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ब्रिक्स से बदलेगी कृषि की तस्वीर : बीज से बाजार तक खुलेंगी नई राहें, खेती में बढ़ेगा साझा सहयोग

अरविंद कुमार सिंह, कृषि पत्रकार, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sun, 18 Oct 2026 02:01 PM IST
सार

ब्रिक्स देशों के बढ़ते कृषि सहयोग से भारत समेत अन्य सदस्य देशों की खेती को नई दिशा मिल सकती है। बीज, तकनीक, जलवायु-अनुकूल खेती और बाजार में साझा प्रयास किसानों के लिए नए अवसर खोल सकते हैं।
 

ब्रिक्स से बदलेगी कृषि की तस्वीर
ब्रिक्स से बदलेगी कृषि की तस्वीर - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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दुनिया की करीब आधी आबादी जिन देशों में रहती है, उनका जमावड़ा भारत की अध्यक्षता में संपन्न हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान हाल में नई दिल्ली में देखने को मिला। बीते दो दशकों में ब्रिक्स ने कृषि में आपसी सहयोग और समन्वय की मजबूत नींव तैयार की है। यह सिलसिला आगे बढ़ता रहा तो खेती में इसका व्यापक असर होगा। ब्रिक्स देशों के पास दुनिया की कुल भूमि का लगभग 42% हिस्सा है और विश्व का 45% कृषि उत्पादन यहीं होता है।

खाद्य सुरक्षा के लिहाज से सबसे अहम गेहूं उत्पादन में इनका योगदान 42% और चावल उत्पादन में 52% है, जबकि बाकी खाद्यान्न फसलों में भी ये देश अग्रणी हैं। यही वजह है कि वैश्विक कृषि बाजार में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ती जा रही है। इसका सीधा फायदा भारत के किसानों तक पहुंचने की उम्मीद बनी हुी है।

भारत दुनिया की 18% आबादी और 15% पशुधन को खाद्य सुरक्षा दे रहा है। खाद्यान्न उत्पादन 376 मिलियन टन और बागवानी उत्पादन 378 मिलियन टन पार कर चुका है। चीन के बाद भारत फल-सब्जियों का दूसरा और चीन व अमेरिका के बाद खाद्यान्न का तीसरा बड़ा उत्पादक है। ब्रिक्स देशों में चीन, ब्राजील और रूस भी बड़ी कृषि ताकत हैं। हालांकि, छोटे किसानों की चुनौतियां और खेती पर निर्भर बड़ी आबादी साझा चिंता हैं। रूस-ब्राजील में बड़े फार्म, पूंजी और मशीनीकरण कृषि को गति दे रहे हैं। वहीं, सभी ब्रिक्स देशों के सामने जलवायु परिवर्तन बड़ी चुनौती है। 

दुनिया के कई हिस्सों में बढ़ते युद्धजन्य तनाव और कोविड-19 के बाद बदली मानसिकता के चलते वर्चस्व की होड़ के बावजूद कई देश आपसी सहयोग की राह पर आगे बढ़ रहे हैं। दिल्ली शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स ने कृषि क्षेत्र पर केंद्रित चार विशेष पहलों- बीज, कृषि इनपुट्स, कृषि-पारिस्थितिकी व डिजिटल खेती को आगे बढ़ाने की रणनीति तय की। वैश्विक खाद्य सुरक्षा और पोषण सुनिश्चित करने में ब्रिक्स देशों की अहम भूमिका को स्वीकार करते हुए न सिर्फ सहमति बनी, बल्कि जून 2026 में इंदौर में हुए ब्रिक्स कृषि मंत्रियों के सम्मेलन में तय हुए मुद्दों को जमीन पर उतारने की दिशा में भी कदम बढ़े।

