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छत्तीसगढ़ : धान के कटोरे में नई फसल उगा रहे किसान, अब जड़ी-बूटियों की खेती से बदल रही जिंदगी

शैलेश अरोड़ा, रायपुर Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 25 Jul 2026 08:51 PM IST
सार

  • छत्तीसगढ़ के किसान धान की परंपरागत खेती से आगे बढ़कर औषधीय और सुगंध फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जहां आधी लागत में कई गुना मुनाफा मिल रहा है।
  • राज्य के औषधि पादप बोर्ड की अगुवाई में 10,000 से अधिक किसान इस बदलाव का हिस्सा बन चुके हैं।

किसी के पास खेत है, तो किसी के पास नहीं। इसीलिए, तीन अलग मॉडल बनाए गए।
किसी के पास खेत है, तो किसी के पास नहीं। इसीलिए, तीन अलग मॉडल बनाए गए। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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धरती वही है। मेहनत वही है। लेकिन फसल बदल गई है, और उसी के साथ बदल रही है छत्तीसगढ़ के हजारों किसानों की तकदीर। छत्तीसगढ़ को सदियों से देश का धान का कटोरा कहा जाता रहा है। यहां के किसान पीढ़ियों से साल में दो बार धान उगाते आए हैं। धान के खेतों में यहां के किसानों ने पसीना बहाया, और उसी में अपनी उम्मीदें भी बोईं। लेकिन, वह उम्मीद अक्सर लागत की आंधी में उड़ जाती थी। धान के खेतों में चार इंच तक पानी, ढेरों रासायनिक खाद, कीटनाशक और फिर भी मुनाफा नहीं मिल रहा था।

अब उन्हीं खेतों में नई फसल लहलहा रही है। सर्पगंधा की हरी पत्तियां, पचौली की मनमोहक खुशबू, सैलेसिया की फैलती बेलें और लेमनग्रास की लंबी-लंबी पत्तियां। ये सिर्फ फसलें नहीं हैं, बल्कि ये उन किसानों के बदलते सपनों की तस्वीर है, जिन्होंने एक नई राह पर कदम रखा है।

हर कसौटी पर खरी औषधीय फसलें 

छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड के सीईओ जेएसीएस राव इस बदलाव के सूत्रधारों में से एक हैं। वे कहते हैं कि किसान की आमदनी तभी बढ़ेगी जब फसल ऐसी हो, जिसकी बाजार में मांग हो, मूल्य अच्छा हो और किसानों की लागत कम लगती हो।

औषधीय और सुगंध युक्त फसलें इन तीनों कसौटियों पर खरी उतरती हैं। अगर तुलनात्मक रूप से देखें तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है। धान को चार इंच पानी चाहिए, जबकि इन फसलों को बस एक इंच पानी की जरूरत होती है। धान रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बिना टिकता नहीं है, ये फसलें बिना रसायनों के भी लहलहाती रहती हैं।

धान की खेती से मीथेन गैस निकलती है, जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है, जबकि औषधीय फसलें धरती को स्वस्थ रखती हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि धान में जितनी मेहनत और पैसा लगता है, उसका आधा भी इनमें नहीं लगता। जबकि, मुनाफा कई गुना मिलता है।

बीज से बाजार तक सरकार का साथ

इस अभियान को जो बात अधिक खास बनाती है, वह है बोर्ड का व्यापक सहयोग। निःशुल्क पौधे, खेती की तकनीक का प्रशिक्षण, फसल बेचने में मदद और उद्योगों से सीधे जोड़ने तक किसान को अकेला नहीं छोड़ा जाता। यही वजह है कि जहां पहले साल मात्र 500 किसान इस मुहिम से जुड़े थे, वहां आज हर साल 2,000 से 3,000 नए किसान जुड़ रहे हैं।

इस साल तो 4,000 से भी अधिक किसान आए। अभी 10,000 से ज्यादा किसान लाभ उठा रहे हैं और अगले दो साल में यह संख्या 50,000 तक पहुंचाने का लक्ष्य है।

हर किसान के लिए लाभकारी सौदा 

बोर्ड ने यह भी गहराई से समझा है कि हर किसान की स्थिति अलग होती है। किसी के पास खेत है, तो किसी के पास नहीं। इसीलिए, तीन अलग मॉडल बनाए गए। जिन किसानों के पास खेत हैं, उन्हें अपनी जमीन पर बच, ब्राह्मी, लेमनग्रास, पचौली जैसी फसलें उगाने के लिए प्रेरित किया गया। जिनके पास खेत नहीं है, उनके लिए ग्राम पंचायत की बेकार पड़ी या नदी किनारे की जमीन का विकल्प है।

महिला स्वयं सहायता समूह ऐसी जमीन लीज पर लेकर खेती कर रही हैं और बिना अपनी जमीन के भी 20,000 से 25,000 रुपये सालाना कमा रही हैं। तीसरा रास्ता है बाड़ी योजना, जिसके तहत घर के आंगन या खाली जगह में ये फसलें लगाकर 30,000 रुपये तक कमाई कर सकते हैं।

