भारत कृषि प्रधान देश है। हमारे यहां आज भी 60 फीसदी से ज्यादा आबादी कृषि पर ही निर्भर है। रोजगार से लेकर देश की अर्थव्यवस्था तक, कृषि पर काफी हद तक निर्भर है। ऐसे में कृषि को मजबूत बनाने के लिए देश को कई मायनों में आगे आत्मनिर्भर होना पड़ेगा। इसमें उर्वरक आत्मनिर्भरता एक बड़ा मुद्दा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद उर्वरक आत्मनिर्भरता का नारा दिया है। ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि आत्मनिर्भरता के मामले में हम अभी तक कहां पहुंचे? आगे क्या होगा? उद्योगों की क्या-क्या तैयारियां हैं? आइए समझते हैं...
पहले भारत के उर्वरक आयात के आंकड़ों को जान लीजिए
भारत हर साल उर्वरक (fertilizer) आयात करने में भारी खर्च करता है। वित्तीय वर्ष 2022–23 में भारत ने लगभग 1.38 ट्रिलियन रुपये (₹1.38 लाख करोड़) मूल्य के उर्वरक आयात किए। इसी अवधि में, यह राशि डॉलर में लगभग $17.1 बिलियन के बराबर थी । इस प्रकार, भारत उर्वरक आयात पर आम तौर पर ₹1–1.5 लाख करोड़ या $17–25 बिलियन खर्च करता है, जिसमें उतार-चढ़ाव कच्चे तेल व गैस की कीमतों, घरेलू उत्पादन स्तर और वैश्विक बाजारों की स्थिति पर निर्भर करते हैं। हाल के दिनों में इसमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है, क्योंकि रूस-यूक्रेन और फिर ईरान-इस्राइल युद्ध के चलते वैश्विक बाजार में काफी उथल-पुथल है। ऐसे में भारत को बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा उर्वरक आयात करने पर खर्च करना पड़ता है।
भारत कब तक उर्वरक के मामले में आत्मनिर्भर होगा?
इसे समझने के लिए हमने ट्रेडलिंक इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक व उद्योग विशेषज्ञ अभिषेक वाडेकर से बात की। उन्होंने कहा, 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उर्वरक की आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में बड़ा कदम बढ़ाया है। इसी का नतीजा है कि आज हम यूरिया के मामले में आत्मनिर्भर होने वाले हैं। आंकड़ों को देखें तो अब यूरिया की मांग और घरेलू उत्पादन में सिर्फ 42 लाख मीट्रिक टन का गैप रह गया है। वर्ष 2023-24 के दौरान भारत में 356.08 लाख मीट्रिक टन यूरिया की खपत हुई, जिसमें से 314.07 लाख टन भारत की अपनी यूनिटों में बना था। एक तरह से अब यूरिया की आत्मनिर्भरता के मामले में भारत आउटर पर खड़ा है। बढ़ते उत्पादन की रफ्तार से ही ही भारत में यूरिया की मांग भी बढ़ रही है, वरना इस मामले में आत्मनिर्भरता जल्दी मिल जाती। हालांकि, इस साल अंत तक यूरिया का आयात पूरी तरह से बंद हो जाएगा।'
वहीं, डीएपी व एनपीके की बात करें तो इसमें आत्मनिर्भरता का कदम बहुत दूर है। इस क्षेत्र में हम वैकल्पिक उर्वरकों पर फोकस कर सकते हैं। नैनो डीएपी एक बड़ा और अच्छा उदाहरण है। इससे हम इनपुट कॉस्ट कम कर सकते हैं और आयात पर होने वाले खर्च पर भी लगाम लगा सकते हैं। इसके साथ ही सरकार बायो फर्टिलाइजर प्रमोट कर रही है। किसानों के बीच जैविक खेती, प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा दिया जा रहा है और साथ में उर्वरकों के प्रयोग को लेकर भी जागरूक किया जा रहा है। अगर किसी उर्वरकों के प्रयोग की सही मात्रा समझ जाएं तो काफी हद तक हम इसके आयात को कम करने में कामयाब हो सकते हैं।
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा के पूर्व निदेशक डॉ. एके सिंह कहते हैं, 'भारत में DAP और NPK में 50–60% और MOP में लगभग 100% निर्भरता अभी भी आयात पर बनी हुई है। सरकार ने लंबी अवधि के समझौते (Morocco, Oman, Jordan, Russia आदि के साथ) किए हैं ताकि इन उर्वरकों की आपूर्ति सुरक्षित हो सके। नैनो-यूरिया और नैनो-DAP जैसी नई टेक्नोलॉजी से परंपरागत उर्वरकों की खपत में कमी की उम्मीद है, जो आत्मनिर्भरता में सहायता करेगी।' उन्होंने बताया कि DAP, NPK, MOP में आत्मनिर्भरता के लिए कम से कम 2030–2032 तक का इंतजार करना होगा।
उर्वरक उत्पादन में विदेशी निवेश का क्या स्तर है?