इंदौर सम्मेलन में छोटे किसानों, पशुपालकों, मछुआरों, कमजोर तबकों, महिलाओं और युवाओं के हितों को केंद्र में रखकर मंथन हुआ था, साथ ही खाद्य सुरक्षा, पौष्टिक आहार, कृषि-व्यापार के विस्तार, जलवायु परिवर्तन की साझा चुनौतियों और तकनीकी सहयोग को मजबूत करने पर भी विस्तृत चर्चा हुई थी।

ब्रिक्स देशों की चुनौतियों को देखते हुए कुछ नई संस्थाएं कृषि सहयोग को मजबूती दे सकती हैं। इनमें ब्रिक्स एग्रिन और ब्रिक्स नेटवर्क ऑफ सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस ऑन एग्रोइकोलॉजी एंड रीजनरेटिव एग्रीकल्चर प्रमुख हैं, जो श्रेष्ठ कृषि प्रथाओं के आदान-प्रदान और जलवायु-अनुकूल खेती को बढ़ावा देंगे। आईसीएआर से जुड़े भारतीय फसल प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम और डिजिटल कृषि केंद्र के समन्वय की जिम्मेदारी क्रमशः अहम भूमिका में है और आईआईटी दिल्ली इसे संभाल रहा है।

ग्लोबल फोरम ऑन फार्मर्स राइट्स इन सीड सिस्टम बीज अधिकारों और देसी बीज विविधता को बढ़ावा देगा। आपदा-पूर्व चेतावनी, मजबूत सप्लाई चेन, कृषि-तकनीक स्टार्टअप्स और पारदर्शी व्यापार व्यवस्था से भी खेती को लाभ होगा। प्रस्तावित ब्रिक्स अनाज विनिमय केंद्र वैश्विक अनाज व्यापार में नया संतुलन ला सकता है। वहीं, मोटे अनाज और जलवायु-अनुकूल फसलों का विकास इथियोपिया जैसे देशों की खाद्य सुरक्षा मजबूत कर सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिजनेस, स्टार्टअप्स, किसानों, शोधकर्ताओं, महिलाओं और युवाओं को भी इस सहयोग से जोड़ने का सुझाव दिया है। अब इसकी वास्तविक दिशा और असर समय के साथ सामने आएगा।

वर्ष 2016 में ब्रिक्स कृषि मंत्रियों की छठी बैठक की संयुक्त घोषणा में दलहन उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया गया था। अक्तूबर 2025 में दलहन आत्मनिर्भरता मिशन की शुरुआत हुई, जिसके तहत वर्ष 2030-31 तक 11,440 करोड़ रुपये खर्च होंगे। ब्रिक्स देश इस दिशा में भारत के सहयोगी बन सकते हैं। औषधीय पौधों की खेती को भी बढ़ावा मिल सकता है। 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में पारंपरिक चिकित्सा सहयोग पर जोर दिया गया है। भारत में इसके लिए राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड काम कर रहा है। आयुष व हर्बल उत्पादों का निर्यात भी बढ़ा है।

ब्रिक्स देशों के बीच कृषि सहयोग की नींव पहले ही पड़ चुकी थी। 26 मार्च 2010 को मॉस्को में कृषि मंत्रियों की बैठक में चार समझौतों पर सहमति बनी। इसके बाद अक्तूबर 2011 में चीन में हुई दूसरी बैठक में पांच साल की कृषि सहयोग कार्ययोजना तैयार की गई। वर्ष 2016 के 8वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स कृषि अनुसंधान मंच (ब्रिक्स-एआरपी) बनाने पर सहमति बनी।

अब तक कृषि मंत्रियों की 16 बैठकें हो चुकी हैं, जिनसे कई पहल जमीन पर उतरीं और नई संस्थाओं का रास्ता खुला। जल्द ही ब्रिक्स देश कृषि पोर्टल भी शुरू करेंगे, जिससे शोधकर्ताओं के साथ प्रगतिशील किसान जुड़ सकेंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते इस्तेमाल से कृषि सहयोग के नए रास्ते भी खुल रहे हैं।
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