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Birsa Munda Story Born In Small Village And An Ordinary Farmer Family How Did He Become Problem For British
Birsa Munda Story: छोटे सा गांव और साधारण किसान परिवार में जन्म, अंग्रेजों के लिए कैसे मुसीबत बने बिरसा मुंडा?
गांव जंक्शन, नोएडा
Published by: Mohammad Aamil
Updated Mon, 09 Jun 2025 03:56 PM IST
सार
बिरसा मुंडा ने नारा दिया था, "हमारा जंगल, हमारी जमीन – कोई नहीं छीन सकता!" उनका जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड के खूंटी जिले के उलिहातू गांव में हुआ था। उनके माता-पिता सुगना और करमी एक साधारण किसान परिवार से थे।
एक साधारण किसान परिवार में जन्मे अमर शहीद बिरसा मुंडा... जल, जंगल और जमीन के लिए बचपन में स्कूल छोड़ा। अंग्रेजी शासन के खिलाफ महाविद्रोह का बिगुल फूंका। ब्रिटिश हुकूमत ने उनपर 500 रुपये का इनाम रखा। दो बार गिरफ्तार हुए और प्रकृति की रक्षा के लिए मात्र 25 साल की उम्र में शहीद हो गए। आज इन महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की 125वीं पुण्यतिथि है, जिन्हें 'धरती आबा' यानी 'जमीन के पिता' के नाम से जाना जाता है। आइए जानते हैं अंगेजों के लिए परेशानी का सबब बने छोटे से गांव में जन्में शहीद बिरसा मुंडा के बारे में...
"हमारा जंगल, हमारी जमीन – कोई नहीं छीन सकता!"
बिरसा मुंडा ने नारा दिया था, "हमारा जंगल, हमारी जमीन – कोई नहीं छीन सकता!" उनका जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड के खूंटी जिले के उलिहातू गांव में हुआ था। उनके माता-पिता सुगना और करमी एक साधारण किसान परिवार से थे। बिरसा मुंडा बचपन से ही तेज, जागरूक और आत्मसम्मान से भरपूर थे। मिशनरी स्कूल में पढ़ते हुए उन्होंने महसूस किया कि ईसाई प्रचारक आदिवासी समाज को नीचा दिखाते हैं।
अंग्रेजों के खिलाफ महाविद्रोह
बिरसा मुंडा की शुरुआती पढ़ाई सलमा में हुई। उसके बाद वह चाईबासा के मिशनरी स्कूल में पढ़ने पहुंचे। 15 साल की उम्र में उन्होंने 1890 में चाईबासा छोड़ दिया। जिसके बाद वह अपने मूल आदिवासी संस्कृति और परंपराओं की ओर लौट आए। उसके बाद उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। साल 1895 में बिरसा मुंडा ने ‘उलगुलान’ यानी महाविद्रोह का बिगुल फूंका। वे जनजातीय समाज को अंग्रेजों के जुल्म, जमींदारों के अत्याचार और ईसाई धर्मांतरण से मुक्त कराना चाहते थे।
दूसरी बार बिरसा मुंडा को 1900 में गिरफ्तार किया गया
- फोटो : सोशल मीडिया
प्रकृति पूजा के लिए बनाया अलग धर्म
बिरसा मुंडा ने जनजातीय समाज की पहचान बनाने के लिए कड़ा संघर्ष किया। उन्होंने बिरसाइत धर्म की शुरुआत की, जो प्रकृति पूजा, स्वच्छ जीवन और स्वाभिमान पर आधारित था। वे केवल क्रांतिकारी नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक सुधारक भी थे। ब्रिटिश सरकार बिरसा मुंडा से डरने लगी थी। उन पर 500 रुपये का इनाम घोषित किया गया। उन्हें पहली बार 1895 में गिरफ्तार किया गया। उसके बाद दूसरी बार बिरसा मुंडा को 1900 में गिरफ्तार किया गया।
अंग्रेजों ने समर्थकों पर चलाईं गोलियां, सैकड़ों की मौत
1990 में डोंबारी बुरू पहाड़ी पर बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। यह खूंटी की वह पहाड़ी है, जहां 9 जनवरी 1900 को अंग्रेजों ने बिरसा मुंडा के समर्थकों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं। सैकड़ों लोग मारे गए। यह घटना जलियांवाला बाग हत्याकांड से भी पहले की एक बड़ी त्रासदी थी। यहां 110 फीट ऊंचा शहीद स्तंभ और बिरसा मुंडा की प्रतिमा आज भी शहीदों की गाथा सुनाती है।
25 साल की उम्र में कर दिया था शहीद
9 जून 1900 को रांची जेल में उन्हें मात्र 25 वर्ष की उम्र में शहीद कर दिया गया। बिरसा मुंडा ने जनजातीय समाज को उनकी पहचान और अधिकारों के लिए जागरूक किया। बिरसाइत धर्म के माध्यम से संस्कृति और आस्था को जीवित रखा। उनके अनुयायी आज भी प्रकृति पूजक, नशा-विरोधी और स्वाभिमानी जीवन जीते हैं।
सम्मान और स्मृति
बिरसा मुंडा की जयंती पर 15 नबंवर 2000 को झारखंड राज्य की स्थापना की गई। उनके नाम पर बिरसा मुंडा एयरपोर्ट (रांची), बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, और बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार बनाए गए हैं। भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया है। 2021 में केंद्र सरकार ने 15 नवंबर को “जनजातीय गौरव दिवस” घोषित किया।
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