भारतीय कृषि के कायापलट की कहानी : मिट्टी से मशीन और सौर पंप से डिजिटल पहचान तक, किसान के हाथ में अब नई ताकत
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Wed, 12 Aug 2026 09:10 PM IST
सार
बीते एक दशक में भारत की कृषि अर्थव्यवस्था ने अनाज उत्पादन, किसान आय, डेयरी-मत्स्य पालन और डिजिटल तकनीक के मोर्चे पर ऐसी छलांग लगाई है, जिसने खेतों की तस्वीर और किसान की जिंदगी, दोनों को बदल डाला है।
कभी बरसात के भरोसे रहने वाली भारत की खेती आज तकनीक, बीमा, बाजार और डिजिटल पहचान के सहारे नई मजबूती हासिल कर रही है।
- फोटो : गांव जंक्शन
किसी देश की असली नब्ज उसके खेतों में धड़कती है। भारत में आज भी हर दूसरा हाथ किसी न किसी रूप में मिट्टी से जुड़ा है। करीब 46.1 प्रतिशत कार्यबल को अपनी रोजी-रोटी खेती और खेती से जुड़े कामों से मिलती है। पिछले एक दशक में यही खेत, यही मिट्टी, चुपचाप बड़ी करवट ले चुकी है। जो कृषि कभी मानसून के भरोसे टिकी रहती थी, वह आज तकनीक, बीमा, बाजार और डिजिटल पहचान के सहारे नई मजबूती हासिल कर रही है।
जब आंकड़े खुद बयां करने लगें कहानी
संख्याएं अक्सर उबाऊ लगती हैं, पर कभी-कभी वे ही सबसे ईमानदार कहानीकार होती हैं। 2014-15 में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों का कुल बाजार मूल्य 20.94 लाख करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में करीब ढाई गुना बढ़कर 52.08 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।
कृषि मंत्रालय का बजट भी 27,663 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,40,528.78 करोड़ रुपये हो गया — यानी पांच गुना से भी ज्यादा। नतीजा सामने है: अनाज उत्पादन 265 मिलियन टन से बढ़कर 376.56 मिलियन टन, बागवानी उत्पादन 280.70 से 377.78 मिलियन टन और तिलहन उत्पादन 27.51 से 43.06 मिलियन टन तक जा पहुंचा।
किसान की जेब तक पहुंची राहत
सिर्फ उत्पादन बढ़ने से किसान की मुस्कान नहीं लौटती, बल्कि उसके लिए चाहिए सीधी, भरोसेमंद मदद, जिसकी बानगी हाल के वर्षों में कुछ इस तरह देखने को मिलती है:
पीएम-किसान योजना के तहत अब तक 23 किस्तों में किसानों के खातों में 4.47 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा सीधे भेजे जा चुके हैं, जिसमें सिर्फ आखिरी किस्त में 9.49 करोड़ किसानों को 18,984 करोड़ रुपये मिले।
फसल बीमा योजना ने भी वर्ष 2016 से अब तक 92.46 करोड़ आवेदनों पर बीमा किया और 24.31 करोड़ किसानों को 1.96 लाख करोड़ रुपये के दावे लौटाए।
धान का समर्थन मूल्य 1,400 से बढ़कर 2,461 रुपये और गेहूं का 1,400 से 2,585 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया।
वर्ष 2004-2014 के दशक में कुल 7.41 लाख करोड़ रुपये की फसल खरीद हुई, जो बढ़कर 2014-2026 में 26.32 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई।
टिकाऊ खेती की ओर बढ़े कदम
खेत की सेहत जांचने के लिए अब तक 26.09 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड बांटे जा चुके हैं, और 70,002 से अधिक कृषि सखियां किसानों को सही सलाह देने के लिए प्रशिक्षित की गई हैं।
