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छत्तीसगढ़ : धान के कटोरे में कम होती सुगंध

अवधेश कुमार मलिक, रायपुर Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 13 May 2024 09:43 AM IST
सार

धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में सुगंधित चावल की 10 से 20 किस्मों की जानकारी मिलती है। लेकिन, राज्य के प्रमुख खुदरा और थोक बाजारों में बासमती के अलावा बमुश्किल 4 से 5 प्रकार के सुगंधित चावल ही देखने को मिलते हैं। 

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है।
छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। - फोटो : अवधेश कुमार मलिक
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विस्तार
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बासमती के अलावा, आमतौर पर 10 से 12 किस्मों के सुगंधित चावल ही चलन में दिखाई देते हैं। हालांकि, धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में बड़ी आसानी से सुगंधित चावल की 10 से 20 किस्मों की जानकारी मिल जाती है। इसके बावजूद, राज्य के रिटेल या होलसेल चावल मार्केट, यहां तक कि राजधानी रायपुर के डूमरतराई थोक बाजार में भी बासमती के अलावा बमुश्किल 4 से 5 प्रकार के सुगंधित चावल ही देखने को मिलते हैं। सवाल उठता है कि स्थानीय लोगों को जब सुगंधित चावल की इन किस्मों के बारे में इतनी जानकारी है तो फिर ये आसानी से उपलब्ध क्यों नहीं हो पाते? 
 
छत्तीसगढ़ में पाई जाने वाली धान की सुगंधित किस्में।
छत्तीसगढ़ में पाई जाने वाली धान की सुगंधित किस्में। - फोटो : गांव जंक्शन
इतिहास के झरोखे में...   
सुगंधित चावल का सुश्रुत संहिता जैसे पुरातन ग्रंथों में भी जिक्र किया गया है।  हिमालय के तराई क्षेत्र में इसे उगाए जाने का उल्लेख मिलता है। चावल (Oryza sativa L.) को मुख्य रूप से दो सुगंधित उप-प्रजातियों Indica और japonica में बांटा गया है। Indica का अर्थ भारत में उगाया जाने वाला चावल है और दूसरे को पूर्वी एशिया में उगाए जाने वाले चावल से जोड़कर देखा जाता है। सुगंधित चावल दो प्रकार से तैयार होते हैं, एक प्राकृतिक तरीके से और दूसरा वैज्ञानिक शोध संस्थान में चावल के जीन में आवश्यक बदलाव कर उसे सुगंधित बनाते हैं। धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की बात करें, तो यहां पुरातन काल से ही राजा-महाराजाओं; खासकर कलचुरी वंश के समय में सुगंधित चावल की खेती के बारे में उल्लेख मिलता है।

