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पंचायती राज : पंचायतों को सिर्फ टैक्स वसूलने का अधिकार नहीं, स्वायत्तता भी दे बिहार सरकार

पटना Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 11 Aug 2026 09:00 PM IST
सार

  • बिहार सरकार ने बिहार ग्राम पंचायत (कर, दर एवं शुल्क) नियमावली, 2026 को मंजूरी दी, जिसके तहत ग्रामीणों से सालाना 360 रुपये से 5,000 रुपये तक टैक्स वसूला जाएगा।
  • सरकार को उम्मीद है कि नई व्यवस्था से करीब 1,300 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व जुटेगा, जिससे पंचायतें आर्थिक रूप से सशक्त बनेंगी।
  • आलोचकों का कहना है कि सरकार टैक्स वसूलने का अधिकार तो दे रही है, पर पंचायतों को असली निर्णय लेने की स्वायत्तता नहीं मिल रही।
  • बिहार जैसे गरीब राज्य में ग्रामीणों पर नए टैक्स का बोझ, टूटी सड़कों-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी के बीच सवालों के घेरे में है।

ग्रामीणों पर टैक्स से पहले पंचायतों को मिले असली अधिकार, तभी बदलेगी गांवों की तस्वीर
ग्रामीणों पर टैक्स से पहले पंचायतों को मिले असली अधिकार, तभी बदलेगी गांवों की तस्वीर - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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बिहार को प्रति व्यक्ति आय के लिहाज से देश का सबसे गरीब राज्य माना जाता है, जहां गांव का आम आदमी हर दिन रोजी-रोटी की जद्दोजहद में लगा रहता है। ऐसे में 15 जुलाई 2026 को सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार ने ग्रामीणों पर सीधा टैक्स लगाने का बड़ा फैसला लिया है। राज्य सरकार ने बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 के तहत बिहार ग्राम पंचायत (कर, दर एवं शुल्क) नियमावली, 2026 को मंजूरी दी है। इसके तहत ग्रामीणों से सालाना 360 रुपये से लेकर 5 हजार रुपये तक टैक्स वसूला जा सकता है। पंचायती राज विभाग के अनुसार, कुल 24 से अधिक प्रकार के कर वसूलने का प्रावधान इसमें रखा गया है।

पुराना कानून, नया क्रियान्वयन
बिहार पंचायत राज एक्ट, 2006 की धारा 27 में पंचायतों को टैक्स लगाने का अधिकार पहले से मौजूद था, लेकिन इसे अमल में लाने के लिए कोई विस्तृत नियमावली कभी नहीं बनाई गई थी। अब पहली बार इसके क्रियान्वयन के लिए ठोस व्यवस्था तैयार की गई है। राज्य के 45,000 से अधिक राजस्व गांवों में करीब 8.8 करोड़ लोग रहते हैं। सरकार का अनुमान है कि इस नई व्यवस्था से करीब 1,300 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व जुटाया जा सकेगा। गौर करने वाली बात यह भी है कि कर्नाटक, केरल, गुजरात और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में पहले से ही पंचायतों को स्थानीय टैक्स और शुल्क वसूलने का अधिकार है, यानी यह पूरी तरह नया प्रयोग नहीं है।

ग्राम पंचायतों में टैक्स की दरें 
नए नियमों के अनुसार पक्के मकानों पर सालाना होल्डिंग टैक्स 100 रुपये, अर्द्ध-पक्के मकानों पर 50 रुपये और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने मकानों पर 25 रुपये सालाना तय किया गया है। इसके अलावा सफाई के लिए 30 रुपये और जलापूर्ति के लिए 30 रुपये प्रति वर्ष अतिरिक्त लगेंगे। वहीं, पेट्रोल पंप, रसोई गैस एजेंसी, ईंट भट्ठा और सिनेमाघर जैसे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से सालाना 5,000 रुपये का शुल्क वसूला जाएगा। इसके साथ ही, पंचायतें होर्डिंग-विज्ञापन, हाट-बाजार, पेशा, व्यापार और उद्योगों से भी कर वसूल सकेंगी, और अपनी सेवाओं के बदले सेवा शुल्क तय करने का अधिकार भी उन्हें मिलेगा।

पंचायतों को मिलेगी आर्थिक ताकत
सरकार का कहना है कि इस पहल का मकसद पंचायतों को वित्तीय रूप से सशक्त बनाना और स्थानीय स्तर पर बुनियादी सुविधाएं जल्दी मुहैया कराना है। तर्क यह है कि जब तक पंचायतों के पास अपने खुद के राजस्व स्रोत नहीं होंगे, तब तक वे राज्य और केंद्र के अनुदानों पर ही निर्भर बनी रहेंगी, और इसी वजह से स्थानीय जरूरतों के काम अक्सर अटके रह जाते हैं। इस लिहाज से देखें तो स्थानीय स्वशासन की तस्वीर तभी पूरी होगी जब पंचायतों के पास अपने संसाधन हों।

