मल्चिंग फिल्मों से लेकर ड्रिप सिंचाई, ग्रीनहाउस कवर और फसल कटाई के बाद पैकेजिंग तक खेती में प्लास्टिक का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। भारत का प्लास्टिकल्चर क्षेत्र आज 54,000 करोड़ रुपये का हो गया है। खेती में प्लास्टिक के उपयोग के फायदे हो सकते हैं, लेकिन इससे पैदा होने वाले पर्यावरणीय खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
खेती में प्लास्टिक के उपयोग का दायरा मल्चिंग फिल्मों से लेकर ड्रिप सिंचाई जैसे कृषि उपकरणों, ग्रीनहाउस कवर और फसल कटाई के बाद होने वाली पैकेजिंग तक फैला हुआ है। खाद, बीज और कीटनाशकों की पैकेजिंग में भी प्लास्टिक का उपयोग होता है। यह पानी बचाता है, मिट्टी की नमी को सुरक्षित रखता है और फसलों के लिए अनुकूल तापमान व संतुलित आर्द्रता बनाए रखने में भी योगदान दे रहा है। इस तरह, प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्लास्टिक न केवल फसलों की पैदावार बढ़ाने में मदद करता है, बल्कि यह किसानों की कमाई में इजाफा भी करता है। इन तमाम बातों के बावजूद, खेती में प्लास्टिक के कारण होने वाले पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
प्रिसिजन फार्मिंग में बड़े पैमाने पर उपयोग
प्लास्टिकल्चर, यानी खेती में प्लास्टिक आधारित तकनीकों का उपयोग, अब खाद्य उत्पादन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। प्लास्टिकल्चर को खेती की उत्पादकता व दक्षता बढ़ाने के लिए जाना जाता है, जिसमें ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग फिल्म और पॉलीहाउस जैसी तकनीकें शामिल हैं। पॉलीथीन फिल्मों से कवर पॉलीहाउस फसलों को मौसम की मार से बचाता है। फसल कटाई के बाद पैकेजिंग में भी प्लास्टिक उपयोग 50 फीसदी से अधिक है। सटीक खेती (प्रिसिजन फार्मिंग) में बड़े पैमाने पर प्लास्टिक का उपयोग होता है। देश में लगभग 2.75 लाख हेक्टेयर भूमि पर सटीक खेती हो रही है, जिसमें 90 फीसदी से अधिक क्षेत्रों में प्लास्टिक मल्चिंग का उपयोग होता है।
भारत सरकार भी प्लास्टिकल्चर का समर्थन करती है और बागवानी को बढ़ावा देने के लिए प्लास्टिकल्चर उपायों पर भारी फीसदी सब्सिडी दे रही है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और जल जीवन मिशन जैसी सरकारी योजनाएं भी सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन और समर्थन दे रही हैं। कृषि मंत्रालय के अनुसार, ग्रीनहाउस, मल्चिंग और साइलेज फिल्मों की वैश्विक मांग 2018 में 61 लाख टन से बढ़कर 2030 तक 95 लाख टन हो जाएगी। प्लास्टिकल्चर क्षेत्र वर्तमान में 54000 करोड़ रुपये मूल्य का है, जो वित्त वर्ष 2027 तक 80000 करोड़ रुपये को पार कर सकता है।
उत्पादकता और आय में बढ़ाने में सहायक
दलहन, तिलहन और कपास सहित कई फसलों फसलों की उत्पादकता बढ़ाने पर सरकार का फोकस है। इसके लिए, मशीनीकृत और हाईटेक खेती पर जोर दिया जाता है, जो खेती में प्लास्टिक की भूमिका को अधिक बढ़ा सकती है। मल्चिंग फिल्में खरपतवार की वृद्धि को 90 फीसदी तक कम कर देती हैं और फसल उत्पादन 20 से 50 फीसदी तक बढ़ा देती हैं। राजस्थान जैसे पानी की कमी वाले राज्यों में ड्रिप सिंचाई तकनीक भी काफी अहम हो जाती है, जो 70 फीसदी तक पानी बचाने में सहायक है। ग्रीनहाउस में खेती से फसलों की गुणवत्ता 15 से 30 फीसदी तक बढ़ जाती है। वहीं, प्लास्टिक पैकेजिंग फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करती है और उत्पादों की शेल्फ लाइफ बढ़ाती है। इस तरह, खेती में प्लास्टिक की जड़ें काफी गहरे तक समाई हुई हैं। सटीक खेती से मक्का और मूंगफली जैसी फसलों की खेती करने वाले किसानों की आय 20 से 94 फीसदी बढ़ी है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति उनका लचीलापन बढ़ा है।
सूक्ष्म प्लास्टिक कणों से मर रही मिट्टी