100 से अधिक किस्मों का दावा
छत्तीसगढ़ में सुगंधित चावल की किस्मों की संख्या के संदर्भ में कोई पुख्ता अाधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। अभी तक इसको लेकर कोई भी अाधिकारिक सर्वे नहीं किया गया है। रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति के कार्यालय में एक तस्वीर लगी है, जिसमें राज्य के जिलों में 27 प्रकार के सुगंधित चावल के बारे में उल्लेख किया गया है। विश्वविद्यालय मेंे धान और जर्म प्लाज्म पर काम कर रहे शोधकर्ताओं का मानना है कि छत्तीसगढ़ में करीब 100 प्रजाति (किस्म) के सुगंधित धान पाए जाते हैं। एग्रो इकॉनामी के जानकार प्रदीप शर्मा के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में 1270 किस्म के सुपर एरोमेटिक राइस यानी कि सुपर सुगंधित चावल पाए जाते हैं। ये सुगंधित चावल ऐसे हैं, जिनसे 11 फीट की दूरी से सुगंध आने लगती है। प्रदीप शर्मा आगे बताते हैं कि पूर्ववर्ती प्रदेश सरकार में सुंगधित चावल पर काफी कार्य हुआ। इसके लिए, सुगंधित चावल की जीआई टैगिंग भी की गई। पर, इसमें अभी और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है, क्योंकि इसे किसान या तो सिर्फ अपने खाने के लिए उपजा रहें हैं या फिर कुछेक जगह एनजीओ की मदद से इसका उत्पादन हो रहा है। यह स्थिति मार्केट शेयर के हिसाब से बहुत कम है। प्रदीप शर्मा यह भी कहते हैं कि करीब-करीब सभी सरकारों ने इसकी उपेक्षा की है।
धान की इन सुगंधित किस्मों में सुधार से हो सकता है फायदा।
धान की इन सुगंधित किस्मों में सुधार से हो सकता है फायदा। - फोटो : गांव जंक्शन
धान उत्पादन और कारोबार 
कोरबा जिले के पोड़ी–उपरोड़ा ब्लॉक में कार्यरत महामाया बहुद्देशीय सहकारी समिति के अध्यक्ष सूर्यकांत सोलखे बताते हैं, उनकी संस्था के साथ 200 किसान जुड़े हैं, जो सुंगधित चावल जैसे विष्णुभोग, जीरा फूल जैसी किस्मों की ऑर्गेनिक खेती कर रहें हैं। अमूमन प्रति एकड़ 10 से 11 क्विंटल सुगंधित चावल का उत्पादन हो जाता है, जिसकी कीमत 90-100 रुपये प्रति किलो होती है। सूर्यकांत आगे बताते हैं, हम यह खेती 4-5 वर्षों से कर रहें हैं, लेकिन बिचौलियों और कालाबाजारी के चलते किसानों को उतना फायदा नहीं हो पाता, जितने के वो हकदार हैं। वह आगे बताते हैं, दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों के लोग किसानों से सस्ते में चावल खरीद लेते हैं। फिर, उसकी मिलिंग कराकर अपनी कंपनी के नाम से पैकिंग कर बाजार में उच्च दर पर बेच देते हैं।
वैज्ञानिकों के साथ-साथ सरकार और कारोबारी समर्थन से चलन में आ सकती हैं धान की सुगंधित किस्में।
वैज्ञानिकों के साथ-साथ सरकार और कारोबारी समर्थन से चलन में आ सकती हैं धान की सुगंधित किस्में। - फोटो : गांव जंक्शन
कम क्यों हुई सुगंधित चावल की महक 
दुर्ग के किसान नेता राजकुमार गुप्ता कहते है, छत्तीसगढ़ में किसानों का धान सर्वाधिक कीमत पर खरीदा जाता है। ऐसे में, किसान ज्यादा उपज वाले धान की ओर आकर्षित होते हैं और सुगंधित चावल की खेती पिछड़ती चली गई। वर्ष 2014 के बाद, धान पर बोनस बढ़ाकर 300 रुपये तक देने का वादा किया गया। बघेल सरकार और विष्णुदेव सरकार में इसे और अधिक किया गया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 4 फरवरी 2024 तक राज्य में 24.72 लाख से अधिक किसानों से 144.92 लाख टन धान की खरीद की गई। जबकि, इस साल 130 लाख टन धान खरीद का अनुमान था। इस सरकारी धान खरीद में सुंगधित चावल या धान शामिल नहीं है।

छत्तीसगढ़ राईस मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष योगेश अग्रवाल बताते हैं, यहां चावल का मार्केट करीब 50,000 करोड़ रुपये का है। लेकिन, छत्तीसगढ़ की सुगंधित चावल की हिस्सेदारी इसमें 10 प्रतिशत भी नहीं है। जो सुगंधित चावल सर्वाधिक मात्रा में यहां बेचा जाता है, वह बासमती ही है। केंद्र सरकार ने पिछले दो वर्षों से चावल का एक्सपोर्ट बंद कर रखा है। योगेश अग्रवाल कहतें हैं कि सरकार सुगंधित चावल पर ध्यान दे और व्यापारियों एवं किसानों को सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, तो छत्तीसगढ़ के सुगंधित चावल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सकती है।   

वैज्ञानिकों ने विकसित की कई किस्में 
कृषि वैज्ञानिक प्रो. दीपक शर्मा बताते हैं, भाभा रिसर्च सेंटर और इंदिरा गांधी कृषि विवि के प्रयास से सुगंधित धान की कई किस्में विकसित की गई हैं। इनमें ट्रांबे छत्तीसगढ़ दूबराज म्यूटेंट-1, ट्रांबे छत्तीसगढ़ जवा फूल म्यूटेंट, ट्रांबे छत्तीसगढ़ विष्णुभोग म्यूटेंट, ट्रांबे छत्तीसगढ़ लोक्ती मच्ची, विक्रम टीसीआर (सफरी-17), संजीवनी (इम्यूनिटी बूस्टर), दूबराज सेलेक्शन-1, बादशाह भोग सेलेक्शन-1 और विष्णुभोग सेलेक्शन-1 शामिल हैं। नागरी दूबराज और जीरा फूल को जीआई टैग भी मिला है। 
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