आत्मनिर्भरता से पहले स्वायत्तता का सवाल 
सरकार के तर्क के साथ एक गंभीर सवाल भी जुड़ा है। सेवानिवृत्त शिक्षक और जिला परिषद प्रतिनिधि बालक राम पासवान का कहना है कि टैक्स वसूलने का अधिकार देकर सरकार गांवों को आत्मनिर्भर तो बना रही है, पर सवाल यह है कि इससे पहले पंचायतों को स्वायत्तता क्यों नहीं दी जा रही। आगे वह कहते हैं, जब पंचायती राज व्यवस्था की परिकल्पना हुई थी, तब इसे 'तीसरी सरकार' का दर्जा दिया गया, लेकिन पिछले 33 सालों में योजनाएं केंद्र और राज्य सरकार ही बनाती हैं, और पंचायत प्रतिनिधियों का काम बस उन्हें लागू करने तक सीमित रह गया है।

पासवान का यह भी कहना है कि ग्राम सभा की बैठक कब हो, यह फैसला पंचायतों का अपना होना चाहिए। लेकिन, अभी बिहार सरकार ने हर पंचायत को महीने के आखिरी रविवार को 'पंचायत विकास दिवस' मनाने का निर्देश जारी किया है। उनके अनुसार, आत्मनिर्भरता के साथ-साथ स्वायत्तता भी पंचायतों का संवैधानिक अधिकार है। बिहार सरकार का दावा है कि 'पंचायत विकास दिवस' का मकसद ग्राम सभाओं को सक्रिय करना, महिलाओं-युवाओं से संवाद बढ़ाना और ग्रामीण विकास योजनाओं को गति देना है।

ग्रामीणों पर आर्थिक बोझ की चिंता
बिहार सरकार के सेवानिवृत्त अधिकारी और लेखक अरुण कुमार झा इस फैसले के आर्थिक पहलू पर चिंता जताते हैं। वह कहते हैं, बिहार प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से देश के सबसे गरीब राज्यों में गिना जाता है, और ग्रामीण जनता पहले से ही रोजमर्रा की कमाई के लिए संघर्ष कर रही है। ऐसे में टैक्स का कम बोझ भी मध्यम और निम्न आय वर्ग पर सीधा असर डाल सकता है। हालांकि, वे यह भी मानते हैं कि अगर इस राजस्व का सही इस्तेमाल हो, तो गांव के लोगों को इसका लाभ जरूर मिलेगा।

राजस्व के अन्य स्रोतों पर विचार जरूरी  
वरिष्ठ पत्रकार राजेश ठाकुर बताते हैं कि बिहार सरकार फिलहाल राजस्व की भारी कमी से जूझ रही है। इससे निपटने के लिए हाल ही में कई कदम उठाए गए हैं, जिनमें टोल टैक्स जैसे फैसले भी शामिल हैं। ग्रामीण टैक्स भी इसी कड़ी का अहम हिस्सा है, क्योंकि बिहार की ज्यादातर आबादी गांवों में ही बसती है।

इस संदर्भ में शराबबंदी का मुद्दा भी बार-बार सामने आता है। सहरसा जिले की महिषी पंचायत के नलिन ठाकुर का कहना है कि बिहार में शराबबंदी की वजह से राज्य को राजस्व का नुकसान हो रहा है और यह नीति जमीनी स्तर पर पूरी तरह कारगर भी नहीं रही। उनका सुझाव है कि यदि राजस्व की समस्या है, तो सरकार को शराबबंदी की नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए, न कि सीधे आम लोगों पर नया कर लगाना चाहिए।

जमीनी स्तर पर कई चुनौतियां मौजूद 
सहरसा के कुणाल कश्यप का कहना है कि बिहार से बड़ी संख्या में लोग पहले ही पलायन कर चुके हैं। बचे हुए किसान कर्ज में हैं और मजदूर काम की तलाश में भटक रहे हैं, जबकि करोड़ों परिवार सरकारी राशन के सहारे ही अपना गुजारा कर रहे हैं। ऐसे हालात में टैक्स वसूलने का फैसला उनके लिए एक अतिरिक्त चुनौती बन सकता है।

सुपौल जिले के मोहित झा एक अलग सवाल उठाते हैं। बरसात के मौसम में गांवों की सड़कें टूटी पड़ी हैं, नालियां अधूरी हैं, पीने का साफ पानी नहीं है और स्वास्थ्य-शिक्षा की व्यवस्था भी बदहाल बनी हुई है। उनके मुताबिक, जब बुनियादी सुविधाएं ही पंचायतों तक ठीक से नहीं पहुंच पा रहीं, तो होल्डिंग टैक्स जैसे बोझ का औचित्य समझना मुश्किल है।

बिहार का यह कदम स्थानीय स्वशासन को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण जरूर है, और अन्य राज्यों के अनुभव बताते हैं कि यह मॉडल असंभव भी नहीं है। मगर, इसकी असली परीक्षा इस बात में होगी कि वसूला गया पैसा वाकई गांवों की सड़कों, सफाई, पानी और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचता है या नहीं। साथ ही, पंचायतों को सिर्फ राजस्व वसूलने का अधिकार देने से आगे बढ़कर उन्हें निर्णय लेने की वास्तविक स्वायत्तता भी दी जाए, तभी 'सशक्त और आत्मनिर्भर पंचायत' का सपना सच हो पाएगा।

फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि ग्रामीणों से वसूला जाने वाला यह टैक्स आने वाले समय में गांवों की तस्वीर कितनी बदल पाता है।
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