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क्लाइमेट स्मार्ट गांव: झारखंड में हरित ऊर्जा और आत्मनिर्भरता की नई इबारत

जेब अख्तर (वरिष्ठ पत्रकार), रांची Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 27 Dec 2025 01:30 PM IST
सार

क्लाइमेट स्मार्ट गांव सिर्फ एक परियोजना नहीं है, बल्कि यह ऐसी सोच है, जिसमें गांव का हर व्यक्ति परिवर्तन का हिस्सा बनता है। यह पहल पर्यावरण की रक्षा करते हुए गांवों को आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत बनाने में अपना बड़ा योगदान दे रही है।

झारखंड सरकार ने 100 गांवों को एग्री स्मार्ट विलेज बनाने का लक्ष्य तय किया है।
झारखंड सरकार ने 100 गांवों को एग्री स्मार्ट विलेज बनाने का लक्ष्य तय किया है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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झारखंड की विकास यात्रा में 16 सितंबर 2025 को राज्य के खूंटी जिले के तोरपा प्रखंड के कोचा खास गांव ने एक नई कहानी जोड़ दी है। यहां समुदाय आधारित क्लाइमेट स्मार्ट गांव नामक पहल की शुरुआत हुई है। यह एक ऐसी पहल है, जो पर्यावरण संरक्षण, सतत आजीविका और स्थानीय भागीदारी के संतुलन को दर्शाती है। यह न केवल जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की चुनौतियों का जवाब है, बल्कि ग्रामीण आत्मनिर्भरता की दिशा में एक व्यावहारिक कदम भी है।

100 एग्री स्मार्ट विलेज बनाने का लक्ष्य 
झारखंड की ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री दीपिका पांडे सिंह ने इस पहल को स्थानीय समाधान की वैश्विक मिसाल बताया है। दीपिका पांडे सिंह ने कहा, क्लाइमेट स्मार्ट गांव सिर्फ एक परियोजना नहीं है, बल्कि यह एक सोच है, जिसमें गांव का हर व्यक्ति परिवर्तन का हिस्सा बनता है। यह पहल पर्यावरण की रक्षा करते हुए गांवों को आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत बनाती है। 

झारखंड सरकार ने 100 गांवों को एग्री स्मार्ट विलेज बनाने का लक्ष्य तय किया है। इन गांवों में आधारभूत संरचना का विकास होगा। यहां सभी सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाएगा। मकसद यह है कि गांव के विकास से ही राज्य की सूरत बदली जा सकती है। मंत्री ने कहा कि झारखंड की महिलाएं आज समूह बनाकर संगठित हो रही हैं और अपनी आजीविका को सशक्त बना रही हैं। हमारा लक्ष्य है कि हर गांव आत्मनिर्भर बने, हर परिवार सुरक्षित रहे और हर महिला सशक्त हो। क्लाइमेट स्मार्ट गांव इसी दिशा में निर्णायक कदम हैं।

गांवों ने गढ़ी हरित ऊर्जा की नई परिभाषा
कोचा खास गांव की पहल उस सोच का विस्तार है, जो झारखंड के कई जिलों में पिछले पिछले कुछ वर्षों से आकार ले रही है। गुमला जिले के सेहल और चट्टी गांव में जुलाई 2024 में श्नाइडर इलेक्ट्रिक इंडिया और गैर सरकारी संस्था प्रदान ने दो क्लाइमेट स्मार्ट गांवों का उद्घाटन किया था। वहां 40 किलोवाट और 45 किलोवाट क्षमता वाले सोलर मिनी-ग्रिड सिस्टम स्थापित किए गए, जो सिंचाई, कृषि प्रसंस्करण और घरेलू जरूरतों के लिए स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध करा रहे हैं।

इन गांवों में अब 110 से अधिक परिवार सौर ऊर्जा से संचालित जीवन जी रहे हैं। खेती, प्रसंस्करण और छोटे उद्यमों के लिए ऊर्जा की निर्भरता यहां पारंपरिक बिजली पर नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर उत्पन्न सौर ऊर्जा पर आधारित है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि और उद्यमों की लागत घटी है, आमदनी बढ़ी है और कार्बन उत्सर्जन में हर साल लगभग 60,000 किलो की कमी आई है।

यह मॉडल दिखाता है कि जब तकनीक गांव के हाथों में होती है, तो विकास स्थायी बनता है। यहां गांव के लोग न केवल सौर प्रणाली के उपयोगकर्ता हैं, बल्कि ऊर्जा प्रबंधन और रखरखाव के साझेदार भी हैं। इससे सामुदायिक स्वामित्व और आत्मनिर्भरता की भावना भी मजबूत हुई है।

श्नाइडर इलेक्ट्रिक इंडिया के ग्रेटर इंडिया ज़ोन प्रेसिडेंट और एमडी एवं सीईओ, दीपक शर्मा कहते हैं, हमारा उद्देश्य वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में देश के ग्रामीण विकास की महत्वपूर्ण भूमिका को सुनिश्चित करना है। देश की विकास यात्रा में ग्रामीण भारत को अग्रणी स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, लेकिन स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, आजीविका के अवसर, सुरक्षा और स्वच्छ जल जैसी आवश्यक सेवाओं तक त्वरित पहुंच वास्तविक प्रभाव पैदा करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

