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लीक से हटकर बोई हल्दी, मिट्टी ने उगला पीला सोना : यूपी के किसान ने बदली राह, 1 से 6 एकड़ तक पहुंचा रकबा

रश्मि रंजन, पब्लिक पॉलिसी की जानकार, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sun, 18 Oct 2026 01:28 PM IST
सार

गेहूं-धान के बीच फतेहपुर की मिट्टी अब हल्दी के रंग में रंगती दिख रही है। युवा किसान अवधेश पटेल एक एकड़ से शुरुआत कर अब छह एकड़ में हल्दी उगा रहे हैं। उन्हें देख दूसरे किसान भी इसकी खेती करने लगे हैं।
 

लीक से हटकर बोई हल्दी, मिट्टी ने उगला पीला सोना
लीक से हटकर बोई हल्दी, मिट्टी ने उगला पीला सोना - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के ज्यादातर किसान गेहूं, धान, ज्वार और बाजरा जैसी फसलें उगाते हैं, पर युवा किसान अवधेश पटेल ने हल्दी को चुना है। उनकी सफलता देखकर आसपास के किसान भी इसकी ओर खिंच रहे हैं और जिले में हल्दी का रकबा बढ़ रहा है। अवधेश ने वर्ष 2025 में एक एकड़ में हल्दी की नरेंद्र-1 किस्म लगाई थी।

वह बताते हैं, ‘मई में बुआई और मार्च में खोदाई के बाद करीब 115 क्विंटल उत्पादन मिला। एक एकड़ में 5 से 6 क्विंटल बीज लगता है और कुल लागत 60 से 70 हजार रुपये आई।’ अब वह छह एकड़ में हल्दी उगा रहे हैं। प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की तैयारी भी है। 

बीज बेचकर ही एक लाख की कमाई 
अवधेश बताते हैं कि हल्दी के बीज से भी आमदनी होती है। उन्होंने करीब 30 क्विंटल हल्दी बीज के रूप में बेचकर लगभग एक लाख रुपये कमाए और बची हल्दी अगले साल बोई। फायदा देखकर अगले सीजन में रकबा छह गुना कर दिया। उनका दावा है कि सही तकनीक और बाजार की जानकारी से एक एकड़ में करीब डेढ़ लाख रुपये शुद्ध मुनाफा मिल सकता है, जो धान-गेहूं से बेहतर रिटर्न है। हल्दी को आवारा पशु नहीं खाते और प्राकृतिक आपदाओं का असर भी अपेक्षाकृत कम होता है, इसलिए किसान इसे सुरक्षित फसल मान रहे हैं।

पैदावार के तीन आधार 
अवधेश हल्दी की अच्छी पैदावार के तीन आधार मानते हैं, जिनमें सही जुताई, अच्छी खाद और जल-निकासी शामिल है। वह सबसे पहले खेत में पानी लगाकर करीब 10 किलो चूना डालते हैं, फिर गहरी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी बनाते हैं। बुआई से पहले 8 से 10 ट्रॉली गोबर की खाद डाली जाती है और फफूंदनासी से उपचारित करके बीज बोए जाते हैं। साथ ही, डीएपी, नीम खली, एसएसपी और यूरिया का संतुलित उपयोग होता है।

वह बताते हैं, 'मल्चिंग से नमी बनी रहती है, खरपतवार घटते हैं और यह खाद का काम भी करती है, जिससे सिंचाई कम लगती है।' वह जल-निकासी को सबसे जरूरी मानते हैं और हल्की ऊंचाई वाला, जलभराव से मुक्त खेत चुनने की सलाह देते हैं।

आलू वाली मशीन से हल्दी की खेती 
खर्च घटाने के लिए अवधेश आलू लगाने और निकालने वाली मशीन का ही उपयोग हल्दी में भी करते हैं। इससे मजदूरी कम लगती है, काम तेजी से होता है और लागत काबू में रहती है। वह मानते हैं कि हल्दी में असली लाभ तभी मिलता है, जब किसान समूह बनाकर खेती करें, क्योंकि कच्ची हल्दी का बाजार हर जगह नहीं मिलता।

समूह में प्रोसेसिंग यूनिट लगाई जाए तो फायदा और बढ़ेगा। वे खुद अगले वर्ष प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की योजना पर काम कर रहे हैं। हल्दी फरवरी या मार्च में तैयार हो जाती है और उसके बाद खेत खाली नहीं रहता। अवधेश बताते हैं, 'हल्दी निकालने के बाद किसान मूंग की फसल ले सकता है। इससे अतिरिक्त आय होती है और लागत का एक हिस्सा वहीं से निकल आता है।'

कृषि विशेषज्ञ आलोक सूर्यकांत बताते हैं, नरेंद्र-1 हल्दी की उन्नत किस्म है, जिसे आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुमारगंज ने विकसित किया है। इसमें करक्यूमिन की मात्रा अधिक रहती है, इसलिए इसकी फार्मा और कॉस्मेटिक उद्योग में अच्छी मांग है। वह बताते हैं, 'नरेंद्र-1 बलुई दोमट मिट्टी में शानदार उत्पादन देती है। गुणवत्ता और उत्पादन दोनों के लिहाज से यह किसानों के लिए बेहतर विकल्प है।'

नए किसानों के लिए सीख
अवधेश नए किसानों को सलाह देते हैं कि वे छोटे रकबे से शुरुआत करें, पहले बाजार, उत्पादन, लागत और चुनौतियों को समझें, फिर धीरे-धीरे हल्दी की खेती बढ़ाएं। उनके अनुसार, हल्दी की खेती घाटे का सौदा नहीं है, बशर्ते पूरी जानकारी और सही योजना होनी चाहिए। इसलिए, निर्णय करने से पहले हल्दी उगाने वाले किसानों से मिलकर उनके खेत देखने चाहिए। 
 
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