प्लास्टिक के उपयोग से होने वाले फायदों की सूची में फसल उत्पादन में बढ़ोतरी भी शामिल है। लेकिन, मल्चिंग फिल्मों के अवशेष और प्लास्टिक के सूक्ष्म कण मिट्टी में घुल रहे हैं, जो उर्वरता को 30 फीसदी तक कम कर सकते हैं। इससे गेहूं और सब्जियों जैसी फसलों की बढ़ोतरी प्रभावित होती है। गंगा बेसिन और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों जैसे पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील इलाकों में, जहां धान और सब्जी की खेती में प्लास्टिक का उपयोग गहनता से होता है, यह समस्या काफी गंभीर है। प्लास्टिक के सूक्ष्म कण मिट्टी के सूक्ष्मजीवों के संतुलन को बिगाड़ देते हैं, पानी को रोककर रखने की क्षमता को कम करते हैं और स्थानीय जैव विविधता को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे भी चिंता वाली बात यह है कि सूक्ष्म प्लास्टिक कण पौधों की जड़ों के माध्यम से खाद्य शृंखला में प्रवेश करते हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा को खतरा पैदा होता है। गंगा नदी से ली गई मछलियों और रोजमर्रा की वस्तुओं, जैसे- नमक में भी प्लास्टिक के सूक्ष्म कण पाए गए हैं।
नीतिगत पहल और जागरूकता की जरूरत
किसानों में प्लास्टिक के पर्यावरणीय खतरों और निपटान की जागरूकता कम है, केवल 20-30% किसान इससे वाकिफ हैं। छोटे किसान, जिनकी संख्या 80% से अधिक है, इस मामले में सबसे कम जागरूक हैं। पंजाब और महाराष्ट्र में जागरूकता बिहार, ओडिशा से अधिक है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना एवं बागवानी मिशन जैसी योजनाओं से मिलने वाली सब्सिडी से मल्चिंग और सूक्ष्म सिंचाई जैसी प्लास्टिक आधारित तकनीकों को बढ़ावा मिला, लेकिन कृषि में प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन का ढांचा कमजोर है। वर्ष 2021 और 2024 के नियमों में सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध और माइक्रोप्लास्टिक ट्रैकिंग शामिल है, पर ग्रामीण क्षेत्रों में इसे लागू करना मुश्किल है। केवल 30-50% कचरे प्लास्टिक का प्रबंधन होता है, बाकी जलाया या फेंका जाता है। ग्रामीण भारत में कचरा संग्रहण और रीसाइक्लिंग की कमी भी बड़ी समस्या है। उच्च परिवहन लागत और प्रोत्साहन की कमी के कारण दूषित प्लास्टिक कचरे का पुनर्चक्रण व्यवहार्य नहीं है।
कचरे को खुले में जलाना आम है, क्योंकि 88 फीसदी किसान लागत को सुरक्षित निपटान में बाधा मानते हैं। खुले में प्लास्टिक जलाना वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण है, जो मुंबई जैसे शहरी क्षेत्रों में 20 फीसदी पीएम2.5 कणों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। फसल अवशेषों के जलने के साथ मिलकर यह प्रक्रिया लगभग 3.12 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष उत्सर्जन करती है और अनुमानित 44,000 से 98,000 असमय मौतों का कारण बनती है।
प्लास्टिक अपशिष्ट के प्रबंधन की कोशिशें
चुनौतियों के बावजूद, पुणे और बंगलूरू में किसान सहकारी समितियां 50% कृषि प्लास्टिक कचरे का पुनर्चक्रण कर रही हैं। कॉरपोरेट सहयोग से कचरा बीनने वाले सालाना 12000 टन प्लास्टिक प्रोसेस करते हैं। बायो-पोटाश और केरल के स्टार्टअप मक्का-गन्ने से बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक बना रहे हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने 43,000 किमी सड़कें रीसाइक्ल्ड प्लास्टिक से बनाईं, जो कचरा कम करती हैं और सड़कों की टिकाऊपन बढ़ाती हैं। बायोडिग्रेडेबल मल्च फिल्में, जो 6 महीने में विघटित हो जाती हैं, 20-30% उपज बढ़ा सकती हैं और प्लास्टिक मल्च का टिकाऊ विकल्प भी हैं। जूट और हेम्प मैट खरपतवार नियंत्रण व मिट्टी की सेहत के लिए प्राकृतिक विकल्प बन सकते हैं, खासकर पूर्वी भारत में। स्प्रे योग्य हाइड्रो-मल्च छोटे किसानों के लिए किफायती है, जो धान और सब्जी की खेती में लागत 10-20% कम कर सकता है। इन उपायों को बढ़ावा देना समस्या को कम कर सकता है।
प्लास्टिकल्चर को भारतीय कृषि में बढ़ावा देने के लिए समग्र दृष्टिकोण आवश्यक है, जिसमें अपशिष्ट प्रबंधन शामिल होना चाहिए। नीतिगत सुधारों में कृषि के लिए विशिष्ट उत्पादक उत्तरदायित्व नियम, बायोडिग्रेडेबल विकल्पों के लिए वित्तीय प्रोत्साहन और न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली के साथ कार्बन क्रेडिट को जोड़ने के तंत्र शामिल होने चाहिए। अनुसंधान में निवेश सस्ते, बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक विकल्पों और माइक्रोप्लास्टिक के मिट्टी व खाद्य सुरक्षा पर दीर्घकालिक प्रभावों को समझने पर केंद्रित होना चाहिए। किसानों को प्रशिक्षण कार्यक्रमों, सहकारी पुनर्चक्रण मॉडल और कचरे के टिकाऊ प्रबंधन के माध्यम से समर्थन देना भी समान रूप से जरूरी है।