ऊर्जा से आजीविका तक नवाचार 
इस पहल के तहत आधुनिक इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) आधारित स्मार्ट पावर सिस्टम लगाए गए हैं, जो सौर पैनलों की 100 प्रतिशत क्षमता का उपयोग सुनिश्चित करते हैं। इन प्रणालियों से अब गांवों में सिंचाई पंप, तेल और चावल निकालने की मशीनें, मसाला पीसने की चक्की, इलेक्ट्रिक रिक्शा और स्ट्रीट लाइटिंग जैसी सुविधाएं सौर ऊर्जा से चल रही हैं।

झारखंड में अब तक 800 से अधिक सौर सिंचाई पंप स्थापित किए गए हैं, जिससे लगभग 16,000 महिला किसान लाभान्वित हुई हैं। यह आंकड़ा केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की कहानी भी कहता है। जिन महिलाओं ने पहले खेती या घरेलू कार्यों में सीमित भूमिका निभाई थी, वे अब सौर ऊर्जा आधारित सूक्ष्म उद्यम चला रही हैं और गांव की अर्थव्यवस्था में सीधी भागीदार हैं।

सौर ऊर्जा से रोशन घर, हर खेत में हरियाली 
कोचा खास जैसे गांव अब झारखंड की उस कहानी का हिस्सा बन रहे हैं, जो विकास को केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि व्यवहार में दिखाती है। यहां ऊर्जा की हर किरण, मिट्टी की हर गंध और समुदाय का हर प्रयास हरित आत्मनिर्भरता की ओर एक साझा दिशा में बढ़ रहा है।

राज्य सरकार और निजी संस्थानों की यह संयुक्त पहल दिखाती है कि जब तकनीक, समुदाय और नीति एक साथ चलते हैं, तो बदलाव केवल संभव नहीं, बल्कि स्थायी भी होता है। कोचा खास, सेहल और चट्टी जैसे गांव अब न केवल झारखंड बल्कि पूरे देश के लिए उदाहरण हैं - जहां हर घर में सौर रोशनी है, हर खेत में हरियाली है और हर मन में आत्मनिर्भरता का विश्वास है।

स्मार्ट गांव बनाने में महिलाओं की भूमिका
झारखंड में क्लाइमेट स्मार्ट गांवों में महिलाएं केवल भागीदार नहीं हैं, बल्कि वे परिवर्तन की अगुआ बन चुकी हैं। राज्य के स्वयं सहायता समूहों ने सौर ऊर्जा आधारित प्रसंस्करण इकाइयां, जैविक खाद उत्पादन केंद्र और ग्राम्य उत्पाद विपणन नेटवर्क चलाकर न केवल अपनी आजीविका मजबूत की है, बल्कि स्थानीय रोजगार और सामुदायिक विकास में भी सक्रिय भूमिका निभाई है। इससे उनकी आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ी है, निर्णय क्षमता मजबूत हुई है और गांव के विकास में उनकी आवाज और प्रभाव दोनों बढ़े हैं।

प्राकृतिक खेती के लिए बनाए जा रहे 88 कलस्टर
क्लाइमेट स्मार्ट गांव की परिकल्पना केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। झारखंड सरकार ने राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत 12 जिलों में 88 प्राकृतिक खेती क्लस्टर स्थापित करने की योजना बनाई है। हर क्लस्टर में लगभग 125 किसान शामिल हैं, जो जैविक खाद और प्राकृतिक उपायों से खेती कर रहे हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और उत्पादन लागत घटती है।

138 बायो इन्पुट रिसोर्स सेंटर स्थापित किए गए हैं, जहां वर्मी कम्पोस्ट, गोबर खाद और जीवामृत जैसे जैविक इनपुट तैयार किए जाते हैं। इन केंद्रों का संचालन स्वयं समुदाय के लोग करते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़े हैं और बाहरी संसाधनों पर निर्भरता घटी है। जल संरक्षण इस अभियान की रीढ़ है। झारखंड में जल जीवन मिशन के तहत अब तक 34 लाख ग्रामीण परिवारों को नल से जल मिल रहा है। वर्षा जल संचयन, तालाब निर्माण और सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को भी बढ़ावा मिला है। इसने पेयजल उपलब्धता और कृषि उत्पादकता पर सकारात्मक असर डाला है।

ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडे सिंह कहती हैं, ‘जब महिलाएं विकास की अगुआ बनती हैं, तो गांव खुद-ब-खुद आगे बढ़ने लगता है।’ स्वयं सहायता समूहों के जरिए महिलाएं न केवल अपने परिवार की आजीविका सुनिश्चित कर रही हैं, बल्कि स्थानीय रोजगार सृजन और पर्यावरण संरक्षण की पहल में भी अग्रणी बन रही हैं। इस प्रकार स्मार्ट गांव महिलाओं की आर्थिक तरक्की के लिए अवसरों और समानता का एक वास्तविक मंच बन गए हैं।
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