पेड़ माना जाता था, जिससे इसे काटना और एक जगह से दूसरी जगह ले जाना बेवजह मुश्किल हो गया था।

वर्ष 2017 में सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए बांस को इस दायरे से बाहर निकाला और इसे वन कानूनों की सख्ती से मुक्त कर दिया। इस दूरदर्शी फैसले ने बांस क्षेत्र में नवाचार, उद्यमिता और मूल्यवर्धन के लिए नए रास्ते खोल दिए। आज इसका असर पूरे देश में, खासकर पूर्वोत्तर भारत में, साफ नज़र आता है, जहां बांस रोज़गार, कारोबार और नए विचारों को गति दे रहा है।

डिजाइन से तकनीक तक, हर राज्य की कहानी
सिक्किम के गंगटोक के पास फैशन डिजाइनर और सतत विकास की पैरोकार चिमी ओंगमु भूटिया का लगस्टल डिज़ाइन स्टूडियो इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। महिलाओं द्वारा संचालित यह उद्यम बांस से हस्तशिल्प, अगरबत्ती, फर्नीचर और सजावटी वस्तुएं बनाता है, जहां बांस पारंपरिक शिल्प से आगे बढ़कर समकालीन डिज़ाइन का हिस्सा बन रहा है।

चिमी की कहानी अकेली नहीं है। त्रिपुरा में बिजय सूत्रधार ने बांस उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने के लिए तकनीक अपनाई। नगालैंड के दीमापुर के आसपास स्वयं सहायता समूह बांस से बने खाद्य उत्पादों में मूल्यवर्धन कर रहे हैं, वहीं खोरोलो क्रिएटिव क्राफ्ट्स जैसे स्थानीय उद्यम फर्नीचर और हस्तशिल्प बना रहे हैं।

मिजोरम के मामित जिले में टीमें बांस के ऊतक संवर्धन (टिशू कल्चर) और पॉलीहाउस प्रबंधन के ज़रिए वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दे रही हैं। ये सब उदाहरण बताते हैं कि बांस क्षेत्र अब पहले से कहीं ज़्यादा विविध, नवोन्मेषी और मूल्य-आधारित बनता जा रहा है।

जहां खेत भी है और भविष्य भी
इतने बड़े पैमाने पर बदलाव लाने के लिए सिर्फ कुशल कारीगर काफी नहीं होते; इसके लिए तकनीक, प्रसंस्करण सुविधाएं, प्रशिक्षण और मज़बूत बाज़ार संपर्क भी ज़रूरी होते हैं। यहीं सरकारी योजनाएं निर्णायक भूमिका निभाती हैं। राष्ट्रीय बांस मिशन बांस किसानों, निर्माताओं और विक्रेताओं के लिए खेती, प्रसंस्करण और बाज़ार तक पहुंच पर काम करता है, साथ ही अच्छी गुणवत्ता की रोपण सामग्री के लिए नर्सरियों को भी सहयोग देता है।

मध्य प्रदेश के विजय पाटीदार इसकी एक जीवंत मिसाल हैं। पारंपरिक खेती में लगातार नुकसान झेलने के बाद उन्होंने 2019 में बांस मिशन के सहयोग से करीब 4,000 बांस के पौधे लगाए। दो साल के भीतर बांस की बल्लियां बेचकर उन्होंने लगभग 75,000 रुपये कमाए। साथ ही, बांस के बीच मिर्च, शिमला मिर्च, अदरक और लहसुन जैसी अंतर्फसलें उगाकर उन्होंने अपनी आय के और रास्ते भी खोले। उनका अनुभव दिखाता है कि बांस कैसे तात्कालिक फसल के साथ-साथ दीर्घकालिक आजीविका का ज़रिया भी बन सकता है।

पारंपरिक सामग्री बदलती है निर्माण की तस्वीर
नॉर्थ ईस्ट सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी एप्लीकेशन एंड रीच (एनईसीटीएआर) ने खाद्य और कृषि-प्रसंस्करण, निर्माण सामग्री, मशीनरी, नवीकरणीय ऊर्जा और औद्योगिक उत्पादों जैसे कई क्षेत्रों में बांस तकनीकों को समर्थन दिया है। इन प्रयासों से हर साल लगभग 3 करोड़ मानव-दिवस रोजगार पैदा हुआ है, और बांस उत्पादों में मूल्यवर्धन 10 प्रतिशत से बढ़कर 70 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