परंपरागत कृषि विकास योजना ने 18.93 लाख हेक्टेयर में 33.63 लाख किसानों को जैविक खेती से जोड़ा है, तो राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के 18,893 क्लस्टरों ने 20.93 लाख किसानों को अपने दायरे में लिया।
पीएम कुसुम योजना के तहत 11.49 लाख सौर पंप खेतों में लग चुके हैं, जिनसे 21.77 लाख से ज्यादा किसान लाभान्वित हुए हैं - यानी सूरज सिर्फ फसल नहीं पकाता, बिजली भी देता है।
डिजिटल पहचान से लैस हुआ किसान
बदलाव सिर्फ खेत तक नहीं रुका, वह किसान की जेब में मौजूद मोबाइल तक भी पहुंच गया।
डिजिटल कृषि मिशन के तहत अब तक 10.31 करोड़ से ज्यादा किसान पहचान पत्र बन चुके हैं।
डिजिटल फसल सर्वेक्षण ने 648 जिलों के 31.3 करोड़ भूखंडों को कवर कर लिया है।
राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली आज 10,000 से ज्यादा कार्यकर्ताओं के जरिए 73 फसलों और 436 कीटों पर सलाह दे रही है।
भारत विस्तार प्लेटफॉर्म ने 72 लाख से अधिक किसानों के सवालों के जवाब दिए हैं।
दूध, अंडा और मछली - खेत के आगे की दुनिया
खेती अकेली कहानी नहीं है, बल्कि इसके साथ चल रहा है पशुधन, डेयरी और मत्स्य पालन का शांत मगर मजबूत सफर।
पशुधन क्षेत्र ने बीते दशक में 12.77 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर हासिल की है। गाय के दूध की उत्पादकता 1,648 से बढ़कर 2,251 किलोग्राम प्रति पशु सालाना हो गई।
भारत आज दुनिया के कुल दूध उत्पादन का करीब 25 प्रतिशत अकेले पैदा करता है और प्रति व्यक्ति रोजाना 485 ग्राम दूध उपलब्ध है, जो वैश्विक औसत 394 ग्राम से भी ज्यादा है।
अंडा उत्पादन में 90 प्रतिशत और मांस उत्पादन में भी बड़ी बढ़त दर्ज हुई है, जिससे भारत अंडे में दुनिया में दूसरे और मांस में चौथे स्थान पर पहुंच गया।
वर्ष 2013-14 में जहां देश में 95.79 लाख टन मछली उत्पादन होता था, वह 2024-25 में 197.75 लाख टन तक पहुंच गया - यानी दोगुने से भी ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई है।
समुद्री खाद्य निर्यात 3.64 अरब डॉलर से बढ़कर 8.46 अरब डॉलर हो गया।
पशुओं की सेहत का ख्याल रखने के लिए 4,019 मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयां आज गांव-गांव पहुंचकर 119.77 लाख किसानों के 245.05 लाख पशुओं का इलाज कर चुकी हैं।
दुनिया के बाजार में भारत की मजबूत पकड़
इस पूरी यात्रा का असर सीमाओं के पार भी दिखा। कृषि निर्यात 2014-15 के 32.08 अरब डॉलर से बढ़कर 2025-26 में 54.70 अरब डॉलर हो गया, यानी करीब 70.5 प्रतिशत की वृद्धि। प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों का निर्यात में हिस्सा 13.7 से बढ़कर 20.4 प्रतिशत हो गया। प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना के तहत बने 1,256 प्रोजेक्ट्स ने करीब 37.76 लाख किसानों को फायदा पहुंचाया और 9.16 लाख नए रोजगार भी पैदा किए हैं।
यह सिर्फ आंकड़ों की फेहरिस्त नहीं, बल्कि उस बदलाव की झलक है, जो चुपचाप, पर लगातार, भारत के खेत-खलिहानों में उतर रहा है, जहां आज किसान के पास सिर्फ बीज-खाद नहीं, बल्कि पहचान, बीमा, बाजार और तकनीक, चारों साथ मौजूद हैं।
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