अभिषेक कहते हैं, भारत एक बड़ा बाजार है। हमारे यहां 140 मिलियन हेक्टेयर खेती होती है। 70 प्रतिशत नौकरियां अभी भी खेती और इससे जुड़े सेक्टर्स में हैं। भारत का कृषि सेक्टर तेजी से विकास की पटरी पर दौड़ रहा है। यही कारण है कि दुनिया की हर बड़ी कंपनी भी हमारी तरफ निगाहें लगाकर देख रही है। भारत सरकार का भी जोर है कि कैसे विदेशी निवेश को आमंत्रित किया जाए। इसके लिए सरकार कई तरह के प्रमोशनल एक्टिविटी भी कर रही है। हालांकि, सरकार को नीतिगत मामलों में भी उद्योगों को मदद करने की जरूरत है। जो कंपनियां उत्पादन इकाईयां लगा रहीं हैं, उन्हें कैपिटल सब्सिडी या टैक्स हॉलीडे देनी चाहिए। इनवायरमेंटल क्लीयरेंस हो या भूमि अधिग्रहण जैसी कागजी कार्रवाई। इन सब में कम से कम समय लगे, इसका ख्याल रखना चाहिए। इसके अलावा इंपोर्ट कम करने के लिए भी प्रमोशनल एक्टिविटी करनी चाहिए। जॉर्डन, सऊदी, कनाडा, रूस से रॉ मटेरियल मंगवाते हैं। ऐसे में इन देशों से भी लॉन्ग टर्म कॉन्ट्रैक्ट करना चाहिए। इन देशों के साथ मिलकर कुछ प्रोजेक्ट शुरू करने की जरूरत है।
उर्वरक उद्योगों को किन-किन क्षेत्र में काम करने की जरूरत है?
अभिषेक के अनुसार, उद्योग को मिट्टी और क्षेत्र की जरूरतों को देखते हुए अपने उत्पाद तैयार करने चाहिए। बैलेंस्ड न्यूट्रिशन, रिसर्च और इनोवेशन पर फोकस करना चाहिए। इसके जरिए स्मार्ट फर्टिलाइजर, नैनो यूरिया और डीएपी का उत्पादन बढ़ाना चाहिए। ऐसे उर्वरक बनाने पर काम करना चाहिए जो पूरी तरह से पानी में घुलनशील हों। इसके जरिए हम दूसरे देशों पर निर्भरता भी कम कर सकते हैं। सॉयल हेल्थ एनालिसिस पर भी फोकस करने की जरूरत है। एआई के ऐसे टूल्स लाने चाहिए जो किसानों के लिए मददगार हों। जो किसानों को बताएं कि उर्वरक की कितनी मात्रा की जरूरत है और कब उसका प्रयोग करना है? इसी तरह ट्रैकिंग डिवाइस पर भी काम करना चाहिए। हमारे पास निर्यात करने की संभावना भी बहुत ज्यादा है। हमें उर्वरक के मामले में सिर्फ आत्मनिर्भर बनने का नहीं सोचना चाहिए, बल्कि एक बड़े निर्यातक के रूप में खुद को विकसित करना चाहिए। ब्राजील, अफ्रीका जैसे कई देशों तक हम अपनी पहुंच बढ़ा सकते हैं।
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