इंजीनियर्ड बांस इसका सबसे उल्लेखनीय उदाहरण है। कच्चे बांस के रेशों, पट्टियों या कणों को बांधकर और संपीड़ित करके तैयार की गई यह मिश्रित सामग्री अब निर्माण क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल रही है। इससे बना फर्नीचर वास्तुकारों, डिजाइनरों और इंटीरियर डेकोरेटरों का ध्यान खींच रहा है। नतीजतन, आपदा राहत और पुनर्वास कार्यों के लिए 42 लाख वर्ग फुट से ज़्यादा इंजीनियर्ड बांस संरचनाएं बनाई जा चुकी हैं, और छत्तीसगढ़ में लगभग 20,000 बच्चों के लिए 576 स्कूल कक्ष इंजीनियर्ड बांस से तैयार किए गए हैं।

अगरबत्ती की खुशबू में महिलाओं की मेहनत
उत्पादों की विविधता से आगे बढ़कर बांस की मूल्य शृंखला भी लगातार फैल रही है, और इसमें महिलाओं के समूह अहम भागीदार बनकर उभरे हैं। महाराष्ट्र के गढ़चिरोली में इसकी झलक साफ दिखती है। गढ़चिरोली अगरबत्ती परियोजना (जीएपी) नाम की इस बांस आधारित पहल ने 2012 में ज़िले भर में उत्पादन केंद्र शुरू किए। 2020 तक इनकी संख्या 32 हो चुकी थी, जहां करीब 1,100 लोग काम कर रहे थे और इनमें से लगभग 90 प्रतिशत महिलाएं थीं।

हर महिला की मासिक आय करीब 5,000 रुपये तक पहुंची, और सालाना रोज़गार के दिन भी 45-60 दिनों से बढ़कर 225 दिनों से ज़्यादा हो गए। काम घर के नज़दीक और शारीरिक रूप से कम थकाऊ हो गया। महिलाओं को नए हुनर, आत्मविश्वास और नेतृत्व के मौके मिले, और आय के लिए जंगलों पर निर्भरता भी घटी।

प्रशिक्षण से मिलती है नई दिशा
ऐसी कहानियां सरकार के निरंतर क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण प्रयासों की बदौलत ही संभव हो पाई हैं। सीएसआईआर-राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-एनईआरआई), नागपुर ने जून 2026 में महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए बांस हस्तशिल्प पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया, जिसका विषय था "फ्लाई ऐश डंप पर उगाए गए बांस से बने हस्तशिल्प के माध्यम से महिला स्वयं सहायता समूहों का सशक्तिकरण"।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में बांस की कटाई, उपचार और प्रसंस्करण से लेकर हस्तशिल्प उत्पादन, मूल्यवर्धित उत्पाद विकास, उद्यमिता, ब्रांडिंग, विपणन और उत्पाद डिज़ाइन तक व्यावहारिक कौशल सिखाए गए। इस पहल ने यह भी दिखाया कि पुनर्प्राप्त फ्लाई ऐश डंप स्थलों को कैसे उत्पादक परिदृश्यों में बदला जा सकता है, जिससे स्थानीय समुदायों को पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक, दोनों तरह के लाभ मिलते हैं।

तने की कहानी, जिंदगियों का बदलाव
बांस की कहानी अब सिर्फ लोगों, संभावनाओं और बदलाव की कहानी बनती जा रही है। देश भर में यह आजीविका, उद्यम और टिकाऊ अवसर गढ़ रहा है। इसलिए भारत में बांस की कहानी अब सिर्फ इस बारे में नहीं रह गई कि बांस से क्या बनाया जा सकता है, बल्कि इस बारे में है कि जब एक पारंपरिक संसाधन तकनीक, उद्यम और अवसर से जुड़ता है, तो समुदाय क्या बन सकते हैं।

एक पुराने कानून की बेड़ियों से आज़ाद हुआ बांस अब असम से मिज़ोरम तक लाखों लोगों की आजीविका, उद्यमिता और सतत विकास का आधार बन चुका है। राष्ट्रीय बांस मिशन, इंजीनियर्ड बांस तकनीक और महिला स्वयं सहायता समूहों की मेहनत ने इसे पारंपरिक शिल्प से आधुनिक उद्योग तक पहुंचाया है।
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