ये फसलें बदल रही हैं खेती का गणित

  • सैलेसिया : जापान, कोरिया और ताइवान में 50 साल से इस्तेमाल हो रहे इस एंटी-डायबिटिक पौधे की मांग लगातार बढ़ रही है। इसीलिए, इसकी खेती का महत्व और बढ़ गया है। एक एकड़ में 3,000 पौधे, चार साल बाद हार्वेस्टिंग और जड़ तथा तना मिलाकर 18 से 20 लाख रुपये तक कमाई। यह आंकड़ा किसी के भी होश उड़ा सकता है।
  • सर्पगंधा : हर उस दवा में जो रक्तचाप घटाती है, सर्पगंधा अनिवार्य है। डेढ़ से दो साल में तैयार, 700-800 रुपये किलो का भाव और खर्च घटाकर 5 से 6 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा। एक बार बीज लाओ, फिर खुद तैयार करते रहो।
  • पचौली : हर साल 300 करोड़ रुपये से अधिक का पचौली तेल इंडोनेशिया से मंगाना पड़ता है। परफ्यूम, अगरबत्ती और पान मसाला उद्योग को इसकी जरूरत है। इसका कोई सिंथेटिक विकल्प भी नहीं है। जुलाई में लगाकर नवंबर-दिसंबर में पहली कटाई कर सकते हैं। एक एकड़ से डेढ़ से पौने दो लाख रुपये कमाई संभव है।
  • बड़ा अनंतमूल : दक्षिण भारत की फसल बड़ा अनंतमूल मध्य भारत में पहली बार छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड की पहल पर उगाई जा रही है। वनीला आइसक्रीम जैसी खुशबू वाली इस जड़ को जब चाहें बेच सकते हैं। जब बाजार अच्छा हो तब इस फसल को बेचना फायदेमंद होता है। अगर पैसों की जरूरत हो तो 10-20 पौधे उखाड़कर भी इसे आसानी से बेच सकते हैं। इससे ेेदो साल में एकड़ से करीब 5 लाख रुपये तक कमाई हो सकती है। 
  • लेमनग्रास : लेमनग्रास की पहली कटाई 5-6 माह में होती है, फिर हर तीन माह पर कटाई कर सकते हैं। एक एकड़ की उपज से 15-20 लीटर तेल उत्पादन होता है, यानी 15 से 20 हजार रुपये हर बार कमाई संभव है। छह साल तक सिर्फ फसल काटो और कमाते रहो।
  • सिंदूर का पौधा  : सिंदूर का पौधा 11 माह में तैयार हो जाता है और पहले ही साल से इसका व्यावसायिक उत्पादन संभव है। इसके बीज के लाल रंग की खाद्य उद्योग और टेक्सटाइल में नेचुरल डाई के रूप में जबरदस्त मांग है। इसकी एक एकड़ की फसल से डेढ़ से पौने दो लाख सालाना कमाई हो सकती है। घर की बाड़ी में 40-50 पेड़ भी अच्छा मुनाफा देते हैं।
  • खस और बच : खस का तेल 10,000 से 15,000 रुपये लीटर बिकता है। अब इसके हैंडीक्राफ्ट भी चलन में आ गए हैं। एक एकड़ में खस की फसल से ढाई लाख रुपये तक कमाई संभव है। बच की खेती में न कोई तकनीकी पेच है, न ज्यादा रखरखाव की जरूरत पड़ती है। 
  • गुड़मार : अंतरवर्ती फसल के रूप में अन्य फसलों के गुड़मार साथ उगा सकते हैं। इससे एक एकड़ से 70,000 रुपये सालाना आसानी से मिल सकते हैं। इसकी साल में दो-तीन कटाई होती हैं और एक बार लगाओ तो कई साल चलता है।ॉ
छत्तीसगढ़ में यह बदलवा सिर्फ औषधीय खेती का नहीं है, बल्कि उन किसानों की सोच में भी बदलाव हो रहा है, जिन्होंने पीढ़ियों से धान के अलावा कुछ नहीं सोचा था। जेएसीएस राव को यकीन है कि जितना जैविक तरीके से इन फसलों को उगाया जाएगा, उतना ही अच्छा मूल्य मिलेगा और उतनी ही धरती भी स्वस्थ रहेगी।

छत्तीसगढ़ के खेतों में जो बदलाव दिख रहा है, वह बताता है कि जब सरकारी तंत्र सच में किसान के साथ खड़ा हो तो तस्वीर बदलते देर नहीं लगती। 

बाजार की कोई कमी नहीं

अक्सर किसान नई फसल से इसलिए डरते हैं क्योंकि उन्हें पता नहीं होता कि वह कहां बिकेगी। लेकिन, यहां यह डर बेबुनियाद है। देश में करीब 7,800 आयुर्वेदिक निर्माण इकाइयां हैं। इसके अलावा, लगभग 1,000 यूनानी, होम्योपैथिक और सिद्धा इकाइयां हैं, जो इन फसलों की लगातार मांग करती हैं। अच्छी मात्रा होने पर किसान सीधे कंपनियों से संपर्क कर सकते हैं। दिल्ली की खारी बावली, मध्यप्रदेश की नीमच मंडी के अलावा चेन्नई, हैदराबाद, धमतरी और शिवपुरी में भी मंडियां हैं। बोर्ड खुद किसानों और ट्रेडर्स के बीच एमओयू कराता है, जिसमें किसानों को अग्रिम भुगतान का भी प्रावधान है। - जेएसीएस राव, सीईओ  छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड 
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